आज हम यह सोचने-समझने को विवश हैं कि हमारे त्याग के कागज पर लिखा गया संविधान कहीं निरर्थक तो नहीं हो गया हैं......?
अब ऐसा भी प्रतीत होने लगा हैं कि शासक हमसे तानाशाही मुद्रा में गुलामों की तरह व्यवहार कर रहा हैं और हमारा गणतंत्र 'प्रतिबंधित-सा' नजर आ रहा हैं।
संविधान से शक्ति प्राप्त कर उसके संरक्षक 'बिगड़े बेटे' की तरह 'बूढ़ी माँ' को ठोकर मार रहे हैं और जनता 'पराधीन माँ' की तरह गिड़गिड़ा रही हैं,तथा हम लोग हताश व निराश होकर आंखें मूंदे अपने आपको ही समर्पित करने की मुद्रा में पड़े हुए हैं।
सत्तालोलुप राजनेता,अवसरवादी नौकरशाही,कायर बुद्धिजीवी,सत्ता के दलाल एवं धन लोलुप उद्योगपतियों का पंचारिष्ट जनता के बेहोशी के समय गिद्ध बन चुका हैं,और जो हमारे साधनों,हमारी आत्मा को नोच-नोचकर चट कर रहा हैं।
क्याँ मुट्ठी भर लोगों की मनमानी करने का नाम ही गणतंत्र हैं.....?
गणों के माध्यम से चलने वाले तंत्र को ही गणतंत्र कहते हैं और अगर गणों के माध्यम से चयनित गणपति अपने आप को अहंकार में आकर गणाधिपति मानने की मीमांसा पाल के रख लें तो उसके इस मीमांसा को गणों के माध्यम से नेस्तनाबूत कर देना ही गणतंत्र की वास्तविक ताक़त हैं।
इस सबके बावजूद इस गणतंत्र दिवस के मौके पर आत्मा की टीस से या रस्मी तौर पर ही गणतंत्र का स्मरण हो गया तो इसकी रक्षा का कम से कम भारतीयों को बीड़ा तो उठा लेना चाहिए।
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की तरफ से समस्त जागरुक नागरिकों, समतामूलक समाज की स्थापना में कटिबद्ध युवाओं, ग़ैर बराबरी/पूंजीवाद और मनुवाद के खिलाफ़ लड़ाई लड़ने वाले योद्धाओं,संविधान के संरक्षकों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक हार्दिक शुभकामनाएं.......
अनिल सिंह धुर्वे
राष्ट्रीय अध्यक्ष
गोंगपा युमो

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