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Sunday, October 13, 2019

पहला कहता है कर्म करो और फल की चिंता ना करो ज़ाहिर है जब फल की चिंता नही करेंगे तो फल तो मिलेगा ही पर फल कौन खाएगा यह तय नहीं है।


         पहला कहता है कर्म करो और फल की चिंता ना करो ज़ाहिर है जब फल की चिंता नही करेंगे तो फल तो मिलेगा ही पर फल कौन खाएगा यह तय नहीं है। आपकी मेहनत का फल कोई ओर खाए तो भी आपको चिंता नहीं होनी चाहिए। बचपन से यही सिखाया गया है नतीजा मेहनत कोई कर रहा है और फल कोई ओर खा रहा है ..हज़ारों वर्षों से यही होता रहा है।

       दूसरा कहता है अगर मेहनत करते है तो फल की भी चिंता कीजिए और अगर आपको फल नहीं मिले तो उसका कारण अवश्य खोजें कि आपको फल क्यों नहीं मिल रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी मेहनत का फल कोई ओर खा रहा हो।
कृष्ण ने कहा सब कुछ मेरे हाथ में है मेरी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता
बुद्ध ने कहा कोई ऊपर वाला नहीं है आपकी ज़िन्दगी के कर्ता-धर्ता सब आप ही है और सब कुछ आपके ही हाथ में  है
कृष्ण कहते हैं दुखः सुख सब मेरे हाथ में है सबका कारण मैं ही हूँ आप कुछ भी कर लें होगा वही जो मैं चाहूँगा
बुद्ध ने कहा दुनिया में दुःख है तो उसका कारण भी है और कारण है तो दुनिया में  उसका निवारण भी है और निवारण सिर्फ़ आपके हाथ में है
आपके सामने दोंनो रास्ते हैं यह आप पर निर्भर करता है कि आप किनकी बातों को मानकर आगे बढ़ना चाहते हैं

🙏🏻 नमौ बुद्धाय ।।🙏🏻
जागते रहो जगाते रहो ।।
होशियार बच्चा और रामायण की कहानी, अवश्य पढ़ें। 😀😀
अध्यापक :-बच्चों रामचंद्र जी ने समुद्र पर पुल बनाने का निर्णय लिया
पप्पू :- सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ।
अध्यापक :- कहो बेटा
पप्पू :- रामचंद्र जी का पुल बनाने का निर्णय गलत था।
अध्यापक :- वो कैसे।
पप्पू :- सर, उनके पास हनुमान थे
जो उडकर लंका जा सकते थे।
तो उनको पुल बनाने की कोई जरूरत नहीं थी
अध्यापक :- हनुमान ही तो उड़ना जानते थे बाकी रीछ और वानर तो नहीं उडते थे।
पप्पू :- सर वो हनुमान की पीठ पर बैठ कर जा सकते थे।
जब हनुमान पुरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते थे।
तो.....
अध्यापक :- भगवान की लीला पर सवाल नहीं उठाया करते नालायक
पप्पू :- वैसे सर एक उपाय और था।
अध्यापक :- (गुस्से में ).....क्या ?
पप्पू :- सर, हनुमान अपने आकार को कितना भी छोटा बड़ा कर सकते थे
जैसे सुरसा के मुंह से निकलने के लिए छोटे हो गये थे और सूर्य को मुंह में लेते समय सूर्य से भी बडे..........
तो वो अपने आकार को भी तो समुद्र की चौडाई से बड़ा कर सकते थे और समुद्र के ऊपर लेट जाते।
और सारे बन्दर 🙊 हनुमान जी की पीठ से गुजरकर लंका पहुंच जाते और रामचंद्र को भी समुद्र की अनुनय विनय करने की जरूरत नहीं पड़ती।
वैसे सर एक बात और पूछूँ?
अध्यापक :- पूछो।
पप्पू :- सर सुना है।
समुन्द्र पर पुल बनाते समय वानरों ने पत्थर पर "राम" नाम लिखा था.....
जिससे वो पत्थर पानी 💧 में तैरने लगे।
अध्यापक :- हाँ तो ये सही है।
पप्पू :- सर, सवाल ये है बन्दर भालूओ को पढना लिखना किसने सिखाया था?
और श्री राम लिखे पत्थर तैर जाते थे लेकिन श्री राम जी खुद डूब जाते थे ऐसे क्यों सर?
अध्यापक :- हरामखोर पाखंडी बन्द कर अपनी बकवास और मुर्गा बन जा
पप्पू :-ठीक है सर, सदियों से हम मूर्ख बनते रहे हैं.....
चलो आज मुर्गा  बन जाते हैं!!!!!
मन्दिर नहीं, स्कुल चाहिए !
धर्म नहीं, अधिकार चाहिए !!

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