देखते ही देखते 5 साल में देश की अदालतें कितनी बदल गईं हैं।सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा और वर्नन गोंजाल्विस को बंबई उच्च न्यायालय ने जमानत नहीं दिया।माननीय न्यायालय ने यह कहते हुए जमानत नहीं दिया कि ये सक्रिय माओवादी है ,
इन्हें कभी जमानत नहीं दिया जा सकता।अब ये कब सक्रिय थे इसका इसके जवाब में माननीय अदालत और पुलिस के पास एक खत के सिवा कुछ नहीं है,वह खत भी संदिग्ध है।जिस खत की विश्वसनीयता ही नहीं है उस खत की वजह से ये मानवाधिकार कार्यकर्ता जेल में सड़ रहे हैं।दूसरा तर्क यह दिया है कि ये लोग सशस्त्र बलों को अपना दुश्मन मानते हैं।तो माननीय न्यायालय पूरा नार्थ ईस्ट,बस्तर सशस्त्र बलों को अपना दुश्मन मानता है तो इन सबको जेल में भर देंगे?
अब उस जज के बारे में भी जान लीजिए जो ये सब बोल रहे हैं माननीय का नाम है न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल,भयंकर राष्ट्रवादी हैं।इनके कई फैसले विवादित रहे हैं।इन्होंने ही लियो टालस्टाय की किताब ‘वार एंड पीस’ को घर में रखने को अपराध माना था।मैं अरुण फरेरा और वर्नन गोंजाल्विस को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता इतना पता है ये दोनो मुम्बई में रहते हैं और सरकार विरोधी मुहिम को लेकर,नागरिक अधिकारों को लेकर 7 साल तक जेल में रहे हैं।पर मैं सुधा भारद्वाज को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ, उन्हें सक्रिय माओवादी बताना एक बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है।
जो महिला हर दिन हाई कोर्ट में उपस्थित रही हैं आदिवासियों से जुड़े मुद्दे को लेकर वह कब किस जंगल में सक्रिय थीं?या अब आदिवासियों को साथ देना ही सक्रिय माओवादी होना हो गया है? अजब देश है जिन्होंने अपना घर परिवार छोड़ वंचित तबके के साथ 24 घँटे है,एक तरह से सरकार का ही काम कर रही हैं वह अब माओवादी हैं। मतलब अगले 5 साल सुधा जेल से बाहर नहीं आएंगी।हो सकता है इन्हें भी जी एन सांईबाबा और संजीव भट्ट की तरह आजीवन कारावास की सजा सुना दिया जाये।
जी एन सांईबाबा के साथ तो और भी भयानक हुआ है।90 फीसदी विकलांग और 15 बीमारियों से घिरे हुए डीयू के प्रोफेसर जी एन सांईबाबा पिछले ढाई साल से नागपुर की सेंट्रल जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।उनके साथ जेल में अमानवीय व्यवहार किया गया,आतंकी कसाब की तरह उन्हें 14 माह अंडा सेल में रखा गया।उनकी कुछ बीमारियां इतनी गंभीर है कि अब दवाइयों का भी असर नहीं हो रहा है,लेकिन जेल से बाहर इलाज के लिए नहीं ले जाया जा रहा है।
जेल से पिछले दिनों उन्होंने अपनी पत्नी बसंता कुमारी को पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था वे आधा मर चुके हैं।प्रोफेसर का जुर्म बस इतना है कि कथित तौर पर उन पर एक बार नक्सलियों से संपर्क करने का आरोप है।इसके बावजूद उन्हें न तो सुप्रीम कोर्ट से और न ही हाई कोर्ट से जमानत दिया जा रहा है। और तो और उन्हें एक बार भी पैरोल पर बाहर परिवार से मिलने नहीं दिया गया।देश को 90 फीसदी विकलांग प्रोफेसर के जेल से बाहर आने पर खतरा महसूस हो रहा है।
देश की अदालत किस व्यक्ति को जेल में तिल तिल को मरने को विवश कर रही हैं उनके बारे में कुछ और बातें भी जान लीजिए। कश्मीर और उत्तर पूर्व में मुक्ति आंदोलनों के समर्थन में दलित और आदिवासी अधिकारों के लिए प्रचार करने के लिए सांईबाबा 2 लाख किमी से अधिक की यात्रा की थी।वे आंध्रप्रदेश के जिस परिवार से आते हैं वहाँ उन्हें बचपन में दो दिन में एक बार रोटी या चावल खाने को मिलता था।2003 में दिल्ली आने से पहले उनके पास वीलचेयर खरीदने के भी पैसे नहीं थे।लेकिन पढ़ाई में हमेशा से वह काफी तेज थे।प्रोफेसर बनने के बाद उन्होंने सैकड़ों छात्रों की मदद कीं।
तो ये आपका देश है और ये देश की माननीय अदालतें हैं।जिनका सम्मान होना था उन्हें हम जेल में सड़ाकर मार रहे हैं!

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