कृषि प्रधान देश के किसान आखिर गरीब क्यों है ?
एक नजर आंकड़े पर डालेंगे..
खेती करने पर प्रति एकड़ खर्च :--
जमीन किराया 25000/
जुताई....(3 बार ) = 1500/-
बीज .... = 750/-
डि ए पी खाद..
1270/-
रोपाई.. = 2600/-
उर्वरक... =
3000/-
निंदाई गुड़ाई = 2000/-
कीटनाशक दवाओं में खर्च + सपरे करवाई अन्य रख रखाव... =
4500/-
सिंचाई वगैरह में.. = 1230/-
फसल कटाई + मिसाई का खर्च ..... =
2700/-
सफाई खर्च.... = 500/-
मंडी खर्च....
= 700/-
मंडी किराया__1000/_____
योग.... =
46750/-
धान की औसत उत्पादन प्रति एकड़ 24 क्विंटल।
सरकार खरीद रही है..22 क्विं.दर = 1750 × 24क्विं. = 42000
किसान ने धान बेचा 42000
खर्च हुआ लगभग 46750
घाटा लगभग 4750
अब 4750घाटा में घर खर्च देखिए :-- बच्चों की पढ़ाई लिखाई , हल्की फुल्की स्वास्थ्य खराब होने पर दवाई , साल भर के कपड़ों का खर्च , बिजली का बिल , साक शब्जी का खर्च आदि मिला कर महीने में 3500/- तो होते ही हैं , तो 12 महीने का 40 - 42 हजार होता है।
किसान की साल भर की कमाई का बचत 7 से 10 हजार मान लें और खर्च 40-42 हजार न मानकर 30 हजार रुपये भी मानते हैं तो भी किसान हर वर्ष लाखों रुपए नुकसान उठाकर जी रहा है।
अंत में कर्जदार बनकर या तो जमीन बेचेंगे या फिर आत्महत्या करने मजबूर होंगे।
अब कर्मचारियों को देखो आठ घंटे ड्यूटी और कमाई औसतन 45 हजार रुपये और लागत खर्च एक रुपये भी नहीं ।
नेताओं का देख लो, लाख रुपये वेतन, फ्री बिजली, फ्री यात्रा, फ्री डीजल पेट्रोल, लागत कुछ भी नहीं और पांच साल के कार्यकाल में संपत्ति पांच से दस गुनी। इसके उपरांत आजीवन पेंशन।
दिन रात जी तोड़ मेहनत करने वाला किसान दिनोंदिन कमजोर होता जा रहा है, और
ये नेता लोग जोंक की तरह चिपककर किसानों का खून चूस रहे हैं ।
किसान के बेटे हो तो इतना शेयर मांगता हूँ कि यह पूरे देश में वायरल हो और सरकार की कुर्सी हिलती नजर आए।
हम इंसान नहीं हैं हजूर
रीछ, भालू, बंदर हैं
जैसा आपकी किताबें कहती हैं
हम आपके युद्धों में
मरने के लिए ही पैदा हुए हैं
हमारे लिए चिंता नहीं करें साहब
साहब हमारा क्या
हम तो ठहरे जंगल के जीव
हमारा मरना क्या जीना क्या
जब चाहे जोत दीजिए
जब चाहे खेत कर दीजिए
मारिए, काटिए, दुलारिए साहब
चाहे सूखा कर पसार दीजिए
साहब हमारा क्या
हम तो ठहरे जंगल के जीव
हम जानवर ही हैं साहब
आपकी तरह आदमी नहीं
हमारा अध्ययन कीजिए
घर लोक उत्सवों में सजाइए
स्वागत में नचाइए
बिस्तर में बिछाइए
राष्ट्रीय संग्रहालयों में दिखाइए
हमारा क्या है साहब
मार्क्स, गांधी, लोहिया, जयप्रकाश से
भला हमारी क्या रिश्तेदारी
हिंसा-अहिंसा से हमें क्या लेना-देना
हम तो ठहरे जंगली
हमें नहीं आती आपकी भाषा
हम नहीं जानते संसद
साहब सच कहते हैं
नहीं मालूम क्या होता है लोकतंत्र
यह सब तभी सुनाई देता है हजूर
जब कोई खूंखार शिकारी मरता है
मारा जाता है जब कोई बहेलिया

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