सेवा में,
माननीय राज्यपाल महोदय/महोदया
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विषय:- अनुसूचित क्षेत्रों में CRPC 1973 का आदिवासी(अनुसूचित जनजातियों ) के रीति रिवाज और परंपरा, अनु 13(3) क स्थानीय विधि (local law
in force) , विद्यमान विधि(existing law) तथा CRPC 1973 के sect 5 के अनुसार विस्तार तथा अनुसूचित जनजातियों पर अब तक लगाए गए मुकदमे, केस वापस लेकर संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार अनु 21 के संरक्षण हेतु मांग।
महाशय/ महाशया,
सविनय निवेदन है कि हमारा गांव ....................... संविधान के 5वी अनुसूची , अनु 244(1) क्षेत्र है, जहां संविधान के 5वी अनुसूची के प्रावधान / अनु 244(1) के पैराग्राफ 5(1) के तहत विशिष्ट अधिनियम यानी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड 1898 तथा CRPC 1973 नागालैंड के जैसे लागू नही है,
जिस प्रकार 5वी अनुसूचित राज्य आन्ध्र प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट में डाले गए केस WP CIVIL
no 324/2003 by A. Sadguru Prasad के बाद आंध्र प्रदेश के राज्यपाल ने ट्राईबल एडवाइजरी काउंसिल के सलाह अनुसार सीआरपीसी 1973 का विस्तार अनुसूचित क्षेत्रों में उनके स्थानीय रूडी प्रथा और अंग्रेजो के द्वारा लागू विधि के अनुसार वर्ष 2004 में किया क्योंकिसुप्रीम कोर्ट के आदेश मैं सीआरपीसी 1973 को पांचवी अनुसूची के पैराग्राफ 5(1) के तहत विस्तार करने का आदेश दिया गया था।
🌻🌷इस क्षेत्र....................... , ................ राज्य में 5वी अनुसूची के प्रावधान / अनु 244(1) के पैराग्राफ 5(1) के तहत विशिष्ट अधिनियम यानी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड 1898 तथा CRPC 1973 नागालैंड के जैसे लागू नही है, तथा नागालैंड के जैसा ही इन क्षेत्रों पर deputy
commissionerके कार्यों विस्तार था, तथा IPC , CRPC के section 5 के अनुरूप अनुसूचित क्षेत्रो में स्थानीय विधि existing law विद्यमान विधि होने के कारण वर्तमान में भी यही व्यवस्था लागू है।
🌷🌻अतः वर्तमान में इसके अधीन किये जा रहे
.................. राज्य के अनुसूचित जनजातियों पर FIR(under
sect 154) , complain, वारंट, सम्मन, inquiry, इन्वेस्टिगेशन, inquest, पुलिस स्टेशन की स्थापना, यहां तक कि सेशन कोर्ट, हाई कोर्ट , मजिस्ट्रेट कोर्ट असंवैधानिक है और जोकि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड ,उड़ीसा में लागू नहीं है ।
🌻🌷 अतः इस प्रकार संबंधित पुलिस, कलेक्टर तथा संबंधित पदाधिकारियों के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 20, 21, 22 के विरुद्ध कार्य किया जा रहा है। इसलिए महाशय /महाशया से अनुरोध है कि सीआरपीसी 1898 के सेक्शन 1(2),सीआरपीसी 1972 के सेक्शन 5 के अनुरूप स्थानीय विधि( रूढ़ि custom and
usage, 13(3) क,) कस्टमरी लॉ के अनुरूप सीआरपीसी का विस्तार छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड और उड़ीसा में करें और तत्कालीन फर्जी मुकदमे जो कि विधि के अनुरूप नहीं किए गए हैं, उनकी कार्यवाही रूकवा कर उन्हें मुकदमे से मुक्त कर हिरासत से बाहर निकाले, चूंकि इसमें विधि का सारवान प्रश्न(substancial question) निहित है तथा इस बाबत जानबूझकर राज्यों, सरकार, पुलिस पदाधिकारी के द्वारा अनुसूचित जनजातियों में उनके विरुद्ध गृह युद्ध की स्थिति पैदा की जा रही है जो कि आईपीसी की धारा के तहत संगीन जुर्म है जिसके जिम्मेदार पिछले 70 साल के राज्यपाल और संबंधित ब्यूरोक्रेट्स है। मुकदमा मुक्त ना करने की स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मामला को सुप्रीम कोर्ट लेकर जाएंगे, तथा 1950, 1973
के बाद के सारे मुकदमे जिनमे crpc के तहत कारवाही की गई है उनको मुक्त करने की प्रार्थना माननीय कोर्ट से की जाएगी, साथ ही संबंधित पुलिस अधिकारियों , beurocrates , पद मुक्त राज्यपाल पर देशद्रोह का केस लगाने की मांग अदालत से की जाएगी।

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