आज आजादी को 70 वर्ष से भी ज्यादा गुजर चुके हैं मगर आदिवासियों
की हालात बद से बदतर होती जा रही है हां यह बात अलग है कि हमारे समाज के कुछ लोग पढ़
लिख कर थोड़े बहुत नौकरी पेशा में आ गए हैं मगर इन थोड़े बहुत लोगों के वजह से हम यह
नहीं कह सकते कि हमारा समाज आज उत्तरोत्तर वृद्धि कर रहा है क्योंकि समाज का समूचा
विकास तभी संभव हो सकता है जब हम सब मिलकर समाज के अंतिम पंक्ति पर बैठे अंतिम व्यक्ति
को सही लाभ न मिल सके मेरा मानना है और एक कहावत भी है की अकेला चना चना पहाड़ नहीं
तोड़ सकता ठीक उसी प्रकार समाज से गिने चुने लोगों के पढ़ लिख लेने से या कुछ लोगों
के रोजगार में लग जाने से समाज का विकास नहीं हो सकता इसके लिए तो चाहिए की समाज का
हर एक व्यक्ति प्रतिदिन के मान से 500 से ₹700 तक दैनिक मजदूरी प्राप्त कर पाए तभी उसका सही विकास मान सकते
हैं लेकिन फिर भी आज यह देखा जा रहा है 1000 से दो हजार तीन हजार तक प्रतिदिन कमाने
वाला व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वयं को विकसित किया समृद्ध नहीं समझ पा रहा है क्योंकि
आज का परिवेश प्रतिदिन एक व्यक्ति के प्रति कम से कम लगाएं तो दो से ₹300 खर्च करता है और उसके परिवार
में उसके आश्रित 5 से 6 लोग होते हैं तो यह मान लीजिए एक परिवार में 1000 कमाने वाला
व्यक्ति अपने परिवार का पूर्ण रूप से भरण-पोषण नहीं कर पा रहा है इस ग्रुप में नौकरी
पेशा वाले लोग भी होंगे आपका अगर संयुक्त परिवार है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं आप अपनी
तनखा से प्रतिदिन या प्रतिमाह या प्रतिवर्ष कितना बचत कर पाते हैं जबकि साधारण नौकरी
पेशा वाला व्यक्ति 30 से 70 या 80000 रुपए तक मासिक इनकम ले रहा है तभी वह माह के अंत
में पैसों की तंगी महसूस करता है इसलिए आज के परिवेश के आधार पर हमारे समाज में अधिकतर
कृषि पर आधारित लोग निवास करते हैं तब आप आंकड़ा लगा सकते हैं की उनका मासिक आय कितना
होगा और वह अपने परिवार के लिए कितना कमा पा रहा होगा और वह उन पैसों से अपने परिवार
का किस प्रकार से भरण-पोषण कर रहा होगा मेरा यह कहना गलत भी हो सकता है लेकिन सच है
हम समस्त नौकरी पेशा वाले लोगों को एक बात समझ नहीं होगी की मात्र नौकरी करने से हम
पूर्णता है विकसित नहीं हो पा रहे हैं इसलिए स्वयं के साथ अपने बीच विद्यमान कृषक भाइयों
को आधुनिक कृषि पद्धति रोजगार के अवसर व अन्य गतिविधियों में संलग्न करना होगा क्योंकि
आज आप यह देख पा रहे हैं की जो व्यक्ति रोजगार कर रहा है वही व्यक्ति समाज में राज
कर रहा है आप अपने गांव से लेकर राजनीतिक क्षेत्र में भी आप चले जाइए तो वहां भी व्यवसायिक रोजगार वाले लोग ही अधिक उन्नति कर पा
रहे हैं इसलिए ज्यादा से ज्यादा हमें यह प्रयास करना होगा की स्वयं तो विकास करें साथ
ही अपने लोगों को रोजगार के प्रति प्रेरित करें ताकि हम अगर दो कदम चलते हैं तो हमारे
साथ एक कदम चलने के लिए हमारे कृषक भाई भी हमारे साथ खड़े रहे अब हमें इसे कैसे करना
है कहां से सुविधाएं प्राप्त होगी और किस प्रकार उसे मुहैया कराया जाएगा इसके लिए किन-किन
संसाधनों की आवश्यकता होगी आर्थिक रूप से उसका पूर्ति कैसे किया जाएगा इन सभी विषयों
पर गंभीर रूप से चर्चा किया जाना चाहिए और इस दिशा में मात्र सोशल मीडिया नहीं बल्कि
जमीनी हकीकत में इसे फॉलोअप करने की आवश्यकता है दोस्तों आप सभी जानते हैं सन 1935
में बने भारत सरकार अधिनियम के धारा 91 और 92 आंशिक बहिष्कृत क्षेत्र व बहिष्कृत क्षेत्र
के रूप में बनाए गए कानून को स्वतंत्र भारत में भारतीय संविधान के दसवें भाग में अनुच्छेद
244 एक वा दो पांचवी अनुसूची और छठवीं अनुसूची के रूप में लिपिबद्ध किया गया जिसमें
आदिवासियों की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए बृहद व्यवस्था की गई है जिससे आदिवासियों
के क्षेत्र में गौण खनिज वन संपदा पर स्वामित्व का अधिकार दिया गया है परंतु आज तक
आदिवासियों के जमीन से निकलने वाली या उनके क्षेत्र से वन संपदा से प्राप्त आमदनी को
उद्योगपतियों के हाथों बेच दिया जाता है और इतना ही नहीं उस मालिक कृषक को भूमिहीन
कर दिया जाता है उसे चंद रुपयों का मुआवजा देकर जबकि यह उचित नहीं है कम से कम आदिवासियों
को उनका हक तो मिलना चाहिए नहीं हो पा रहा है अब हमें यह सोचना होगा की इन सभी अनुच्छेदों
का विस्तृत में जानकारी लेकर शासन और प्रशासन के समक्ष अपनी बात संवैधानिक तरीके से
रखें ताकि हमें हमारा पूरा हक मिल सके चलिए कुछ तैयारी करते हैं आप भी कुछ कीजिए और
कुछ और लोगों को प्रेरित कीजिए
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Friday, September 13, 2019
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आज आजादी को 70 वर्ष से भी ज्यादा गुजर चुके हैं मगर आदिवासियों की हालात बद से बदतर होती जा रही है
आज आजादी को 70 वर्ष से भी ज्यादा गुजर चुके हैं मगर आदिवासियों की हालात बद से बदतर होती जा रही है
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