बिना हेलमेट... जुर्माना 1000/-
नो पार्किंग में पार्किंग करना... जुर्माना 3000/-
इन्सुरेंस नही है... जुर्माना 1000/-
शराब पी कर वाहन चलाना... जुर्माना 10000/-
नो एंट्री में वाहन चलाना... जुर्माना 5000/-
मोबाईल फोन पे बात करना... जुर्माना 2000/-
प्रदूषण सर्टिफिकेट नहीं... जुर्माना 1100/-
ट्रिपल सीट ड्राइविंग... जुर्माना 2000/-
खराब सिग्नल... कोई जिम्मेदार नहीं है!
सड़क पर गड्ढ़े... कोई जिम्मेदार नहीं है!
अतिक्रमित फुटपाथ... कोई जिम्मेदार नहीं है!
सड़क पर रोशनी नहीं... कोई जिम्मेदार नहीं है!
सड़क पर कचरा बह रहा है...कोई जिम्मेदार नहीं है!
सड़कों पर लाइट के खंभे नहीं... कोई जिम्मेदार नहीं है!
खुदी सड़क कोई मरम्मत नहीं... कोई जिम्मेदार नहीं है!
गड्ढों में गिर कर आप गिरो चोटिल हो जाएँ... कोई जिम्मेदार नही है!
आवारा गायें जानवर टकरा जाए कुत्ता काट ले... कोई जिम्मेदार नहीं!
ऐसा लगता है कि जनता ही एकमात्र अपराधी है और जुर्माना देने के लिए
उत्तरदायी है। प्रशासन, निगम और सरकार कोई जिम्मेदार नहीं है। उनके लिए कोई नियम लागू
नहीं होते हैं। वे किसी भी चूक के लिए कभी ज़िम्मेदार नहीं हैं।
क्या उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए ????
नागरिक केवल काम करेंगे... दर्द का सामना करेंगे... कर चुकाना होगा...
जुर्माने का भुगतान करेगा... सरकार की जेब भरें... और उन्हें फिर से सत्ता में वोट
दें !
आप लोगों से हाथ जोड़कर निवेदन है कि इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर
करें ताकी यह बात उन्हें भी पता चलनी चाहिए जिन्होंने यह नियम बनाया है।
ब्राह्मण आस्तित्व मे कैसे आए
आइए जानने के लिए पूरी पोस्ट पढे🙏🏽🙏🏽🙏🏽👇🏾👇🏾👇🏾👇🏾😎
सम्राट अशोक ने अपने राज्य में *पशु हत्या पर पाबन्दी लगा दी थी,
जिसके कारन ब्राह्मणों की रोजगार योजना बंद को गई थी, उसके बाद सम्राट अशोक ने तीसरी
धम्म संगती में ६०,००० ब्राह्मणों को बुद्ध धम्म से निकाल बाहर किया था, तो ब्राह्मण
१४० सालों तक गरीबी रेखा के नीचे का जीवन जी रहे थे, उस वक़्त ब्राह्मण आर्थिक दुर्बल
घटक बनके जी रहे थे, ब्राह्मणों का वर्चस्व और उनकी परंपरा खत्म हो गई थी, उसे वापस
लाने के लिए ब्राह्मणों के पास बौद्ध धम्म के राज्य के विरोध में युद्ध करना यही एक
मात्र विकल्प रह गया था, ब्राह्मणों ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस लाने के लिए...*
👇👇 अखण्ड भारत में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में
अखण्ड भारत के निर्माता चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक महान के
पौत्र , मौर्य वंश के 10 वें न्यायप्रिय सम्राट *राजा बृहद्रथ मौर्य की हत्या धोखे से उन्हीं के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र
शुंग के नेतृत्व में ईसा.पूर्व. १८५ में रक्त रंजिस साजिश के तहत प्रतिक्रांति की और
खुद को मगध का राजा घोषित कर लिया था ।*
और इस प्रकार ब्राह्मणशाही का विजय हुआ।
इसे शहारा बोला और मुलनीवासी
बेवकुफी करते रहे ?
👆🏻 उसने राजा बनने पर पाटलिपुत्र से श्यालकोट तक
सभी बौद्ध विहारों को ध्वस्त करवा दिया था तथा अनेक बौद्ध भिक्षुओ का खुलेआम कत्लेआम
किया था। पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों व यहाँ की जनता पर बहुत अत्याचार करता था और ताकत
के बल पर उनसे ब्राह्मणों द्वारा रचित मनुस्मृति अनुसार वर्ण (हिन्दू) धर्म कबूल करवाता
था।
👆🏻 उत्तर-पश्चिम क्षेत्र पर *यूनानी राजा मिलिंद
का अधिकार था। राजा मिलिंद बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। जैसे ही राजा मिलिंद को पता चला
कि पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों पर अत्याचार कर रहा है तो उसने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर
दिया। पाटलिपुत्र की जनता ने भी पुष्यमित्र शुंग के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर दिया,
इसके बाद पुष्यमित्र शुंग जान बचाकर भागा और उज्जैनी में जैन धर्म के अनुयायियों की
शरण ली*।
जैसे ही इस घटना के बारे में कलिंग के राजा *खारवेल को पता चला तो
उसने अपनी स्वतंत्रता घोषित करके पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। *पाटलिपुत्र से यूनानी
राजा मिलिंद को उत्तर पश्चिम की ओर धकेल दिया।
👆🏻 इसके बाद ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग राम ने अपने
समर्थको के साथ मिलकर *पाटलिपुत्र और श्यालकोट के मध्य क्षेत्र पर अधिकार किया और अपनी
राजधानी साकेत को बनाया। पुष्यमित्र शुंग ने इसका नाम बदलकर अयोध्या कर दिया। अयोध्या
अर्थात-बिना युद्ध के बनायीं गयी राजधानी...
👆🏻 राजधानी बनाने के बाद *पुष्यमित्र शुंग राम ने
घोषणा की कि जो भी व्यक्ति, बौद्ध भिक्षुओं का सर (सिर) काट कर लायेगा, उसे 100 सोने
की मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी। इस तरह सोने के सिक्कों के लालच में पूरे देश में
बौद्ध भिक्षुओ का कत्लेआम हुआ। राजधानी में
बौद्ध भिक्षुओ के सर आने लगे । इसके बाद कुछ चालक व्यक्ति अपने लाये सर को चुरा लेते थे और उसी सर को दुबारा राजा को
दिखाकर स्वर्ण मुद्राए ले लेते थे। राजा को पता चला कि लोग ऐसा धोखा भी कर रहे है तो
राजा ने एक बड़ा पत्थर रखवाया और राजा, बौद्ध भिक्षु का सर देखकर उस पत्थर पर मरवाकर
उसका चेहरा बिगाड़ देता था । इसके बाद बौद्ध भिक्षु के सर को घाघरा नदी में फेंकवा
देता था*।
राजधानी अयोध्या में बौद्ध
भिक्षुओ के इतने *सर आ गये कि कटे हुये सरों
से युक्त नदी का नाम सरयुक्त अर्थात वर्तमान में अपभ्रंश "सरयू" हो गया*।
👆🏻 इसी "सरयू" एवं तमसा नदी के तट पर
पुष्यमित्र शुंग के राजकवि वाल्मीकि ने "रामायण" लिखी थी। जिसमें राम के
रूप में पुष्यमित्र शुंग और "रावण" के रूप में मौर्य सम्राटों का वर्णन करते
हुए उसकी राजधानी अयोध्या का गुणगान किया था और राजा से बहुत अधिक पुरस्कार पाया था।
इतना ही नहीं, रामायण, महाभारत, स्मृतियां आदि बहुत से काल्पनिक ब्राह्मण धर्मग्रन्थों
की रचना भी पुष्यमित्र शुंग की इसी अयोध्या में "सरयू" नदी के किनारे हुई।
👆🏻 बौद्ध भिक्षुओ के कत्लेआम के कारण सारे बौद्ध
विहार खाली हो गए। तब आर्य ब्राह्मणों ने सोचा' कि इन बौद्ध विहारों का क्या करे की
आने वाली पीढ़ियों को कभी पता ही नही लगे कि बीते वर्षो में यह क्या थे
तब उन्होंने इन सब बौद्ध विहारों को मन्दिरो में बदल दिया और इसमे
अपने पूर्वजो व काल्पनिक पात्रों, देवी देवताओं
को भगवान बनाकर स्थापित कर दिया और पूजा के नाम पर यह दुकाने खोल दी।
साथियों, इसके बाद ब्राह्मणों ने मूलनिवासियो से बदला लेने के लिए
षडयन्त्र पूर्वक (रंग-भेद) वर्णव्यवस्था का निर्माण किया गया, वर्णव्यवस्था के तहत,
जाती व्यवस्था में ६००० जातीया बनाई, और उसमे ७२००० उप जातीया बनाई। और इसे ब्राह्मणों
ने इश्वर निर्मित बताया ताकि इसे सहजता से स्वीकार कर ले। मूलनिवासियो को इतने छोटे-छोटे
जातियों के टुकड़ो में बाँटा ताकि मूलनिवासी ब्राह्मणों से फिर से युद्ध न कर सके और
ब्राह्मणों पर फिर से विजय प्राप्त न कर सके।
👆🏻 ध्यान रहे उक्त बृहद्रथ मौर्य की हत्या से पूर्व
भारत में मन्दिर शब्द ही नही था, ना ही इस तरह की संस्कृती थी। वर्तमान में ब्राह्मण
धर्म में पत्थर पर मारकर नारियल फोड़ने की परंपरा है ये परम्परा पुष्यमित्र शुंग के
बौद्ध भिक्षु के सर को पत्थर पर मारने का प्रतीक है।
👆🏻 पेरियार रामास्वामी नायकर ने भी " सच्ची
रामायण" पुस्तक लिखी जिसका इलाहबाद हाई कोर्ट केस नम्बर 412/1970 में वर्ष
1970-1971 व् सुप्रीम कोर्ट 1971 -1976 के बीच में केस अपील नम्बर 291/1971 चला ।
जिसमे सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस पी एन भगवती जस्टिस वी आर कृषणा अय्यर,
जस्टिस मुतजा फाजिल अली ने दिनाक 16.9.1976 को निर्णय दिया की सच्ची रामायण पुस्तक
सही है और इसके सारे तथ्य सही है। सच्ची रामायण पुस्तक यह सिद्ध करती है कि "रामायण"
नामक देश में जितने भी ग्रन्थ है वे सभी काल्पनिक है और इनका पुरातात्विक कोई आधार
नही है।
👆🏻 अथार्त् 100% फर्जी व काल्पनिक है।
👆🏻 एक ऐतिहासिक सत्य जो किसी किसी को पता है...
जागो मुलनिवासियों, बहुजनों, अपने मुल इतिहास को जानों, पाखण्डि
ब्राह्मणवादियों के बहकावे में न आयें। अन्यथा वो दिन जब हमें पानी पीने, तन में कपड़ा पहनने का, पढ़ने-लिखने, अधिकार नहीं था, एक
जानवरों से भी बत्तर जिंदगी जीने पर मजबूर किया करते थे, ऐसा दिन आने में दूर नहीं।
को दूसरे बाबासाहेब हमें बचाने नहीं आयेंगें।
👆🏻 जागरूक रहें, जागरूक करें और अधिक से अधिक अधिक
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सम्राट अशोक ने कब कलिंग जीता और उसके 10 दिन बाद विजयदशमी क्यों
मनाया गया इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है। हाँ उड़ीसा सक्षे पटना आने में 10
दिन लग गए होंगे यह मानता हूँ।
।
श्रीलंका से साकेत आने में 10 दिन लगने का सवाल नहीं उठता। काल्पनिक
पुष्पक विमान में बैठे और फुर्र से पहुंच गए।
।
नीलकंठ के दर्शन की परंपरा का भी रावण विजय से कोई संबंध नहीं समझ
में आता, जबकि नीलकंठ मोर को भी कहा जाता है और सम्राट अशोक का वंश मौर्य वंश था यह
जग-जाहिर है।
।
न तो कोई रावण था न ही उसके 10 सिर वाली बात सही है। छठवें दिन छठी,
आठवें दिन अष्टमी, नवें दिन नवमी और दशवें दिन दशमी लॉजिकल है। इसलिए अशोक विजय दशमी
मुझे अधिक लॉजिकल लगता है।
।
राम का काल महाभारत से अधिक पुराना माना जाता है। अगर दीवाली और
दशहरे का संबंध राम से होता तो मथुरा और गोकुल में कृष्ण ने कभी तो दीवाली दशहरा मनाया
होता। पूरी महाभारत में दीपावली और दशहरा की चर्चा एक बार भी नहीं हुई।
।
जैसा कि लोग कहते हैं कि राम के अयोध्या आगमन से ही हर साल दीपावली
और दशहरा मनाया जा रहा है तो रामचरित मानस में भी इसका उल्लेख होना चाहिए था और महाभारत
में भी इसका उल्लेख होना चाहिए था।
और और तो और राम इतने बड़े भगवान थे और उन्होनें इतने बड़े रावण को
मारा था कि तीनों लोक में उनका नाम था और ताज्जुब की बात कि महाभारत की करोड़ों की जनता,
मथुरा, गोकुल और वृन्दावन की जनता हिन्दू होते हुए भी न कभी राम नवमी मनाती थी, न दीपावली
और न ही दशहरा।
।
धन्य हो पाखंडियो। किस्मत तुम्हारी अच्छी थी कि देश की जनता लॉजिक
विहीन थी और तुम्हारे गपाष्टकों को सच मानती चली गयी।v
हम एक परिवार हैं, और परिवार का हर एक सदस्य उसका बराबर का हकदार है
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आइए हम कुछ चर्चा करते हैं कौन बड़ा या छोटा यह महत्वपूर्ण नहीं बल्कि हम सब उसके लिए जवाबदार हैं हम किसी भी पहलू को मैं बनकर पूरा नहीं कर सकते बल्कि उसकेे लिए हमें हम बनकर ही रहना होगा,
यह हो सकता है कि आप किसी बात को पहले समझ गए हैं या फिर कुछ बाद में मगर जब तक हम सब मिलकर किसी कार्य को अंजाम नहीं देते वह सफल नहीं होता इसके लिए उस विचार धारा से जुड़े हर एक सदस्य का बराबर का हक होता है और उनका सबसे बड़ा रोल होता है जो उस विचार धारा से जुड़े नहीं होते हैं क्योंकि हमें उनकी आलोचना सुननी पड़ती है जिसके वजह से हम और पूरे मन से काम करने लगते हैं क्योंकि उनके द्वारा किए गए आलोचना को झूठा साबित करना होता है, इसके लिए हमें धैर्य और साहस की आवश्यकता होती है, जो विषम परिस्थितियों का सामना करने का हौसला देता है और यही हौंसला हमें लम्बी छलांग मारने में मदद करता है।
साथियों हमें धैर्य और साहस के साथ विवेक पूर्ण फैसला लेते हुए निरंतर संघर्ष करते रहना होगा ताकि आने वाला समय आज के हमारे संघर्ष को याद कर सके हमारे परिस्थितियों से रूबरू हो सके क्योंकि आप सभी जानते हैं कि हमारे पूर्वजों ने बहुत ज्यादा संघर्ष किया है, अपने संस्कृति भाषा पहचान व संवैधानिक अधिकारों संरक्षित करने के लिए अगर उनके द्वारा इतना बड़ा बलिदान न किया गया होता तो आज हम कुछ याद भी नहीं कर सकते, मगर पुरखों की कार्य हमें सदैव याद दिलाते रहते हैं कि हमारे बलिदान को व्यर्थ मत जाने देना आपस में मिलबैठ अपने हक अधिकारों को संरक्षित करना वर्ना बहुत बुरा हाल हो सकता है ।
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