'वरना हम कल भी राजा थे और आज भी शासक होते ,,
(दादा हीरासिंह
मरकाम )
जिस समाज का शस्त्र,शास्त्र और सम्पति नष्ट कर दिया जाता है ,वह समाज सदियों तक एक अनाथ बालक सा दिशाहीनता की स्थिति में भटकता रहता है ।
गोंडवाना भू -भाग के अधिकांश हिस्सों में साढ़े सत्रह सौ वर्षो तक शासन करने गोंड राजाओं की वंशजों की जो हालात हम देख रहै हैं ,ये तो कभी किसी ने सोचा तक न था।![]()
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आजादी के बाद से हम सब जो विस्थापन ,छल ,और दोहरे मापदंड ,सौतले व्यवहार ,तथा शोषण अत्याचार का जो तकलीफ सह रहै हैं ,वह घटने के बजाये -बढ़ता जा रहा है ।![]()
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जहाँ तक हमें पढ़ने -सुनने को मिलता है कि आजादी के 16साल पहले 1931 में पूरे देश के गोंड राजाओं के अगुवाई में राष्ट्रीय स्तर का गोंडवाना महासभा का आयोजन किया गया था ,और तमाम सामाजिक कुरूतियों से दूर रहने ,एवं देश की आजादी से संबंधित विषयों पर चर्चा हुआ था ।
लेकिन आंदोलन और सभायें भी हो रहै हैं और मुद्दे आज भी वही हैं ।![]()
कहते हैं अग्रेंजी हुकूमत कभी आदिवासियों के कबिलाई एवं राज्य व्यवस्था को कंपनी के अधीन करने का प्रयास नही करते थे ,इस पर किसी दूसरे दिन रखने का प्रयास करूंगी।![]()
हमें इस बात पर चिंतन करने की आवश्यकता है कि हम आंदोलन के सफर में कहाँ से कहाँ तक चले हैं ?
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आज हम लोगों ने केवल अपने नाम और वर्चस्व के लिए अलग -अलग मंचों को बना लिये हैं ,लेकिन यह याद रहै कि जो शक्स और उसकी शक्सियत पहली बार इस रास्ते के विषय में सोचा होगा ,वह कितना चिंतन और कितने जटिलताओं को विचार करने बाद ,हमारे लिए रास्ते को तैयार किया होगा ।![]()
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हैरानी होती है कि आज हम युवा ये सोंचते है कि हमने गोंडवाना आंदोलन को मुकाम दिया है ।
हमें चिंतन करना होगा कि हम कितने बार गोंडवाना आंदोलन के लिए घर,परिवार त्याग कर देश का ,प्रदेश का ,भ्रमण किये हैं ?
कितने बार आंदोलन करते हुए जेल के चौखट को चुमे हैं और कितने बार अकारण ही अपमानित हुए हैं ?
अजीब लगता है जब हम छोटी -छोटी बातों पर फेसबुक में तर्क करते समय ,विषयवस्तु छोड़कर किसी के निजी जीवन पर ऊंगली उठाने लगते है ?
हम सब को अपने प्रतिभा के अनुसार सामाजिक ,आर्थिक ,शैक्षणिक ,धार्मिक ,राजनीतिक ,
क्षेत्रों में कार्य करना होगा ।![]()
अक्सर हम ये देखते है कि लोग लिख रहै है कि पहले हम आर्थिक ,सामाजिक और साँस्कृतिक मामलों में मजबूत बने ,फिर राजनीति करें ।
लेकिन हम सब जिन परिस्थितियों से गुजर रहै हैं वह मात्र क्रांति और आंदोलन चाहती है ,जब तक हम सब आर्थिक ,सामाजिक और साँस्कृतिक रूप से परिपक्व होंगे ,तब तक जल -जंगल -जमीन और हमारा मान ,सम्मान ,स्वाभिमान नष्ट हो जावेगा ।![]()
इसलिए जरूरी है कि हमारे कई ईकाई हों और हमारे सभी इकाइयां अलग -अलग ,क्षेत्रों में काम करते हुए ,आर्थिक ,सामाजिक, शैक्षणिक, राजनैतिक स्तर पर आंदोलन को प्रगतिशीलता
बनावें ।

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