मैं आ रहा हूँ! (गणपती) क्यूँ आ रहे हो ? अभी पिछले महीने में तुम्हारे पापा आये थे। फिर तुम्हारे ही रिश्तेदार, कृष्ण आये, अब तुम आओगे, फिर तुम्हारी माँ दुर्गा आयेगी। - jagoindia Sarkari Yojana : नई सरकारी योजना 2025

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Wednesday, September 11, 2019

मैं आ रहा हूँ! (गणपती) क्यूँ आ रहे हो ? अभी पिछले महीने में तुम्हारे पापा आये थे। फिर तुम्हारे ही रिश्तेदार, कृष्ण आये, अब तुम आओगे, फिर तुम्हारी माँ दुर्गा आयेगी।


मैं आ रहा हूँ ...........! (गणपती)
 क्यूँ आ रहे हो ?
अभी पिछले महीने में तुम्हारे पापा आये थे।
फिर तुम्हारे ही रिश्तेदार, कृष्ण आये,
अब तुम आओगे,
फिर तुम्हारी माँ दुर्गा आयेगी।
फिर राम आयेंगे
फिर लक्ष्मी आयेंगी दिवाली पर
आप लोग सालभर आते रहते हो...
आप लोगों की  अपॉइंटमेंट फिक्स  होती हैं...
आप लोग आते तो हो, पर कभी #अन्याय, #अत्याचार, #गरीबी, #जातपात, #बलात्कार, #खून, #लड़ाइयां , #चोरी, #भ्रष्टाचार, #भुखमरी, #किसान_आत्महत्या रोकने का प्रयत्न किया आपने?
नहीं न?
फिर क्यूँ आते हो? समाज का खर्च कराने और पंडे पुजारियों की जेब भरने???
देखो
गणेश भैय्या..
आप आओ...
किंतु इन सारी समस्याओं का निदान कर सकते हो तो आना।
और नहीं कर सकते तो भी कोई बात नहीं, सिर्फ एक काम तो कर दो... भारत को #स्वच्छ_भारत बना दो तो हमारा 0.5% जो टैक्स लगता है, वह तो बच जाएगा।
बस सिर्फ इतना काम कर दो...
बाकी तुम लोग सिर्फ भारत मे ही क्यों आते हो ?
दुनिया में बहुत से देश हैं। कभी किसी और देश की भी सैर करो... या फिर भारत के बाहर आपको कोई बुलाता नहीं? 
लगता है सभी देवी-देवताओं के लिए सिर्फ भारत ही पूरी सृष्टि है।।
जय भीम जय मूलनिवासी
जय संविधान
जय प्रकृति जय जोहार
दो तरह के देवताओं का फैशन हैं- आस्तिकों के देवता और नास्तिकों के देवता।दो तरह के कट्टरपंथी भी पाये जाते हैं- आस्तिक और नास्तिक।बड़ा विचित्र दौर है यह जहां भांति भांति के आस्तिक तलवार खींचे खड़े हैं और नास्तिकों ने भी अपने खंजर हथेलियां मोड़ कर पीठ की ओर छिपा रखे हैं। अब यह आप की ख्वाईस हैं कि किस और खड़े हो कर मरना पसंद करेंगे? कोई आपके मुंह पर श्लोक या आयतें दे मारेगा तो कोई मार्क्स की थ्योरी को परम सत्य बता कर आपकी छाती पर चढ़ जायेगा। विचारधाराओं के थोथेपन के इस दौर में मुझे बस्तर सुकून का ठंडा पानी उपलब्ध कराता रहा हैं। यहां एहसास होता है कि धर्म मान्यताओं और नास्तिकता के बीच भी सेतु बनाया जा सकता हैं।
इसी बात को बारीकी से समझने के लिए केशकाल (बस्तर) की रमणीक वादियों से होते हुए माता भंगाराम के मंदिर पहुंचा जा सकता हैं। मैं सुबह-सुबह ही पत्रकार मित्र कमल शुक्ला और कृष्ण दत्त उपाध्याय के साथ भंगाराम मंदिर आ पहुंचा। केशकाल नगर से लगभग 4 किलोमीटर भीतर एक पर्वतीय टीले पर इस मंदिर की अवस्थिति है जिसके पीछे की ओर से घना वन और ढलान प्रारंभ होती है। इस स्थल के संबंध में बुनियादी जानकारी स्थानीय पत्रकार तथा शोधार्थी कृष्ण दत्त उपाध्याय मुझे उपलब्ध कराते चल रहे थे। मंदिर परिसर में सन्नाटा पसरा हुआ था। केवल दो पुजारी यहां उपस्थित थे जो कि पोला उत्सव होने के कारण माता भंगाराम को चढ़ाने के लिए भोग बना रहे थे। खपरैल का यह मंदिर पुराने समय की संरचनाओं का स्मरण कराता हैं। बस्तर के देवी देवताओं का प्रकृति प्रेम भी जाहिर है और आम तौर पर जहां पेड़ों के झुरमुट हों, एकांत पर्वतीय टीले के निकट सघन वनों से घिरा कोई स्थल हो तो वहां आप किसी देवगुड़ी अथवा मातागुड़ी होने की संभावना से इनकार नहीं कर सकते। माता भंगाराम का मंदिर बस्तर भर की आस्था का केंद्र हैं। रियासत कालीन बस्तर के अंतिम महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव ने यहां एक चांदी का छत्र भी चढ़ाया था जिसे विशिष्ट अवसरों पर तथा भादों जात्रा के दौरान निकाला जाता हैं। एक समय था जब यहां पशुबलि भी प्रथा थी जिसे 70 के दशक में आदिवासी समाज ने आपसी सलाह से बंद कर दिया। भादो जात्रा न केवल प्रसिद्ध है अपितु बस्तर के दूरदराज गांवों से इसमें सम्मिलित होने अनेक गायता, सिरहा, माझी और पटेल पहुंचते हैं। भादो के छः शनिवार सेवा पूजा होती है जबकि सातवें शनिवार जात्रा निकाली जाती हैं।
मंदिर परिसर के पीछे एक पर्वतीय ढ़लान आरंभ होती है, ठीक वहीं पर कई आंगा देव जमीन पर पड़े हुए थे। उनका सामान यहां तक कि उनके चांदी से किए गए श्रृंगार,उनके चढ़ावे आदि-आदि इस ढ़लाने में यत्र तत्र बिखरे पड़े थे। देवता तो देवता है उसका मान करने की परंपरा भी हैं। देवता को प्रसन्न रखने के लिए हर जतन किये जाते हैं तथा सिरहाओं के माध्यम से देवताओं द्वारा रखी गयी हर मांग को पूरा करने की कोशिश की जाती हैं। देवता है तो कुछ भी मांग ले ऐसा भी नहीं। बहुत सख्त मोल-भाव देवताओं और भक्त के बीच में होता हैं। बकरे की मांग से शुरू हुई बहस भक्त के इनकार और चीख चिल्लाहट भरी तकरार से घटते-घटते मुर्गे तक भी पहुंच सकती हैं। यहां चूंकि देवता और उस पर आस्था रखने वालों के बीच सांकेतिक ही सही एक संवाद स्थापित है अतः बाद चढ़ावे लेने देने तक ही नहीं ठहरती अपितु भक्त की मांग भी पूरा करना देवता का ही दायित्व हैं। भक्त को परेशानी हैं, वह कर्जे में डूब गया हैं, बीमारियों ने घर बना लिया हैं, पति-पत्नी के झगड़े होते रहते हैं तो देवता मूकदर्शक बना नहीं रह सकता। उसे हर व्यक्तिगत समस्या बताई जाती है तथा उसे समाधान भी मांगे जाते हैं। यह सब कुछ भक्तों की बर्दाश्त की पराकाष्ठा तक होता हैं। जिस दिन भक्त को लगा कि देवता किसी काम का नहीं, जिसके रहते हुए भी उसका जीवन उलझनों भरा हैं, उसके तनावों का निदान नहीं मिल रहा है, खेतों को बरसात नहीं मिल पा रही है तो समझ लीजिए कि अब इस आंगा की शामत आ गयी। देवता को अस्वीकार करना बस्तर के आदिवासी समाज की आस्था का सबसे सबल और अनुकरणीय पक्ष हैं।
कुछ अविश्वसनीय किंतु सत्य जान ले। भंगाराम ही वह स्थल है जहां किसी देवता को मान्यता मिलती हैं तो किसी देवता की मान्यता समाप्त भी की जाती हैं। एक ही नाम के दो देवता होने पर वास्तविक कौन के विवाद का निपटारा भी यहीं होता हैं। सबसे बड़ी बात कि पीड़ित भक्त अपने देवता के बरताव के प्रति यहां अपनी नाखुशी व्यक्त करता है तथा उसके लिए सजा की मांग भी कर सकता हैं। वह अपने देवता का तिरस्कार भी कर सकता है अथवा उसे सजा दिलाने की पात्रता भी रखता हैं। ऐसा भी नहीं कि देवता को अपनी सफाई देने का मौका नहीं मिलता। देवता भी यहां अपने तर्क रखता हैं, वह भक्त की उन भूलों को उजागर कर सकता है जिसके कारण उसने समस्याओं का समाधान नहीं किया। भंगाराम की यह अदालत नीर-क्षीर विवेक करती हैं, वह कभी समझाईश से भक्त और देवता के बीच विवाद को समाप्त करती है तो कभी किसी देवता को कैद करने अथवा नष्ट करने का भी निर्देश दे सकती हैं। यही कारण है कि भादो जात्रा में महिलाओं का प्रवेश यहां तक कि प्रसाद ग्रहण करना वर्जित रखा गया हैं। इसका कारण उनके कोमल मन को माना गया है चूंकि देवताओं को कैद किया जाना अथवा नष्ट किया जाना एक भावुक क्षण होता हैं। पुजारी ने इस जानकारी में आगे जोड़ा कि कभी-कभी कुछ साल बीत जाने के पश्चात भक्त को अपने कैद देवता की याद आती है अथवा उसे लगता है कि सजा प्रर्याप्त हो चुकी।अब देवता को छुड़ा कर लाने और सम्मान देने से उसकी बात सुनी जायेगी और समाधान भी उसे मिलने लगेंगे तो वह इसकी अपील भी भंगाराम में आ कर कर सकता हैं। यह प्रक्रिया वर्तमान न्याय प्रणाली में मिलने वाली जमानत की तरह होती हैं। वह निर्धारित शुल्क अदा कर अपने देवता को पुनः घर ले जा सकता हैं।
क्या यह प्रक्रिया एक विमर्श नहीं मांगती?  क्या देवताओं को मिलने वाली सजायें मुख्यधारा के उस समाज को आईना नहीं दिखाती जिन्होंने अपनी कट्टर आस्थाओं के लिए पाखंड की चादर ओढ़ रखी है? क्या यह समाजशास्त्र के लिये एक अनूठा विषय नहीं है जो तमाम नास्तिकता की दलीलों को जीभ चिढ़ा कर उन्हें आस्थावान होने की अपनी ही परिभाषा सौंप देता हैं? यहां देवता असल में व्यक्ति के मनोविज्ञान से ही जन्म लेते हैं और उसके अपने तर्क द्वारा कभी भी नष्ट किये जा सकते हैं। भंगाराम मंदिर के पीछे की ओर जहां अनेकों देवता कैद हैं अथवा उनके सामान, श्रृंगार, चढ़ावे आदि बिखरे हुए हैं, उन्हें देख कर मैं भी स्तब्ध रह गया हूं और अपने तर्क को कुरेद रहा हूं कि आदिवासी समाज की इस प्रगतिशीलता को हमारी मुख्यधारा की दकियानूसियत कभी हासिल भी कर पायेगी?

बस्तरनामा
"गोंडवाना गणतंत्र पार्टी" विपर्यय के इस कठिन अँधेरे दौर में क्रान्ति के नये संस्करण की तैयारी के लिए युवा वर्ग का आह्वान करता है। यह एक नूतन क्रान्तिकारी नवजागरण और प्रबोधन का शंखनाद करता है। यह नयी क्रान्ति की नेतृत्वकारी शक्ति के निर्माण के लिए, उसकी मार्गदर्शक वैज्ञानिक जीवनदृष्टि और इतिहासबोध की समझ कायम करने के लिए और भारतीय क्रान्ति के रास्ते की सही समझदारी कायम करने के उद्देश्य से विचार-विनिमय और बहस-मुबाहसे के लिए आम जनता के विवेकशील बहादुर युवा सपूतों को आमन्त्रित करता है। "गोंडवाना गणतंत्र पार्टी" क्रान्ति की आत्मा को जागृत करने की ज़रूरत का अहसास है। यह एक नयी क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की तड़प की अभिव्यक्ति है। लोग यदि लोहे की दीवारों में कैद नशे की गहरी नींद सो रहे हैं, तब भी हमें लगातार आवाज़ लगानी ही होगी। नींद में घुट रहे लोगों के कानों तक लगातार पहुँचती हमारी आवाज़ कभी न कभी उन्हें जगायेगी ही। भूलना नहीं होगा कि एक चिंगारी सारे जंगल को आग लगा सकती है। "गोंडवाना गणतंत्र पार्टी" ऐसी ही एक चिंगारी बनने को संकल्पबद्ध है। 

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