सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति में आरक्षण मामले
की 5 अक्टूबर मंगलवार को सुनवाई जारी हुई
म.प्र.अजाक्स के प्रतिनिधियों ने अपने वरिष्ठ वकीलों के संपर्क में सीधे दिल्ली
में डेरा डाला हमारा पक्ष पहले से मजबूत।
सुप्रीम कोर्ट मध्यप्रदेश की 4 बिहार, त्रिपुरा,पंजाब, के
साथ साथ 133 याचिकाओं सुनवाई एक साथ कर रहा है। 🙏🙏
पदोन्नति आरक्षण पर मिडिया का इन्दिरा साहनी निर्णय की तरह देश वासियों में
सफेद झूठ और भ्रम फैलाकर sc/st के लोक सेवकों के पदोन्नति आरक्षण के
खिलाफ माहौल बनाने की गहरी अपराधिक साज़िश🙏🙏
पदोन्नति
आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 14
सितंबर 2021 को सुनवाई हुई और सभी पक्षकारों को अधिकतम 5 पेज का लिखित सबमिशन दाखिल करने की अनुमति
प्रदान कर दी गई है ,जो सभी पक्षकारों का अपनी बात सुप्रीम
कॉर्ट के सामने रखने का सुनहरा अवसर है परंतु देश का मीडिया पदोन्नति आरक्षण के
खिलाफ देश भर में माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है, यही
इंदिरा साहनी के निर्णय में हुआ था , इन्दिरा
साहनी केस मे सुनवाई के वक्त दो जस्टिस बोले कि हमें sc/st के पदोन्नति आरक्षण पर भी विचार करना चाहिए
परंतु नौ जजों की पीठ में से 7 जस्टिस ने यह कहकर दो जस्टिस की बात
को खारिज कर दिया कि हमारे सामने पिछड़ी जाति के आरक्षण का मामला है और हम sc/st पदोन्नति आरक्षण पर विचार नहीं कर सकते, परंतु जब जजमेंट लिखने की बारी आई तो दोनों
जस्टिस ने निर्णय में अपना विचार अंकित करा दिये, उन्होंने
कहा कि यदि पदोन्नति मेरिट पर होगी तो पदोन्नति में आरक्षण अनिवार्य है , और यदि पदोन्नति सीनियरिटी पर होगी तो अनुसूचित
जाति जनजाति का लोक सेवक अपने आप
सीनियरिटी के बेस पर पदोन्नति पा लेगा उस स्थिति में पदोन्नति में आरक्षण की
आवश्यकता नहीं है नौ जजों की संविधान पीठ के सामने दो जजों की बात का ना तो कोई
मतलब है,और
ना ही वह सुप्रीम कोर्ट का फैसला , परंतु
इस देश की मीडिया ने पूरे देश में यह सफेद झूठ फैलाया कि इंदिरा साहनी के केस में sc/st का पदोन्नति का आरक्षण समाप्त हो गया और
तत्कालीन सरकार ने उस झूठ को सच में तब्दील करने के लिए 77 वा संविधान संशोधन संसद में ले आई, और सरकार की दुर्भावना थी की पिछड़ी जाति को
नियुक्तियों में आरक्षण आर्टिकल 16 (4),, के अंतर्गत मिला है यदि आर्टिकल 16 (4 ),,के तहत आरक्षण इन्हें मिलेगा तो पिछडी जाति के
लोक सेवकों को पदोन्नति में भी आरक्षण
देना पड़ेगा , इसलिए आर्टिकल 16,( 4 ),,में संविधान में संशोधन करके पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्ति और पदोन्नति में
आरक्षण के स्थान पर sc/st शब्द अंकित करके obc का पदोन्नति आरक्षण देने का रास्ता बंद कर दिया
, परंतु
आर्टिकल 16(
4),, जो संविधान में अभी जीवित है उसके आधार
पर पिछड़ी जाति के लोकसेवक पदोन्नति में आरक्षण प्राप्त कर सकते हैं उसी तरह का
झूठ इस देश की मीडिया द्वारा अब बोला जा
रहा हैं 14 सितंबर 2021 को
जो सुनवाई पदोन्नति आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट में हुई थी उसका आदेश सुप्रीम
कोर्ट की साइट पर अपलोड होने से पूर्व
मीडिया ने तरह-तरह के झूठ बोलने शुरू कर दिए हैं जिनमें एक सबसे बड़ा झूठ
कि सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि हम एम नागराज के निर्णय के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं
करेंगे, जबकि यह कहना केंद्र सरकार का है कि 16,(4),,16(4अ),, 16(4ब),, में सुप्रीम कोर्ट जो निर्णय दे चुकी है उन्हें
छेड़ने की जरूरत नहीं है, यही केन्द्र सरकार की अपराधिक साज़िश
है, संविधान के विरुद्ध सभी निर्णय निरस्त होने
चाहिए । परन्तु केंद्र सरकार संसद और सुप्रीम कोर्ट में अलग अलग बात करती है,संसद में sc/st और
सुप्रीम कोर्ट में तथाकथित अपर कास्ट की बात करती है,केंद्र के इस दोहरे चरित्र ने संविधान को
नेस्तनाबूद कर दिया , सैद्धांतिक और कानूनी रूप से एम.नागराज
का पूरा निर्णय लगभग समाप्त हो गया है एम.नागराज निर्णय के अनुसार पदोन्नति में
आरक्षण देने से पूर्व बैकवर्ड नैस का डाटा,पदोन्नति
से पूर्व एफिशिएंसी चेक करने का डाटा और sc/st का
पर्याप्त प्रतिनिधित्व का डाटा ,तीन शर्तों के बाद ही देश के मूल
संविधान का अनुच्छेद 16(4),,केंद्र सरकार द्वारा आर्टिकल 16(4अ),,और 16(4ब),, के
संविधान संशोधन वैध है यह कहना है एम.नागराज केस में सुप्रीम कोर्ट का।जो पूर्णतया
असंवैधानिक है ,
बैकवर्डनेस के डाटा के मामले मे इंदिरा
साहनी के निर्णय में ही तय कर दिया गया था की बैकवर्डनेस और क्रीमीलेयर sc/st पर लागू नहीं होता है उसी के आधार पर जरनैल
सिंह के ही केस में बैकवर्डनैश के डाटा की जरूरत नहीं है सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय
किया जा चुका है ,अब बात ,एफिशिएंसी
ऑफ वर्क के डाटा के मामले में पवित्रा सेकंड के केस में निर्णय आ चुका है उसमें
कहा गया है कि किसी लोकसेवक की तैनाती से पूर्व उसकी कार्य क्षमता चेक करना संभव
नहीं है, कार्य क्षमता
पदोन्नति होकर सेवा में आने के बाद ही चैक हो सकती है इसलिए उस शर्त को भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा
निरस्त कर दिया ,अब एक अंतिम शर्त बचती है पदोन्नति के पदों पर sc/st के लोगों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व इस शर्त
के मामले में पूर्व से ही सर्वविदित है कि
sc/st एक्ट का पदोन्नति का आरक्षण रोस्टर के द्वारा
लगाया जाता है और रोस्टर में sc/st के पद निर्धारित है।जितना आरक्षण sc/st का है उससे अधिक लोग पदोन्नति का आरक्षण पा ही
नहीं सकते यह बात सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के एटोनिजनर्ल आनरिकार्ड यह बात कह चुका है ,इस प्रकार एम. नागराज का निर्णय लगभग पूरी तरह
से ध्वस्त हो चुका है,अब केंद्र सरकार एम.नागराज निर्णय में
क्या बचाना चाहती है । केंद्र सरकार सिर्फ तथाकथित अपर कास्ट के लोकसेवको के साथ
साथ सुप्रीम कोर्ट को गुमराह कर रही है
जिसके आधार पर उतर प्रदेश, उत्तराखंड मध्यप्रदेश सहित देश के
ज्यादातर राज्यों का पदोन्नति आरक्षण समाप्त हुआ था । पदोन्नति के आरक्षण की
संवैधानिकता पर जिस प्रकार एम. नागराज का निर्णय आया है और संविधान संशोधनों को
माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा एम.नागराज के केस में आर्टिकल 32 के तहत सुना था यह पूर्णत विधि विरुद्ध है और
संविधान का अतिक्रमण है आर्टिकल 368 के तहत जो भी संविधान संशोधन होते हैं
उनको आर्टिकल 13(
4 ),के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसमे
डिलिसन ,मोडिफिकेशन और एडिसन नही हो सकता । उनकी रिव्यू
की पावर संविधान ने सुप्रीम
कोर्ट को नहीं दी ,नियुक्ति और
पदोंनती के अधिकार संविधान के आर्टिकल 16(4),, से
मिले है।जो संविधान के अध्याय तीन मौलिक अधिकारों में लिखे गये है मौलिक अधिकारों का रिव्यू नही हो सकता,सुप्रीम कोर्ट के पास मौलिक अधिकारों में कटौती
की पावर ही नही है,बल्कि उनको प्रोटेक्ट करने की
जिम्मेदारी है,
परन्तु जिस प्रकार देश के हाई कोर्ट और
सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकार आर्टिकल 16(4),, के
अधिकारों का अतिक्रमण करते आ रहे भारत का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता हे, पदोन्नति में आरक्षण देने में केंद्र और किसी
राज्य सरकार को कोई तकलीफ़ नहीं थी देश में यह बिमारी देश के हाई कोर्ट और सुप्रीम
कोर्ट द्वारा गैरकानूनी ढंग से पैदा की हुई है अब इसके इलाज से मां सुप्रीम कोर्ट
को भागना नहीं चाहिए जो संविधान के अनुसार है वह निर्णय कर देना चाहिए। संविधान
सुप्रीम है सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संविधान के अनुसार काम करने की शपथ लेते हैं , संविधान बचाओ,आरक्षण
बचाओं, की मूल धारणा के अनरूप मध्यप्रदेश राज्य के
अधिकारी एवं कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण मामले में (अजाक्स ) संगठन भी
पक्षकार है। 2018 में तीन जजों की बैंच ने मध्यप्रदेश के मामले
में सैद्धान्तिक रूप स्वीकार किया है की वँहा बेकवर्डनेश डाटा और एफिशियंसी वर्क
के डाटा प्रस्तुत करने की आवश्यकता नही है ।जिसमें लगभग पहले भी वकीलों की फीस 2 करोड़ रुपये अदा की जा चुकी है अजाक्स के
प्रतिनिधि लगातार वरिष्ठ अधिवक्ताओ के माध्यम से समय समय पर अपना पक्ष माननीय
न्यायालय के समक्ष रख रहा है पुनः 5
अक्टूबर से मामले को जरनैल सिंह के साथ बिहार त्रिपुरा, पंजाब तथा 133
याचिकाओं के एक साथ सुना जा रहा है जिसका सबमिशन वकीलों के माध्यम से तैयार करवाने
हेतु अजाक्स के प्रतिनिधि दिल्ली में डेरा डाले हुवे है जो अपना पक्ष पूरी मजबूती
के साथ रखने हेतु अपने वरिष्ठ वकीलों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में नजर बनाए हुवे है। अब पुनः लगातार सुनवाई चल
रही है जिसके लिए पुनः वकीलों की फीस करीब करीब 1.5
करोड़ रुपये के आसपास अनुमानित भुगतान करना है । अजाक्स संगठन के पास धन,फंड का
अभाव है लगातार प्रदेश के अनेकों जिलों से सहायता राशि जिला एवं प्रान्तीय
कार्यालय में जमा की जा रही है जिससे वकीलों की फीस का भुगतान निरन्तर
प्रत्येक सुनवाई पर किया जा रहा है अतः जो
सम्मानित साथी सामाजिक संगठन उक्त लड़ाई लड़ने के लिए अजाक्स संगठन को इसमें किसी भी प्रकार से सहयोग करना चाहते हैं
उनका स्वागत है ।
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प्रान्तीय कार्यालय भोपाल खाता संख्या👇🏿👇🏿
30332925970
IFSC Cood SBIN0001308
TT NAGAR BHOPAL
में सीधे जमा कर सकते है।
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इंदौर संभाग के समस्त अधिकारी एवं कर्मचारी व
संगठन पदाधिकारी अपनी अपनी जिलाशाखा के स्थानीय बैंक शाखाओं के स्थानीय खातों में
सीधे सहयोग राशि जमा कर सकते या वँहा के जिलाध्यक्षगणों को नगद उपलब्ध करवा कर
रसीद प्राप्त सकते है जिला शाखाओं के माध्यम से राशि प्रान्तीय कार्यालय को उपलब्ध
करवादी जावेगी।
पदोन्नति में आरक्षण *: सुप्रीम कोर्ट ने
*केंद्र से पूछा- प्रतिनिधित्व निर्धारण के लिए क्या किया?
जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ
सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी समुदाय के लिए पदोन्नति में आरक्षण से जुड़ी
याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
पीठ ने कहा कि वह इस विवादास्पद मुद्दे पर
फैसला करेगी कि आरक्षण, नागराज मामले में दिए फैसले के अनुसार, एक समुचित अनुपात या प्रतिनिधित्व की
पर्याप्तता के आधार पर होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से
उन कदमों की जानकारी मांगी, जो केंद्रीय नौकरियों में अनुसूचित
जाति व अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का आकलन करने के
लिए उठाए गए हैं।
पीठ ने
सरकार से कहा कि एससी-एसटी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए साल
2006 के नागराज मामले में संविधान पीठ के फैसले का पालन करने के लिए की गई कवायद
की जानकारी उपलब्ध कराए।
जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ
सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी समुदाय के लिए पदोन्नति में आरक्षण से जुड़ी
याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
पीठ ने कहा कि वह एक इस विवादास्पद मुद्दे पर
फैसला करेगी कि आरक्षण नागराज मामले में दिए फैसले के अनुसार, एक समुचित अनुपात या प्रतिनिधित्व की
पर्याप्तता के आधार पर होना चाहिए।
पीठ ने कहा कि हम यह जानना चाह रहे हैं कि
नागराज मामले में फैसले के बाद प्रतिनिधित्व की पर्याप्तता का पता लगाने के लिए
क्या किया गया है?
अगर हम आरक्षण की पर्याप्तता का निर्धारण
जनसंख्या के आधार पर करते हैं तो इसमें बड़ी खामियां हो सकती हैं। केंद्र को
पर्याप्तता का अर्थ समझने के लिए दिमागी कसरत करनी चाहिए थी।
केंद्र
की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बलबीर सिंह ने कहा कि इसी कारण आनुपातिक
परीक्षण लागू नहीं किया गया था।
इस पर पीठ ने कहा कि पदों पर रोस्टर तैयार होना
चाहिए। यह एक मानदंड हो सकता है। लेकिन दुर्भाग्य से आंकड़े कहीं भी मौजूद नहीं
हैं। हम देखना चाहते हैं कि आरक्षण जारी रखने के लिए आपके पास क्या औचित्य है।
इसके
बाद अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि वह आरक्षण जारी रखने के लिए
आंकड़े और कारण पेश करेंगे।
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