जय जय विज्ञान
: एक सवाल :-चार धाम की स्थापना किसने करवाई ??
उत्तर:-
आदि शंकराचार्य ने।
दुसरा सवाल:-आदि शंकराचार्य का जन्म कब हुआ ??
उत्तर:-788
ईस्वी में।
तीसरा सवाल:-चार धाम की तीर्थ-यात्रा पर कौन अपने माँ बाप को लेकर गया ??
उत्तर:-
श्रवण कुमार।
चौथा सवाल :- श्रवण कुमार को तीर किसने मारा??
उत्तर
:- राम के पिता राजा दशरथ ने।
पांचवा
सवाल :- राम के पिता राजा दशरथ को किसने श्राप दिया कि राम को वनवास होगा।
उत्तर:-
श्रवण कुमार के मां-बाप ने।
फिर राम को वनवास त्रेता युग में हुआ, या सातवीं-आठवीं शताब्दी में।
अब क्या सही है, क्या काल्पनिक है, या सब कुछ काल्पनिक ही है।
(#आप कुछसमझे यानहीं_*** )
विचित्र
है ना
लाखों साल पहले त्रेतायुग के श्रवण कुमार
आठवीं शताब्दी में पैदा होने वाले शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारो धामो की सैर अपने माता पिता को करा रहे थे।।
जो कई हजार साल बाद बना और उस समय उसका वजूद ही नहीं था।।
इससे क्या सिद्ध होता है?
मंदिरों
से ज्यादा #स्कूल की जरूरत है।
सारी बौद्धिक चिंताएं महिषासुर की याद भर से ही क्यों तनतनाने लगती हैं?
धर्म सिर्फ आधुनिकता से दूर या नजदीक होने से कठोर या मुलायम नहीं हो जाता. यह वैचारिकी और दर्शन का मसला है. जिसका सीधा संबंध राजनीतिक व्यवस्था और सत्ता से है. और व्यवस्था सिर्फ ‘आर्थिक’ नहीं होती और न ही सिर्फ अर्थ धर्म-संस्कृति को संचालित करता है बल्कि धर्म-संस्कृति भी अर्थ को नियंत्रित करता है. इसलिए धर्म के व्यावहारिक रूपों यानी पर्व-त्यौहारों, अनुष्ठानों और धार्मिक कर्मकांडों पर चोट करने की बजाय, उसके खिलाफ सतत सुगठित अभियान चलाए बिना अगर सामंती सोच से, ब्राह्मणवादी दर्शन से लड़ने की बात कोई करता है, तो जाहिर है वह मूल रूप से धर्म के खिलाफ नहीं है.
सवाल यह है कि महिषासुर पर बौद्धिक चिंता तभी क्यों जब देश के पिछड़े और दलित-आदिवासी उसका स्मरण सामंती और ब्राह्मणवादी दर्शन के खिलाफ कर रहे हैं. सदियों से हो रहे सांस्कृतिक आक्रमण पर चुप्पी और जो अभी तक पूरी तरह से आया नहीं है उस पर प्रगतिशील चिंता. तय करो तुम किस ओर हो. महिषासुर के साथ या दुर्गा के साथ. वैसे, कुल मिलाकर तथाकथित प्रगतिशीलों की चिंता यही है कि महिषासुर के नाम पर और एक भगवान नहीं खड़ा किया जाए. तो निश्चय ही जानिए असुरों का न कोई भगवान है और न वे महिषासुर को भगवान मानते हैं. और यह भी याद रखना होगा कि आदिवासी किसी दैवी शक्ति में यकीन नहीं करते. उनका विश्वास प्राकृतिक शक्तियों में होता है. अब कुछ लोग तो भगत सिंह को भी ईश्वर बनाने पर तुले हुए हैं. तो क्या भगत सिंह को याद करना हम इस डर से छोड़ दें कि लोग उसे भगवान बना देंगे?

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