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Sunday, October 13, 2019

सुन लिया राजन । यह अपने आप बोल रहा है। जिसके लिए मैं रो रहा हूँ ,


सुन लिया राजन यह अपने आप बोल रहा है। जिसके लिए मैं रो रहा हूँ , जिसके लिए मैं बिलख रहा हूँ वह मुझे पहचानने से इंकार कर रहा है। जो पहला आघात था, उससे बाहर निकला। जिस शोक सागर में पहले डूबा हुआ था तो परमात्मा ने उसे दूसरे शोक सागर में डाल कर पहले से बाहर निकाला   समझा कि पुत्र मोह केवल मन का भ्रम है। सत्य सनातन तो केवल परमात्मा है।

संत महात्मा कहते हैं जो माता पिता अपने पुत्र को पुत्री को इस जन्म में सुसंस्कारी नहीं बनाते, उन्हें मानव जन्म का महत्व नहीं समझाते, उनको संसारी बना कर उनके शत्रु समान व्यवहार करते हैं, तो अगले जन्म में उनके बच्चे शत्रु वैरी पुत्र पैदा होते हैं उनके घर   अत: संतान का सुख भी अपने ही कर्मों के अनुसार मिलता है, ज़बरदस्ती मन्नत इत्यादि से नही और मिल भी जाये तो कब तक रहे इसका कोई भरोसा नहीं।

 हरि तत् सत्

Very Nice Poem About Life ,

समय चला , पर कैसे चला,
 पता ही नहीं चला ,
 ज़िन्दगी की आपाधापी में ,
कब निकली उम्र हमारी यारो ,
पता ही नहीं चला ,

कंधे पर चढ़ने वाले बच्चे ,
        कब कंधे तक गए ,
पता ही नहीं चला ,

किराये के घर से शुरू हुआ था सफर अपना ,
  कब अपने घर तक गए ,
पता ही नहीं चला ,

साइकिल के पैडल मारते हुए                      हांफते थे उस वक़्त,
कब से हम कारों में घूमने लगे हैं ,
पता ही नहीं चला ,

कभी थे जिम्मेदारी हम माँ बाप की ,
कब बच्चों के लिए हुए जिम्मेदार हम ,
पता ही नहीं चला ,

एक दौर था जब दिन में भी
            बेखबर सो जाते थे ,
कब रातों की उड़ गई नींद ,
पता ही नहीं चला ,

जिन काले घने बालों पर
     इतराते थे कभी हम ,
कब सफेद होना शुरू हो गए
पता ही नहीं चला ,

दर दर भटके थे नौकरी की खातिर ,
        कब रिटायर हो गए  समय  का ,
पता ही नहीं चला ,

बच्चों के लिए कमाने बचाने में  
                       इतने मशगूल हुए हम ,
                        कब बच्चे हमसे हुए दूर ,
पता ही नहीं चला ,

भरे पूरे परिवार से सीना चौड़ा रखते थे हम ,
अपने भाई बहनों पर गुमान था ,
  उन सब का साथ छूट गया ,
कब परिवार हम दो पर सिमट गया ,
पता ही नहीं चला ,

अब सोच रहे थे  अपने
                             लिए भी कुछ करे ,
         पर शरीर  ने साथ देना बंद कर दिया ,

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