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Wednesday, October 23, 2019

हरिवंशराय बच्चन की कविता ,जो अंदर तक झकझोर देती है.....ना दिवाली होती, और ना पठाखे बजते ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते


हरिवंशराय बच्चन की कविता ,जो अंदर तक झकझोर देती है.....


ना दिवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता....
…….काश कोई मजहब ना होता....

ना अर्ध देते, ना स्नान होता
ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता

जब भी प्यास लगती, नदीओं का पानी पीते
पेड़ों की छाव होती, नदीओं का गर्जन होता

ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों
का नाटक होता
ना देशों की सीमा होती , ना दिलों का
फाटक होता

ना कोई झुठा काजी होता, ना लफंगा साधु होता
ईन्सानीयत के दरबार मे, सबका भला होता

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता.....
…….काश कोई मजहब ना होता....

कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता
कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना
होता

कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता
किसी के दर्द से कोई बेखबर ना होता

ना ही गीता होती , और ना कुरान होती,
ना ही अल्लाह होता, ना भगवान होता

तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता.
ना मैं हिन्दू होता, ना तू भी मुसलमान होता

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।

हरिवंशराय बच्चन

राष्ट्रहित का गला घोंट कर

छेद करना थाली में।

मिट्टी वाले दीये जलाना
..
अबकी बार दीवाली में।

देश के धन को देश में रखना,

नहीं बहाना नाली में

मिट्टी वाले दीये जलाना

अबकी बार दीवाली में।

बने जो अपनी मिट्टी से,

वो दीये बिके बाजारों में,

छिपी है वैज्ञानिकता

अपने सभी तीज-त्योहारों में।

चायनीज झालर से आकर्षित

कीट पतंगे आते हैं,

जबकि दीये में जलकर

बरसाती कीड़े मर जाते हैं।

कार्तिक और अमावस वाली,

रात सबकी काली हो।

दीये बनाने वालों की अब

खुशियों भरी दीवाली हो।

अपने देश का पैसा जाए,

अपने भाई की झोली में।

गया जो पैसा दुश्मन देश,

तो लगेगा राइफल की गोली में।

देश की सीमा रहे सुरक्षित

चूक हो रखवाली में।

मिट्टी वाले दीये जलाना

अबकी बार दीवाली में।

ना दिवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता....
…….काश कोई मजहब ना होता....

ना अर्ध देते, ना स्नान होता
ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता

जब भी प्यास लगती, नदीओं का पानी पीते
पेड़ों की छाव होती, नदीओं का गर्जन होता

ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों
का नाटक होता
ना देशों की सीमा होती , ना दिलों का
फाटक होता

ना कोई झुठा काजी होता, ना लफंगा साधु होता
ईन्सानीयत के दरबार मे, सबका भला होता

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता.....
…….काश कोई मजहब ना होता....

कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता
कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना
होता

कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता
किसी के दर्द से कोई बेखबर ना होता

ना ही गीता होती , और ना कुरान होती,
ना ही अल्लाह होता, ना भगवान होता

तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता.
ना मैं हिन्दू होता, ना तू भी मुसलमान होता

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।

हरिवंशराय बच्चन

राष्ट्रहित का गला घोंट कर

छेद करना थाली में।

मिट्टी वाले दीये जलाना
..
अबकी बार दीवाली में।

देश के धन को देश में रखना,

नहीं बहाना नाली में

मिट्टी वाले दीये जलाना

अबकी बार दीवाली में।

बने जो अपनी मिट्टी से,

वो दीये बिके बाजारों में,

छिपी है वैज्ञानिकता

अपने सभी तीज-त्योहारों में।

चायनीज झालर से आकर्षित

कीट पतंगे आते हैं,

जबकि दीये में जलकर

बरसाती कीड़े मर जाते हैं।

कार्तिक और अमावस वाली,

रात सबकी काली हो।

दीये बनाने वालों की अब

खुशियों भरी दीवाली हो।

अपने देश का पैसा जाए,

अपने भाई की झोली में।

गया जो पैसा दुश्मन देश,

तो लगेगा राइफल की गोली में।

देश की सीमा रहे सुरक्षित

चूक हो रखवाली में।

मिट्टी वाले दीये जलाना

अबकी बार दीवाली में।

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