इन 71 सालों में अगर संविधान के निर्देशक तत्व 36 और 37 को लागू कर दिया होतो, तो देश के मात्र 1% लोगों के पास देश की 58% संपत्ति और देश के मात्र 57 कारोबारियों के पास देश की आबादी के 70% लोगों के बराबर संपत्ति नहीं होती।
क्या यह संविधान का अपमान नहीं हैं?
71 साल पहले जब संविधान लागू हुआ तब सामाजिक समानता के साथ आर्थिक समानता की भी बात की गई थी। हालांकि बाबासाहब डाॅ. अम्बेडकर ने संविधान सभा को संविधान देते हुए एक बात कहीं थी, आज हम(भारत के लोग) एक विवादास्पद परिस्थिती में प्रवेश करने जा रहे हैं, जहाँ राजनितिक रूप से तो सब समान होंगे लेकिन सामाजिक और आर्थिक रूप से असमान होंगे। इस असमानता की व्यवस्था में हम और कितने साल जीयेंगे? ऐसी व्यवस्था को नष्ट करने के लिए संविधान एक बहुत बड़ा दस्तावेज हैं, बशर्तें उसे ईमानदारी से लागू करना होगा। अगर हमने उसे लागू नहीं किया और सामाजिक तथा आर्थिक असमानता की खाई और गहरी होती गई तो उससे पीड़ीत लोग राजनितिक समानता वाले इस ढ़ांचे को गिरा देंगे और इसके लिए वे लोग दोषी नहीं, बल्कि संविधान पर अमल न करने वाले लोग दोषी होंगे।
बाबासाहेब ने कहीं हुई बात आज 71 साल बाद सच साबित होती दिख रही हैं। 71 साल पहले सामाजिक और आर्थिक असमानता जितनी थी उससे आज कई गुना ज्यादा बढ़ गई हैं। यह नजारा देश में हो रहे जातीय अन्याय-अत्याचार और हाल ही में वर्ड इकोनाॅमिक फोरम के आंकडो ने और भी स्पष्ट कर दिया हैं। जिस प्रकार से लोगों का सामाजिक शोषण हो रहा है ठीक वैसे ही उनका आर्थिक शोषण भी हो रहा हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने अपने सालाना रिपोर्ट में कहा है की 103 देशों की उभरती अर्थव्यवस्था की सूची में भारत 62 वें स्थान पर हैं, जब की पडोसी देश जैसे पाकिस्तान और बंगलादेश हमसे बेहतर स्थिति में हैं। एक रिपोर्ट यह भी कहती है की भारत के १% लोगों के पास 58% संपत्ती है और बाकी 99% लोगों के पास 42% संपत्ती!
सन् 1986 से भारत सरकार ने नई आर्थिक नीति को स्वीकार किया। जिसके चलते 1990 से भारत में एल.पी.जी. लागू हुआ। भारत ने उदारतावादी नीति को स्वीकार तो कर लिया लेकिन यह उदारता केवल पूँजीपतीयों के लिए दिखाई। इस उदारतावादी नीति की वजह से भारत सरकार हर साल के बजट से लाखों-करोडों रूपया पूँजीपतीयों को देने लगी, तो दूसरी और उन्हें लाखों-करोडों का कर्ज भी माफ करने लगी। पूँजीपतीयों को इस प्रकार से दी हुई कर्ज माफी और टैक्स में दी हुई छूट की वजह से भारत को हर साल वर्ड बैंक और आई. एम. एफ. से कर्ज़ा लेना पड़ता हैं। इस कर्जे की कीमत आज 70 लाख करोड से भी ज्यादा हैं। हर साल हमें 4 लाख करोड़ से भी ज़्यादा का ब्याज देना पडता हैं। जिसका 1 सेंकड के लिए 1 लाख 45 हजार रू. होता हैं। देश के प्रत्येक नागरिक पर लगभग 59 हजार रू. का कर्ज हैं। जिन 57 लोगों के पास देश की 70 प्रतिशत संपत्ती हैं उन्होंने यह संपत्ती अपनी मेहनत से कमाई हुई नहीं है। पूँजीपती इतनी सारी संपत्ती किस प्रकार से कमा लेते है इसके बारे में नाम चाॅमस्की ने एक जगह लिखकर रखा है ‘Socialization of coast & Privatization of Profit’ यानि उत्पादन ख़र्च समाज पर डाल दो और उससे निकलने वाला मुनाफा खुद की तिजोरी में भर दो। जिस प्रकार से पूँजीपती ख़र्चे का समाजीकरण करते हैं ठीक उसी प्रकार से अगर मुनाफे का भी समाजीकरण करें तो किसी भी देश में आर्थिक असामानता नहीं बढेगी। संविधान के निर्देशक तत्व ३६ और ३७ (Directive Principle) आर्थिक समानता स्थापित करने के लिए इसी बात पर जोर देते हैं। पूँजीपतीयों को टैक्स में दी गई छूट भी इस आर्थिक असामनता को बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती हैं। भारत में अरबो-खरबों की संपत्ती जुटाने वाले कई पूँजीपती है, लेकिन टैक्स भरने वाले बहुत ही कम है। पिछले साल दुनिया के अमीर लोगों की सूची में भारत के 100 लोगों के नाम थे, लेकिन उनमें से केवल 5 ही करदाता(Taxpayers) हैं। इतना सब कुछ करने के बाद भी उनके सामने सवाल है की 99 प्रतिशत लोगों के पास 42 प्रतिशत संपत्ती आख़िर बची तो कैसे बची!
1 प्रतिशत लोगों के पास देश की 58 प्रतिशत संपत्ती होने के प्रमुखता से तीन कारण हैं। पहला तो उत्पादन खर्च का सामाजिकरण और मुनाफे का नीजिकरण, दूसरा कारण टैक्स में दी जाने वाली छूट और तीसरा कारण सरकार द्वारा पूंजिपतियों को वर्ल्ड बैंक और आई. एम. एफ. से दिया जाने वाला कर्ज। इतना सब होने के बाद अगर भारत के 57 पूँजीपतीयों के पास देश की 70 प्रतिशत संपत्ती नहीं रहेगी तो क्या होगा।
ऐसा होने से देश में समांतर अर्थव्यवस्था का निर्माण हुआ हैं। जितने रूपये का देश का बजट हैं उतनी संपत्ती तो देश के चंद मुठ्ठीभर लोगों के पास हैं। इस समांतर अर्थव्यवस्था के चलते आज सरकारें देश नहीं चला रहे, बल्कि देश के पूंजिपति ही देश की हर नीति को अपने घाटे-मुनाफे को ध्यान में रखकर तय कर रहे हैं, जिसने जनता को हाशिये पर रख दिया हैं।
भारत में तो यह मनूवादियों/पूंजिपतियों के द्वारा देश को यह लूटने की योजना हैं। आज तक भारत में जितनी भी केंद्र सरकारें बनी और जिन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया हैं, वह तो मनुवादियों/पूंजिपतियों की पार्टीयों की ही बनी हैं। इन 71 सालों में केवल बनियों की संपत्ती बढ़ते जाना मनुवादी/पूंजीवादी व्यवस्था नहीं तो और क्या हैं? जो लोग सामाजिक व्यवस्था में लाभार्थी हैं वहीं लोग राजनितिक व्यवस्था में भी लाभार्थी हैं। संविधान तो सामाजिक और आर्थिक समानता की बात करता हैं, लेकिन उसे अमल में लाने वाले लोग ईमानदार ना होने की वजह से संविधान लागू होने के 71 साल बाद भी हम सामाजिक और आर्थिक असमानता की गहराईयों को मिटाने में कामयाब नहीं हुए। जैसे बाबासाहब कहते हैं की इस असमानता से पीड़ित लोग एक दिन इस राजनितिक समानता की व्यवस्था को नष्ट कर देंगे, तो वह समय अब आ गया हैं की हम भारत के लोग इस गैरबराबरी की व्यवस्था के विरोध में विद्रोह करें!
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का सपना देश में आर्थिक गणतंत्र की स्थापना हो..…...
इसी आशाओं के साथ,
जय जोहार,
जय गोंडवाना

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