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Saturday, February 7, 2026

प्रेम आसान नहीं, यह तपस्या है -कबीर दास के वचन

 



 भूमिका: कबीर के लिए प्रेम क्या है?

कबीरदास जी के दर्शन का केंद्र प्रेम है। उनके अनुसार प्रेम केवल भावनात्मक आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा का मिलन है। कबीर का प्रेम तो सांसारिक वासना है और ही दिखावे की भक्तियह त्याग, समर्पण, पीड़ा और सच्चाई से भरा मार्ग है।

कबीर कहते हैं कि ईश्वर को पाने का सबसे सरल और सबसे कठिन रास्ता प्रेम ही है।

 स्टेप 1: प्रेम आसान नहीं, यह तपस्या है

कबीरदास जी प्रेम को खेल नहीं, बल्कि तपस्या मानते हैं। वे साफ कहते हैं कि प्रेम का मार्ग कांटों भरा है।

दोहा:

> प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो समाय।

> जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाय॥

 अर्थ:

 प्रेम की गली बहुत संकरी है

 वहाँ अहंकार (मैं) और ईश्वर (तू) दोनों साथ नहीं रह सकते

 जब तकमैं है, तब तक प्रेम नहीं

 प्रेम के लिए अहंकार का त्याग जरूरी है

सीख: सच्चा प्रेम स्वयं को मिटाने से शुरू होता है।

 

 स्टेप 2: प्रेम में डर और शर्तों की कोई जगह नहीं

कबीर कहते हैं कि प्रेम करने वाला व्यक्ति डरता नहीं, क्योंकि डर वहाँ होता है जहाँ स्वार्थ होता है।

दोहा:

> जो डरै सो प्रेम करै, प्रेम करै सो डरै नाय।

> प्रेम गली में जो चलै, सीस देय ले जाय॥

अर्थ:

 जो डरता है वह प्रेम नहीं कर सकता

 प्रेम करने वाला सिर (अहंकार) देने को तैयार रहता है

सीख: प्रेम में शर्तें, हिसाब-किताब और सुरक्षा नहीं होतीकेवल समर्पण होता है।

 स्टेप 3: प्रेम त्याग सिखाता है, पाना नहीं

कबीर के प्रेम में मांग नहीं, केवल देना है।

जो प्रेम पाने की लालसा से करता है, वह प्रेम नहींवह व्यापार है।

कबीर मानते हैं कि:

 प्रेम में अपेक्षा खत्म हो जाती है

 प्रेमी केवल देना जानता है

सीख: जहाँमुझे क्या मिलेगा है, वहाँ प्रेम नहीं है।

 स्टेप 4: प्रेम दिखावा नहीं, भीतर की क्रांति है

 

कबीर बाहरी भक्ति और दिखावटी प्रेम के घोर विरोधी थे।

उनके अनुसार:

1.     माला फेरना

2.     कपड़े बदलना

3.     मंदिर-मस्जिद जाना

ये सब प्रेम नहीं, यदि दिल खाली है।

दोहा:

> पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया कोय।

> ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

 अर्थ:

* लाखों किताबें पढ़ने से ज्ञान नहीं

* “प्रेम के ढाई अक्षर समझ लेने वाला ही सच्चा ज्ञानी है

सीख: प्रेम ज्ञान से बड़ा है।

 स्टेप 5: प्रेम में पीड़ा भी प्रसाद है

कबीर प्रेम को आनंद और पीड़ा दोनों का मिश्रण मानते हैं।

उनके अनुसार प्रेम बिना कष्ट के नहीं मिलता।

कबीर कहते हैं कि:

a.     प्रेम में तड़प होगी

b.     विरह होगा

c.      अकेलापन होगा

लेकिन यही पीड़ा आत्मा को शुद्ध करती है।

सीख: प्रेम की पीड़ा, आत्मा की सफाई है।

 स्टेप 6: प्रेम आत्मा और परमात्मा का मिलन है

कबीर के लिए प्रेम का अंतिम लक्ष्य ईश्वर से मिलन है।

यह प्रेम किसी मूर्ति या स्थान से नहीं, बल्कि भीतर से होता है।

वे कहते हैं:

·        ईश्वर बाहर नहीं

·        मंदिर, मस्जिद, काबा, कैलाशसब भीतर हैं

सीख: जब प्रेम भीतर जागता है, तब ईश्वर अपने आप प्रकट होता है।

 स्टेप 7: प्रेम जाति-धर्म से ऊपर है

कबीर का प्रेम सार्वभौमिक है।

उनके लिए:

A.    हिंदू

B.     मुसलमान

C.     ऊँच-नीच

प्रेम सबको जोड़ता है।

कबीर ने कहा:

* प्रेम करने वाला केवल इंसान होता है

* प्रेम में कोई पहचान नहीं होती

सीख: प्रेम सभी भेदों को मिटा देता है।

स्टेप 8: प्रेम में सच्चाई अनिवार्य है

कबीर का प्रेम सच का प्रेम है।

झूठ, दिखावा और चालाकी से प्रेम नहीं टिकता।

वे कहते हैं:

1)    पहले खुद को पहचानो

2)    अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करो

3)    तभी प्रेम संभव है

सीख: प्रेम की नींव सच्चाई है।

 स्टेप 9: प्रेम से ही जीवन सार्थक होता है

कबीर मानते हैं कि:

v बिना प्रेम जीवन सूखा है

v बिना प्रेम भक्ति खोखली है

v बिना प्रेम ज्ञान अहंकार है

प्रेम जीवन को:

A.    अर्थ देता है

B.     दिशा देता है

C.     शांति देता है

सीख: प्रेम ही जीवन की आत्मा है।

 स्टेप 10: प्रेम ही मोक्ष का द्वार है

कबीर के अनुसार:

§  कर्म से ऊपर प्रेम है

§  ज्ञान से ऊपर प्रेम है

§  नियम से ऊपर प्रेम है

जो प्रेम में डूब गया, वही मुक्त हुआ।

 

सीख: प्रेम ही अंतिम सत्य है।

 निष्कर्ष: कबीर का प्रेम आज भी प्रासंगिक क्यों है?

आज के समय में:

*    स्वार्थ बढ़ रहा है

*    रिश्ते टूट रहे हैं

*    प्रेम व्यापार बन गया है

कबीर का प्रेम हमें सिखाता है:

1.     निस्वार्थ होना

2.     सच्चा होना

3.     भीतर झांकना

कबीर का संदेश साफ है:

> अगर ईश्वर चाहिएप्रेम करो

> अगर शांति चाहिएप्रेम करो

> अगर खुद को पाना हैप्रेम में खुद को खो दो

अगर आप चाहें तो मैं

इसी विषय पर 10 दोहों के साथ व्याख्या

प्रेम बनाम आज का प्रेम (तुलना)

कबीर का प्रेम और आधुनिक जीवन

नीचे कबीरदास जी के प्रेम-विचार को 10 प्रमुख दोहों के माध्यम से सरल, गहरी और जीवन से जुड़ी व्याख्या के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है।

 1. प्रेम गली अति सांकरी

 

दोहा:

> प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो समाय।

> जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाय॥

व्याख्या:

कबीर कहते हैं कि प्रेम का मार्ग बहुत संकरा है। वहाँमैं औरतू दोनों साथ नहीं रह सकते। जब तक अहंकार है, तब तक ईश्वर या सच्चा प्रेम संभव नहीं। प्रेम की पहली शर्त हैअपने अहंकार को मिटाना।

 2. डर और प्रेम साथ नहीं चलते

दोहा:

> जो डरै सो प्रेम करै, प्रेम करै सो डरै नाय।

> प्रेम गली में जो चलै, सीस देय ले जाय॥

व्याख्या:

प्रेम साहस मांगता है। जो व्यक्ति डर के साथ प्रेम करता है, वह प्रेम नहीं बल्कि समझौता करता है। प्रेम में पूरा समर्पण होता हैयहाँसिर देना यानी अपने स्वार्थ और भय को त्यागना पड़ता है।

 3. प्रेम ज्ञान से बड़ा है

दोहा:

> पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया कोय।

> ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

व्याख्या:

कबीर बताते हैं कि केवल शास्त्र पढ़ लेने से सच्चा ज्ञान नहीं मिलता। जो प्रेम को समझ लेता है वही सच्चा ज्ञानी है। प्रेम अनुभव है, पुस्तक का विषय नहीं।

 4. प्रेम में दिखावा नहीं चलता

दोहा:

> माला फेरत जुग भया, फिरा मन का फेर।

> कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥

व्याख्या:

बाहरी पूजा-पाठ से प्रेम नहीं जागता। जब तक मन नहीं बदलेगा, प्रेम संभव नहीं। कबीर कहते हैं कि प्रेम के लिए अंदर की माला फेरनी होती है।

 5. प्रेम भीतर है, बाहर नहीं

दोहा:

> मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।

> ना मंदिर में, ना मस्जिद में, ना काबे कैलास में॥

व्याख्या:

कबीर का प्रेम ईश्वर को बाहर खोजने से रोकता है। सच्चा प्रेम भीतर से उपजता है। जब हृदय प्रेम से भरता है, तब ईश्वर अपने आप प्रकट होता है।

 6. प्रेम में पीड़ा अनिवार्य है

दोहा:

> बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र लागै कोय।

> राम बियोगी ना जियै, जियै तो बौरा होय॥

 

व्याख्या:

प्रेम में विरह (वियोग) भी होता है। यह पीड़ा साधारण नहीं होती, लेकिन यही पीड़ा आत्मा को परिपक्व करती है। कबीर के अनुसार प्रेम की तड़प ही उसे पवित्र बनाती है।

 7. प्रेम स्वार्थ से मुक्त होता है

दोहा:

> जब लग आशा जीव की, तब लग प्रेम होय।

> आशा टूटे तब मिले, प्रेम कहावै सोय॥

व्याख्या:

जहाँ उम्मीद और स्वार्थ है, वहाँ प्रेम नहीं है। सच्चा प्रेम तब होता है जब कुछ पाने की चाह खत्म हो जाती है। प्रेम निस्वार्थता का नाम है।

8. प्रेम सभी भेद मिटा देता है

दोहा:

> जाति पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।

> मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

व्याख्या:

प्रेम जाति, धर्म, ऊँच-नीच नहीं देखता। कबीर के लिए प्रेम मानवता का सर्वोच्च रूप है। प्रेम करने वाला केवल इंसान होता है।

 9. प्रेम ही सच्ची भक्ति है

दोहा:

> प्रेम भगति जल बिनु मीन है, सुख बिनु जल जल जाय।

> कबीर प्रेम उपजै, तब लग भगति होय॥

 

व्याख्या:

प्रेम के बिना भक्ति मृत समान है। जैसे पानी बिना मछली नहीं जी सकती, वैसे ही प्रेम बिना भक्ति संभव नहीं। प्रेम ही भक्ति की आत्मा है।

 10. प्रेम में ही मोक्ष है

दोहा:

> साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय।

> मैं भी भूखा रहूं, साधु भूखा जाय॥

व्याख्या:

यह दोहा प्रेम का सामाजिक रूप दिखाता है। प्रेम केवल ध्यान में नहीं, करुणा और सेवा में भी प्रकट होता है। कबीर का प्रेम जीवन से भागना नहीं, जीवन को प्रेम से जीना है।

 निष्कर्ष: कबीर का प्रेम क्या सिखाता है? कबीरदास का प्रेम हमें सिखाता है कि

A.    प्रेम अहंकार तोड़ता है

B.     प्रेम डर मिटाता है

C.     प्रेम भेदभाव खत्म करता है

D.    प्रेम ही ईश्वर तक पहुँचाता है

E.     कबीर का संदेश साफ है:

> प्रेम करो, तभी जीवन सार्थक होगा।

 

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