नीचे
कबीरदास के वचनों के माध्यम से “पैसे” के विषय को सरल, गहन और क्रमबद्ध तरीके से समझाया गया
है—
कबीर का स्पष्ट संदेश है—
भूमिका
संत
कबीरदास भक्ति काल के ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने जीवन की सच्चाइयों को सीधे-सपाट
शब्दों में कहा। उनका दर्शन केवल ईश्वर-भक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज, आचरण, नैतिकता और धन (पैसा) जैसे व्यावहारिक विषयों पर भी आधारित था।
कबीरदास ने पैसे को न तो पूरी तरह त्याज्य बताया और न ही उसे जीवन का अंतिम लक्ष्य
माना। उनके अनुसार पैसा साधन है, साध्य
नहीं। आज के भौतिकवादी युग में कबीर के पैसे संबंधी विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो
जाते हैं।
1. पैसा आवश्यक है, पर सर्वोच्च नहीं
कबीरदास
यह स्वीकार करते हैं कि जीवन चलाने के लिए धन आवश्यक है। बिना धन के जीवन कठिन हो
जाता है, परंतु धन को ही सब कुछ मान लेना आत्मिक
पतन का कारण बनता है।
दोहा—
> “कबीर धन संचय न कीजिए, धन सांचा न होय।
> सांचा तो वह धन है, जो बांटे बढ़े सोय॥”
भावार्थ—
कबीर
कहते हैं कि धन का अंधा संचय नहीं करना चाहिए। सच्चा धन वही है जो दूसरों की
सहायता में लगे। जो धन बांटने से बढ़े, वही
वास्तविक धन है।
संदेश: पैसा जीवन का साधन है, सेवा का माध्यम है, अहंकार का कारण नहीं।
2. धन का मोह आत्मा को बांधता है
कबीरदास
ने धन-मोह को मनुष्य के पतन का बड़ा कारण माना है। पैसा जब जरूरत से आगे बढ़कर
लालच बन जाता है, तब वह व्यक्ति को आत्मिक रूप से खोखला
कर देता है।
दोहा—
> *“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
> आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर॥”
भावार्थ—
शरीर
मर जाता है, पर धन की लालसा और तृष्णा नहीं मरती।
यही मनुष्य को बार-बार दुखों में डालती है।
संदेश: पैसा जब लालच बन जाए, तो वह बंधन बन जाता है।
3. पैसे से अहंकार नहीं, विनम्रता होनी चाहिए
धन
आने पर अक्सर व्यक्ति अहंकारी हो जाता है। कबीरदास इस प्रवृत्ति की तीखी आलोचना
करते हैं।
दोहा—
> *“धन दौलत के मद में, मत भूलो इंसान।
> वक्त पड़े जब हाथ में, न आएगा अभिमान॥”
भावार्थ—
पैसा
हमेशा साथ नहीं रहता। विपत्ति के समय न धन काम आता है, न अहंकार।
संदेश: धन विनम्रता सिखाए, घमंड नहीं।
4. ईमानदारी से कमाया धन ही श्रेष्ठ है
कबीरदास
ने बेईमानी और छल से कमाए गए धन को अधर्म का फल बताया है।
दोहा—
> *“पाप की कमाई संग न जाए, अंत समय पछताय।
> कबीर कहे सुन साधुजन, साचा धन सुख लाय॥”
भावार्थ—
गलत
तरीके से कमाया गया पैसा अंत समय में दुख ही देता है। सच्चा धन वही है जो ईमानदारी
से कमाया जाए।
संदेश: धन का मूल्य उसकी शुद्धता से है, मात्रा से नहीं।
5. धन से सुख नहीं, संतोष से सुख मिलता है
कबीरदास
मानते हैं कि सुख का स्रोत धन नहीं, बल्कि
संतोष है।
दोहा—
>*“साईं इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय।
> मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥”
भावार्थ—
कबीर
ईश्वर से उतना ही धन मांगते हैं जितना जीवन के लिए आवश्यक हो—न अधिक, न कम।
संदेश: सीमित आवश्यकताओं में ही वास्तविक सुख
छिपा है।
6. पैसा रिश्तों से बड़ा नहीं
कबीरदास
ने धन के कारण टूटते रिश्तों को समाज की बड़ी विडंबना बताया है।
दोहा—
> *“जहां दया तहां धर्म है, जहां लोभ तहां पाप।
> धन के लोभ में आदमी, खो बैठे सब आप॥”*
भावार्थ—
धन
का लोभ मनुष्य को रिश्तों और मूल्यों से दूर कर देता है।
संदेश: पैसा कमाने के चक्कर में मानवता नहीं
खोनी चाहिए।
7. मृत्यु के बाद धन नहीं जाता
कबीरदास
बार-बार याद दिलाते हैं कि मृत्यु के बाद धन साथ नहीं जाता।
दोहा—
> “माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे।
> एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोहे॥”*
संदेश: जीवन अस्थायी है, धन स्थायी नहीं।
8. आज के युग में कबीर का धन-दर्शन
आज
का समाज उपभोक्तावाद से घिरा हुआ है। अधिक पैसा, अधिक सुख—यह धारणा आम हो चुकी है। कबीरदास का
दर्शन हमें सिखाता है कि—
1.
पैसा कमाओ, पर ईमानदारी से
2.
पैसा रखो, पर अहंकार के बिना
3.
पैसा खर्च करो, पर
सेवा और सदाचार में
4.
पैसा जरूरी है, पर
इंसानियत से ऊपर नहीं
निष्कर्ष-
कबीरदास
के अनुसार पैसा न अच्छा है,
न बुरा—वह केवल एक साधन है। उसका उपयोग यदि मानव कल्याण, सेवा, संतोष और नैतिकता के साथ किया जाए तो वह जीवन को सार्थक बनाता है।
लेकिन यदि वही पैसा लालच,
अहंकार और अन्याय का कारण बन जाए, तो वह मनुष्य को भीतर से खोखला कर देता
है।
कबीर
का स्पष्ट संदेश है—
धन
को अपना दास बनाओ,
मालिक
नहीं।
यदि
आप चाहें तो मैं—
नीचे
कबीरदास के पैसे/धन-माया विषयक 10
दोहे दिए जा रहे हैं, हर दोहे के साथ सरल और स्पष्ट व्याख्या
भी दी गई है, ताकि अर्थ पूरी तरह समझ में आ जाए—
1. धन-माया का झूठा आकर्षण
दोहा—
> माया महाठगनी हम जानी,
> तिरगुन फांस लियो है ठानी॥
व्याख्या—
कबीर
कहते हैं कि माया (धन) बहुत बड़ी ठग है। यह मनुष्य को अपने आकर्षण में फँसाकर सत्य
से दूर कर देती है। जो व्यक्ति धन को ही सब कुछ मान लेता है, वह आत्मिक उन्नति नहीं कर पाता।
2. धन से संतोष नहीं मिलता
दोहा—
> *माया ऐसी मोहनी, पंडित बाँधे लोय।
> धन के पीछे जो चला, खाली हाथ ही होय॥
व्याख्या—
धन
का मोह विद्वानों तक को बाँध लेता है। जो व्यक्ति जीवन भर पैसे के पीछे भागता है, अंत में खाली हाथ ही जाता है।
3. लोभ का परिणाम दुख
दोहा—
> *लोभ बुरी बला है, सकल जगत की खान।
> लोभी नर सुख न पाए, कह गए दास कबीर॥
व्याख्या—
लोभ
धन से जुड़ी सबसे बड़ी बुराई है। लोभी व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं होता और जीवन भर
दुखी रहता है।
4. धन से धर्म न छूटे
दोहा—
> *धन दौलत के जोर में, मत कर अधम अधर्म।
> कबीर कहे समझदार से, पहले मानव धर्म॥
व्याख्या—
कबीर
समझाते हैं कि धन के प्रभाव में आकर अधर्म नहीं करना चाहिए। सबसे बड़ा धर्म मानवता
है।
5. सादा जीवन, ऊँचा विचार
दोहा—
> *साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय।
> साधु न भूखा जायें, मैं भी भूखा न जाय॥
व्याख्या—
कबीर
सीमित धन की कामना करते हैं। उनका मानना है कि आवश्यकताओं की पूर्ति ही पर्याप्त
है, अधिक धन लालच को जन्म देता है।
6. धन से मन नहीं भरता
दोहा—
> *मन ना भर्यो माया से, चाहे मिले अपार।
> कबीर कहे संसार में, तृष्णा रही विकार॥
व्याख्या—
कितना
भी धन मिल जाए, मन कभी नहीं भरता। इच्छाएँ बढ़ती ही
जाती हैं, जिससे मन अशांत रहता है।
7. धन के कारण रिश्ते बिगड़ते हैं
दोहा—
> *धन के कारण जग बंधा, धन से छूटा न कोय।
> भाई भाई न पहिचाने, धन बीच आ गया सोय॥
व्याख्या—
पैसे
के कारण रिश्तों में दरार आ जाती है। भाई-भाई भी धन के कारण एक-दूसरे के शत्रु बन
जाते हैं।
8. धन नश्वर है
दोहा—
> यहु धन माया छाँह है, पल में उड़ जाए।
> कबीर सांचा धन वही, जो परलोक काम आए॥
व्याख्या—
धन
छाया की तरह अस्थायी है। सच्चा धन वही है जो पुण्य और अच्छे कर्मों के रूप में साथ
जाए।
9. दान से धन की शुद्धि
दोहा—
> दान किए धन निर्मल होय, मन होय प्रसन्न।
> कबीर कहे जो बांटता, वही सदा धनवान॥
व्याख्या—
दान
करने से धन पवित्र होता है और मन को शांति मिलती है। जो बाँटता है, वही वास्तव में धनी होता है।
10. अंत समय धन व्यर्थ
दोहा—
> धन, दौलत
सब यहीं रहि, साथ न जावे कोय।
> कबीर नाम सुमिरन बिना, कौन सहायक होय॥
व्याख्या—
मृत्यु
के समय धन साथ नहीं जाता। केवल अच्छे कर्म और ईश्वर-स्मरण ही सहायक होते हैं।
समापन
इन
दोहों के माध्यम से कबीरदास हमें यह सिखाते हैं कि—
1.
धन आवश्यक है,
लेकिन सीमा में
2.
धन का मोह विनाशकारी है
3.
ईमानदारी, दान और संतोष ही सच्ची संपत्ति हैं
कबीर
का मूल संदेश:
पैसे
को जीवन का साधन बनाओ, लक्ष्य नहीं।

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