सर्वोच्च न्यायालय ने
एससी+एसटी+ओबीसी के खिलाफखतरनाक मनुवादी फैसला*
नई दिल्ली : देश के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में देश की
SC+ST+OBC वर्ग की 85% आबादी के विरूद्ध जातीय आधारित क्रूरतम घोर विरोधी फैसला देकर
एक बार वापस से सर्वोच्च न्यायालय का SC+ST+OBC वर्ग के विरूद्ध होने का पुख्ता प्रमाण
दे दिया है।
ज्ञात हो कि सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की खंडपीठ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एनवी रमन, जस्टिस आर
भानुमति, जस्टिस एम शांतागोदर, जस्टिस एस नजीर ने एकमत होकर पक्षपातपूर्ण तरीके से
यह असंवैधानिक फैसला दिया है कि एक राज्य का SC+ST+OBC वर्ग का व्यक्ति दूसरे राज्य
में सरकारी नौकरियों की भर्तियों में SC+ST+OBC वर्ग का नहीं माना जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला पूरी तरह से विरोधाभासी है जो
SC+ST+OBC वर्ग के योग्य उम्मीदवारों को दूसरे राज्यों में SC+ST+OBC वर्ग में नौकरियां
पाने से रोकने के लिए दिया गया है।
यह फैसला इस दृष्टिकोण से भी ज्यादा विरोधाभासी है कि अन्य राज्यों
की सरकारी नौकरियों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
ही माना जाएगा, परंतु SC+ST+OBC वर्ग के उम्मीदवारों को अन्य राज्यों में
SC+ST+OBC वर्ग का नहीं माना जाएगा।
अगर देश का सर्वोच्च न्यायालय इतना ही ईमानदार है तो उसे यह फैसला
भी लागू कर देना चाहिए कि एक राज्य का SC+ST+OBC वर्ग का व्यक्ति अन्य राज्यों मे ब्राह्मण,क्षत्री और वैश्य माना जायेगा तथा उस राज्य मे मन्दिरों मे
मठाधीश बन सकेगा।
सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला इस विधिविरुद्ध तथ्य को प्रमाणित
करने के लिए काफी है कि भारत के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को तो सम्पूर्ण भारत में
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही माना जाएगा, परंतु SC+ST+OBC वर्ग को सम्पूर्ण भारत में
SC+ST+OBC वर्ग का नहीं माना जाएगा।
क्या सर्वोच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर सकता है कि किसी एक राज्य
के SC+ST+OBC वर्ग के व्यक्तियों को अन्य राज्यों में ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य
माना जाता है जिसके कारण एक राज्य के SC+ST+OBC वर्ग के व्यक्ति को अन्य राज्यों में
SC+ST+OBC वर्ग का नहीं माना जाएगा?
ऐसे फैसलें देकर सर्वोच्च न्यायालय जनता की नजरों में स्वयं अपनी
साख खुद गिरा रहा है और सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को भी ठेस पहूँचा रहा है।
जब सम्पूर्ण भारत में सभी जाति-धर्मों के लोगों की नागरिकता एक समान
है। जाति और धर्मों के आधार पर नागरिकता विभाजित नहीं है। सभी नागरिकों के अपने-अपने
धर्म हैं। उन सभी धर्मों में जातियां हैं। उन सभी जातियों को उसी धर्म के आधार पर एक
ही नाम से सम्पूर्ण देश में जाना/पहचाना जाता है तो उन्हीं जातियों को सर्वोच्च न्यायालय
अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कैसे मान रहा है? जब सर्वोच्च न्यायालय की नजर में पूरे
देश में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एक ही जाति के हैं तो SC+ST+OBC वर्ग के लोग अलग-अलग
जाति के कैसे हो सकते हैं? जब देश एक है। संविधान एक है। कानून एक है। अनारक्षित जातियों
के नाम एक हैं, तो फिर आरक्षित वर्ग की जातियों के एक समान नामों में राज्यानुसार भेद
या अंतर क्यों है?
ऐसा लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय भी राजनीतिक दलों की भांति जातियों
को बांटने का काम करने लग गया है।
हमें सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार
नहीं है, परंतु यदि सर्वोच्च न्यायालय संविधान से परे जाकर हमारे मौलिक अधिकारों को
छीनकर हमें बेबस करेगा तो हम सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का खुलकर विरोध करेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे अतार्किक, असंगत, असंवैधानिक, मनगढ़ंत,
जातिगत फैसलें देशहित में नहीं हैं। ऐसे निर्णयों से जातीय और धार्मिक वैमनस्यता फैलने
का अंदेशा है, इसीलिए ऐसे विरोधाभासी निर्णयों का विरोध करना भी बहुत जरूरी है।
👉👉अगर आज हमने सर्वोच्च न्यायालय के इस गैरसंवैधानिक
फैसले का विरोध नहीं किया तो भविष्य में सर्वोच्च न्यायालय से आगामी फैसलें इस प्रकार
के भी आ सकते हैं कि एससी, एसटी, ओबीसी, मुसलमान, ईसाई इस देश के नागरिक नहीं हैं,
इन्हें इस देश में रहने का कोई हक और अधिकार नहीं है, इन्हें देश से निकाला जाएं।
हम सबसे पहले और सबसे अंत में भारतीय हैं। नागरिकों के अधिकारों
की रक्षा करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय है, ना कि जनता के हितों पर कुठाराघात करने
के लिए सर्वोच्च न्यायालय है।
विशेष आग्रह :- अगर आप भी उक्त निर्णय का विरोध करते हैं तो इस संदेश
को पढ़ते ही एससी+एसटी+ओबीसी+अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों के पास तुरंत आगे से आगे भेजने
का कष्ट करें।
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