गुना की
यह तस्वीर, बच्चों
की गोद में
बाप की नहीं
हैं ,भारत की
मरी हुई आत्मा
और जनता की
है
गुना के कलेक्टर और एस एस पी को डिसमिस कर देना चाहिए। ये बीमारी ऐसे ठीक नहीं होगी। सदियों से घुसी हुई है और आज़ादी के बाद भी बढ़ती जा रही है। ये अफ़सर कुर्सी पर जाकर करते क्या हैं? क्यों नहीं तंत्र को सत्ता के ग़ुरूर से मुक्त करते हैं, वहाँ पहुँच कर भी इसकी सेवा उठाने लगते हैं। इसलिए इन दोनों अफ़सरों को नौकरी से निकालने की माँग करनी चाहिए। कोई तबादला नहीं कोई निलंबन नहीं। सीधे बर्खास्त करना चाहिए दोनों को। वैसे भी लोगों को फ़र्ज़ी केस में फँसाने के अलावा इनका कोई काम तो होता नहीं। तबादला धोखा है। इन्हें बर्खास्त करना चाहिए। इन अफ़सरों को शर्म भी नहीं आती होगी। न आएगी।
गुना का यह वीडियो और तस्वीर देखिए। पुलिस की मार खाने और कीटनाशक दवा पी लेने के बाद अपने पिता को गोद में लेकर चीखते बच्चों से आपकी आत्मा नहीं परेशान होती है तो आप इस लोकतंत्र के मरे हुए नागरिक हैं। आप एक लाश है। वैसे मुर्दा कहने और कहलाने से भी आपको फ़र्क़ नहीं पड़ता।
राम कुमार
अहिरवार और सावित्री
देवी ने तीन
लाख का लोन
लेकर एक खेत
में फसल उगाई
। जब फसल बोई गई और उगाई गई तब क्या किसी ने नहीं देखा? इनके साथ किसी ने सरकारी ज़मीन बताकर धोखा किया तो कार्रवाई उस पर होनी थी या इन गरीब पर? कोई दूसरा रास्ता नहीं था हटाने का? हर काम बर्बरता से ही क्यों ?
खड़ी फसल पर जे सी बी मशीन चलाई गई। राम कुमार ने रोका तो नहीं माने। कीटनाशक पी ली। बचाने के लिए राम के भाई आगे आए तो पुलिस लाठियाँ मारने लगी। उनके बच्चे अपने पिता को गोद में लेकर बिलख रहे हैं। इन बच्चों को भी गालियाँ दी गई हैं। राम कुमार और सावित्री देवी ज़िंदा हैं। दोनों को पुलिस ने बुरी तरह मारा है। प्रियंका दुबे ने लिखा है कि पुलिस ने महिला के कपड़े फाड़ने की भी कोशिश की है।
यह भी जानकारी है कि जिस भू माफिया ने इन्हें किराये पर दी थी वो भी अनुसूचित जाति का है। तो उस पर सीधे कार्रवाई नहीं होनी थी? प्रशासन क्या कर रहा था जब वह किसी गरीब से पैसे लेकर सरकारी ज़मीन किराए पर दे रहा था?
आप कैसा सिस्टम चाहते हैं? ऐसा कि किसी को फँसा दो, किसी के साथ ये इंसाफ़ करो ? क्या भारत इस तरह का विश्व गुरु बनेगा? और ये विश्व गुरु होता क्या है? एक थाना इस देश में बेहतर तरीक़े से नहीं चलता है। शर्म आनी चाहिए कि आप ख़ुद को जनता कहते हैं। शर्म आनी चाहिए। शर्म आनी चाहिए।
ये बच्चे बडे होकर क्या बनेगें ? आइएएस, आइपीएस, शिक्षक, राज्य पुलिस, चौकीदार या रघुनाथ, बिरसा, फूलन, सिद्धू-कान्हू, पेरियार या फिर आतंकवादी, नक्सलवादी, उग्रवादी, मार्क्सवादी ।
इनके नाजूक मन, दिल-दिमाग में क्या असर हुआ होगा जब इनके नजर के सामनें पुलिस प्रशासन के द्वारा बाप को घसीट कर लाठियों से पीटा जा रहा हो, माँ के बदन के कपड़े फाड़े जा रहे हो, फसल नष्ट किया जा रहा हो, जमीन लूटी जा रही हो, घर को शमशान बनाया जा रहा हो ।
और तो और पुलिस प्रशासन द्वारा प्रताड़ित होकर बच्चों के नजर के सामने माँ-बाप जहर खा ले तो बच्चे पर क्या असर होगा ? उन बच्चों के स्थान पर हम और आप होते तो क्या करते ??
मीडिया फोटो खींच रही है, प्रशासन मूकदर्शक है, किसान पीटा जा रहा है, पुलिस लाठियाँ चला रही है, बच्चे बिलख रहे हैं, महिला तडप रही है, घर उजड़ रहा हैं, ....!!
गुना मध्यप्रदेश, ये किसी पढ़े लिखे शिक्षित बिज़नेस पर्सन,राजनेता, फ़िल्मस्टार या किसी नामचीन व्यक्ति का परिवार थोड़ी ना है जिसे आराम से बैठाकर थाना ले जाया जाए। या अपनी गाड़ी से खुद ही थाने तक पूरी शान शौकत के साथ जाएं "गरीब हैं बेचारे रोज़ कमाते हैं रोज़ खाते हैं किसी बड़े पद वालों से भी जान पहचान नहीं होगी इसलिए वो महिला हो या पुरुष घसीट कर डंडा खाते हुए पुलिस के द्वारा ले जाया जाना, पुलिस प्रशासन के लिए शान की बात होगी। कोई नाम वाला व्यक्ति होता तो प्यार से नोटिस थमाया जाता। चुनाव के वक़्त हमारे विधायक, सांसद महोदय और राजनेताओं को याद आता है कि देश में गरीबी है। किसानों की मिट्टी भी हज़ारों रुपये क्विंटल खरीदने वाली सरकार ही है ना अभी मध्यप्रदेश में????____ ग़लत चीजों पर विरोध करिये। ताकि कल आपके साथ कुछ गलत हो तो, लोग आपके साथ खड़े हों। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों के सम्मानीय जनों से निवेदन है शासन और प्रशासन की व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए प्रयत्नशील रहिये


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