कबीर
दास के दोहों में सामाजिक और आर्थिक प्रेम की अवधारणा
भूमिका
संत
कबीर दास भक्ति काल के ऐसे महान संत और समाज सुधारक थे, जिन्होंने अपने
दोहों के माध्यम से समाज को नई चेतना दी। कबीर केवल आध्यात्मिक प्रेम की ही नहीं, बल्कि सामाजिक
और आर्थिक प्रेम की भी गहरी समझ रखते थे। उनके दोहे आम जनजीवन से जुड़े हुए थे, जिनमें समानता, श्रम, करुणा, भाईचारा और शोषण
के विरोध की स्पष्ट झलक मिलती है। कबीर का प्रेम केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यवहारिक
और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ प्रेम था।
सामाजिक प्रेम की अवधारणा
सामाजिक
प्रेम का अर्थ है – समाज के सभी वर्गों के प्रति समान भाव, बिना भेदभाव के अपनापन और मानवीय
करुणा। कबीर ने अपने दोहों में जाति, धर्म, ऊँच-नीच और पाखंड का तीखा विरोध किया।
1. जाति-भेद के
विरुद्ध प्रेम
कबीर
समाज में फैली जातिगत असमानता को सबसे बड़ा सामाजिक रोग मानते थे।
दोहा:-
> *जाति न पूछो
साधु की, पूछ
लीजिए ज्ञान।
> *मोल करो तलवार
का, पड़ा
रहन दो म्यान॥
व्याख्या:
यहाँ
कबीर सामाजिक प्रेम की नींव रखते हैं। वे कहते हैं कि किसी व्यक्ति की जाति नहीं, उसका ज्ञान और
कर्म महत्वपूर्ण है। यह विचार सामाजिक समानता और आपसी सम्मान को बढ़ावा देता है, जो सच्चे
सामाजिक प्रेम का आधार है।
2. धार्मिक कट्टरता
के विरोध में प्रेम
कबीर
ने हिंदू-मुस्लिम भेदभाव को नकारते हुए मानवता को सर्वोच्च माना।
दोहा:
> *हिंदू कहे मोहि
राम पियारा, तुर्क
कहे रहमाना।
> *आपस में दोउ
लड़े, मरम
न कोउ जाना॥
व्याख्या:
इस
दोहे में कबीर धार्मिक प्रेम की बात करते हैं, जो समाज को जोड़ता है, तोड़ता नहीं। वे
बताते हैं कि ईश्वर एक है, लेकिन मनुष्य अपने अहंकार में बँट गया है।
सामाजिक प्रेम का अर्थ है – एक-दूसरे की आस्था का सम्मान।
3. मानव-मानव
के बीच प्रेम और करुणा
कबीर
के अनुसार प्रेम वही है जो दुखी के दुख को समझे।
दोहा:
> *दुख में सुमिरन
सब करें, सुख
में करे न कोय।
> *जो सुख में
सुमिरन करे, तो
दुख काहे को होय॥
यह
दोहा समाज में संवेदनशीलता और सहानुभूति का संदेश देता है। सामाजिक प्रेम तभी
सच्चा है, जब
वह केवल अपने सुख तक सीमित न हो।
आर्थिक प्रेम की अवधारणा
आर्थिक
प्रेम का अर्थ है – ईमानदारी से कमाया गया धन, श्रम का सम्मान, शोषण का विरोध
और संतुलित जीवन। कबीर ने लोभ, संग्रह और दिखावे को प्रेम के विरुद्ध बताया।
4. श्रम की महत्ता और आत्मनिर्भरता
कबीर
स्वयं एक जुलाहा थे और श्रम को ईश्वर के समान मानते थे।
दोहा:
> *साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुंब
समाय।
> *मैं भी भूखा न
रहूँ, साधु
न भूखा जाय॥
व्याख्या:
यह
दोहा आर्थिक प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है। कबीर अत्यधिक धन नहीं, बल्कि उतना
चाहते हैं जिससे परिवार का पालन हो सके और दूसरों की सहायता भी हो जाए। यह संतुलित
अर्थव्यवस्था और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देता है।
5. लोभ और संग्रह
के विरोध में प्रेम
कबीर
के अनुसार धन का अत्यधिक मोह मनुष्य को प्रेम से दूर कर देता है।
दोहा:
> *माया मरी न मन
मरा, मर-मर
गए शरीर।
> *आसा तृष्णा न
मरी, कह
गए दास कबीर॥
व्याख्या:
यह
दोहा बताता है कि आर्थिक प्रेम का अर्थ त्याग और संतोष है। जब तक मनुष्य लोभ में
फँसा रहेगा, तब
तक समाज में प्रेम और समानता नहीं आ सकती।
6. शोषण के विरुद्ध
आर्थिक न्याय
कबीर
ने शोषक वर्ग और पाखंडी साधुओं की आलोचना की।
दोहा:
> *पाथर पूजे हरि
मिले, तो
मैं पूजूँ पहाड़।
> *ताते यह चाकी
भली, पीस
खाए संसार॥
यह
दोहा परोक्ष रूप से उस आर्थिक शोषण की ओर संकेत करता है, जहाँ धर्म और
सत्ता के नाम पर आम जनता का शोषण होता है। कबीर श्रम करने वाले साधारण व्यक्ति को
अधिक मूल्यवान मानते हैं।
सामाजिक और आर्थिक प्रेम का समन्वय
कबीर
के दोहों में सामाजिक और आर्थिक प्रेम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उनके अनुसार:
1.
समाज में समानता होगी तो आर्थिक न्याय
आएगा
2.
आर्थिक संतुलन होगा तो सामाजिक प्रेम
पनपेगा
3.
शोषण मुक्त समाज ही प्रेममय समाज हो
सकता है
कबीर
का प्रेम केवल भावुकता नहीं, बल्कि साहसिक सत्य है, जो अन्याय के
विरुद्ध खड़ा होता है।
वर्तमान समाज में कबीर के विचारों की
प्रासंगिकता
आज
के युग में जब:
Ø अमीर
और गरीब के बीच खाई बढ़ रही है
Ø जाति
और धर्म के नाम पर संघर्ष हो रहे हैं
Ø उपभोक्तावाद
और लालच हावी है
ऐसे
समय में कबीर के सामाजिक और आर्थिक प्रेम के दोहे हमें सादगी, समानता और
मानवता की ओर लौटने का मार्ग दिखाते हैं।
निष्कर्ष-
कबीर
दास के दोहे सामाजिक और आर्थिक प्रेम की जीवंत व्याख्या हैं। वे हमें सिखाते हैं
कि:
* प्रेम बिना
भेदभाव के होता है
* सच्चा धन वही है
जो परिश्रम से आए और सबके काम आए
* समाज तभी मजबूत
होगा जब प्रेम, करुणा
और न्याय साथ चलें
कबीर
का प्रेम आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था। उनका दर्शन हमें एक मानवीय, न्यायपूर्ण और
प्रेममय समाज बनाने की प्रेरणा देता है।

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