अखंड भारत का आह्वान : डॉ.
आंबेडकर का संविधान सभा में भाषण
9 दिसंबर, 1946 के दिन संविधान
सभा का प्रारंभ हुआ। संविधान सभा में
कुल 296
प्रतिनिधि चुने गए थे। जिसमें संविधान सभा के सबसे वयोवृद्ध सदस्य माननीय
सच्चिदानंद
सिन्हा की अध्यक्षता में बैठक हुई। 11-12-1946 के दिन डॉ. राजेन्द्र प्रत्ताद
का संविधान सभा
के कायमी प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया।
जब संविधान सभा मिलने वाली थी तब डॉ. आंबेडकर विचार मंथन में अटके हुए
थे।
उनको संविधान सभा में दाखिल होना था, नहीं ऐसे दुविधाचक्र में पड़े। ऐसे
वक्त शैड्यूल्ड
कास्टस फेडरेशन के नेता उनको मुंबई में मिले। उनको समझाया कि दलित वर्ग
अल्पसंख्या में
है। उनके न्याय और हिफाजत के लिए आप संविधान सभा में हिस्सा लो, यही ज्यादा
बेहतर
रहेगा। उत्त के बाद शैड्यूल्ड कास्टस फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी माननीय
पी.एन. राजभोज ने
पूना से घोषणा की, "बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संविधान सभा में हिस्सा
लेने जाएंगे। उन्होंने
रविवार के दिन मुंबई से दिल्ली जाने के लिए विदा ली।
13 दिसंबर, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधानिक आदर्शों का बयान जारी करते
हुए 8 मुद्दों
का एक प्रस्ताव संविधान सभा में पेश किया, जिसके ऊपर संविधान सभा में
चर्चाएं हुई। देश के प्रसिद्ध
संविधानविद् और धाराशास्त्री डॉ. एम.आर. जयकर इस प्रस्ताव पर अपने विचार
अभिव्यक्त करने
के लिए खड़े हुए तब सरदार पटेल सहित सभी ने उनके भाषण के बारे में विरोध
व्यक्त किया। उनको
ऐसा लगा कि अब उनकी बात लोकप्रिय नहीं मगती। उसके बावजूद, उन्होंने अपना
प्रयास जारी रखा
कि मुस्लिम लीग एवं राजवियों का सहयोग हमें लेना चाहिए।" उसके बाद
तीन दिन तक सर्वमाननीय
गोविंद वल्लभ पंत, पाभिसीतारोगेया, सोमनाथ लाहीरी आदि के प्रवचन हुए।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
के प्रवचन के बाद अध्यक्षश्री ने डॉ. अम्बेडकर (बंगाल) को बोलने के लिए
खड़ा किया।
अत्यंत गंभीर मुद्रा में बोलते
हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा-
"हम राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक बात पर विभाजित हैं। एक दूसरे
को साथ लड़ते
हैं और इतना कहना चाहता हूँ कि मैं भी उनको पक्ष का एक नेता हूँ। लेकिन
यह सब होने
के बावजूद मुझे विश्वास है कि समय और परिस्थिति के बदलाव से कोई भी शक्ति
इस देश
को राष्ट्र होने में रोक नहीं सकेगी। यह कहने में मुझे थोड़ी भी आपत्ति
नहीं कि अलग-अलग
जातियों एवं धर्म होने के बावजूद भी हम किसी भी स्वरूप में एक राष्ट्र
बनकर ही रहेंगे। (तालियों
की गड़गड़ाहट) मुझे यह कहने में भी डर नहीं कि भारत के विभाजन के लिए
मुस्लिम कहने
में भी डर नहीं कि भारत के विभाजन के लिए मुस्लिम लीग ने आंदोलन चलाया।
फिर भी किसी
न किती दिन मुसलमानों को इस बात का अहसास अवश्य होगा कि, ये खुद ही ऐसा
सोचेंगे
कि अखंड भारत ही उनके लिए उत्तम और श्रेष्ठतर है। (तालियों की सतत गड़गड़ाहट)
हममें
से किसी को भी संदेह करने की जरूरत नहीं कि किसी को संदेह होना भी नहीं
चाहिए। जब
तक अंतिम लक्ष्य का सवाल है तब तक हमारी समस्या यह है कि आज अलग-अलग विचारधारा
के लोग अलग-अलग रहे हैं, किस प्रकार से कोई एक ही निर्णय ले और ऐसे कदम
पर चले
कि जहां चलने से एकता हो।"
डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा में पहली बार दिए भाषण ने पूरे भारत में अत्यंत
सुंदर
प्रत्याघात छोड़े। राजेन्द्र प्रसाद और सरदार वल्लभभाई पटेल उनके इस भाषण
से अत्यंत प्रभावित
हुए थे। महात्मा गांधीजी तो पहले से खुश इसलिए थे कि मुस्लिमों के कदम
पर चलकर
आंबेडकर और उनके राजनीतिक पक्ष शैड्यूल्ड कास्टस फेडरेशन ने संविधान सभा
का
बहिष्कार नहीं किया था।" इतना होने के बावजूद भी गांधीजी अप्रैल,
1947 तक आंबेडकर
के साथ कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं थे। कांग्रेस के जिन महारथियों
ने कभी
डॉ. आंबेडकर को देखा भी नहीं था या उनके भाषण भी नहीं सुने थे, ऐसे ख्यातनाम
कांग्रेसी
नेता भी आंबेडकर का यह भाषण सुनकर दिग्मूढ़ हो गए थे। उनकी सोच भी बदल
गई थी।
एक वक्त डॉ. आंबेडकर के सामने काउंटर सत्याग्रह करने की धमकी देने वाले
लाहौर कांग्रेस
हरिजन लीग के जनरल सेक्रेटरी और संविधान सभा के सदस्य माननीय पृथ्वी सिंह
आजाद ने
डॉ. आंबेडकर को कांग्रेस में जुड़ने की अपील करते हुए कहा कि उनका स्थान
अगर कांग्रेस में
हो तो वे हरिजनों के लिए अच्छा कार्य कर सकते हैं। मुझे विश्वास है कि
वो उनके विचारों में
से वापस आएंगे। मुझे उससे भी ज्यादा आशा है कि डॉ. आंबेडकर अपने पुराने
खयालात छोड़ेंगे।
इतना ही नहीं, कांग्रेस के साथ जुड़कर राष्ट्रवादी हरिजनों की पंक्ति
में आ जाएंगे।
भारत के हरिजन सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से महान हिन्दू समाज का
एक हिस्सा
हैं। मेरी मान्यतानुसार कांग्रेस के सभी सदस्य : हाईकमाण्ड सहित राजनीतिक,
आर्थिक और
सामाजिक तरीके से हरिजनों के उत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील हैं, जिसके द्वारा
हरिजन योग्यतम
संरक्षण और न्याय हासिल कर सकेंगे।
देश के ख्यातनाम कांग्रेसी धाराशास्त्री, डॉ. एम.आर. जयकर की संविधान
सभा में कामगीरी
संतोषकारक नहीं थी। उससे सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
नाराज हुए थे।
वैसे भी भारत का संविधान लिखने में डॉ. एम.आर. जयकर का योगदान कुछ नहीं
था।" वे
कांग्रेस की टिकिट पर चुने गए होने से ऐसी बात नहीं थी कि वह अपने विचार
निर्भयता से
नहीं कर सके। उन्होंने एक खत में अपने हृदयरूपी क्रोधाग्नि निकालते हुए
कहा था, “अब मेरे
और दिल्ली के बीच अंतर बढ़ता ही जा रहा है।" ऐसे संजोगों में जयकर
संविधान सभा के सदस्य के रूप में इस्तीफा देना ही मुनासिब समझते होंगे।
आंबेडकर के उपरोक्त भाषण ने राजनीतिक समीकरण ही बदल दिए। अब आगे देखते
हैं।
नेशनल स्टैण्डर्ड नामक दैनिक ने नोंध किया है कि संविधान सभा की अंतिम
बैठक में डॉ. आंबेडकर
ने बुद्धिशाली भाषण देकर सदन को आश्चर्यचकित कर दिया है। उनका यह भाषण
अति उच्च
कक्षा का एवं चाबी रूप साबित हुआ है। इतना ही नहीं, महान राजनीतिक व्यक्ति
के रूप में
डॉ. आंबेडकर की छाप अंकित हुई है। यह भाषण नया वातावरण सर्जन करने में
मददगार होगा।
उनकी 'भारत की एकता' के लिए दलील और आग्रह, आशावादिता आदि देखते हुए डॉ.
आंबेडकर
ने नया प्रज्जवलित प्रकाश फैलाया है। जो दिखाता है कि डॉ. आंबेडकर नए
राजकीय परिवर्तन की
ओर आगे बढ़ रहे हैं। जो मुट्ठीभर कुछ लोग इस लघुमति नेता के विचारों को
मानते नहीं थे, वह
अब देश की आजादी और लोकशाही के लिए आबेडकर को स्वीकारने लगे हैं।
मुट्ठी भर लोग बाबा साहब अम्बेडकर, फुले, शाहू,के विचारों को मिटाना चाहते
हैं,
नादान हैं वो लोग जो समंदर को सुखाना चाहते हैं!
नमो बुद्धाय जय भीम 🙏
🙏जय संविधान ✊
🙏मेरी शान भारत का संविधान🙏
🙏 जय संविधान जय संविधान
भारत का संविधान, भाग 3, मौलिक
अधिकार, अनुच्छेद 19(1)- सभी नागरिकों को--
(क) वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का,
(ख) शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का,
(ग) संगम या संघ बनाने का,
(घ) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का,
(ङ) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने का,
[और]*
**
(छ) कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार होगा।
[(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार
के प्रयोग पर [भारत की प्रभुता और अखंडता]*, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ
मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान,
मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान
विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन
अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी ।]**
(3) उक्त खंड के उपखंड (ख) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार
के प्रयोग पर [भारत की प्रभुता और अखंडता]** याट लोक व्यवस्था के हितों में युक्तियुक्त
निर्बन्धन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव
नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित
नहीं करेगी।
(4) उक्त खंड के उपखंड (ग) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार
के प्रयोग पर [भारत की प्रभुता और अखंडता]** याट लोक व्यवस्था या सदाचार के हितों में
युक्तियुक्त निर्बन्धन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन
पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य
को निवारित नहीं करेगी।
(5) उक्त खंड के [उपखंड (घ) और उपखंड (ङ)]*** की कोई बात उक्त उपखंडों
द्वारा दिए गए अधिकारों के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में या किसी अनुसूचित जनजाति
के हितों के संरक्षण के लिए युक्तियुक्त निर्बन्धन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित
करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं
डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं
करेगी।
(6) उक्त खंड के उपखंड (छ) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार
के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में युक्तियुक्त निर्बन्धन जहाँ तक कोई विद्यमान
विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन
पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य
को निवारित नहीं करेगी और विशिष्टतया [उक्त उपखंड की कोई बात--
(i) कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने के लिए आवश्यक वृत्तिक
या तकनीकी अर्हताओं से, या
(ii) राज्य द्वारा या राज्य के स्वामित्व या नियंत्रण में किसी निगम द्वारा
कोई व्यापार, कारबार, उद्योग या सेवा, नागरिकों का पूर्णतः या भागतः अपवर्जन करके या
अन्यथा, चलाए जाने से,
जहाँ तक कोई विद्यमान विधि संबंध रखती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव
नहीं डालेगी या इस प्रकार संबंध रखने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं
करेगी।]**
संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 2 द्वारा
(20-6-1979 से) अंतःस्थापित।
* *संविधान (चवालीसवाँ संशोधन)
अधिनियम, 1978 की धारा 2 द्वारा (20-6-1979 से) उपखंड (च) का लोप किया गया।
* संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 3 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव
से) खंड (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित।
** संविधान (सोलहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित।
** *संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 2 द्वारा
(20-6-1979 से) ''उपखंड (घ), उपखंड (ङ) और उपखंड (च)'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
** संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 3 द्वारा कुछ शद्बों
के स्थान पर प्रतिस्थापित।
~ अनुच्छेद 19 - वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण
- भाग III – मूलभूत अधिकार (12 – 35)
19. Protection of certain rights regarding freedom of speech, etc.
(1) All citizens shall have the right
(a) to freedom of speech and expression;
(b) to assemble peaceably and without arms;
(c) to form associations or unions or [7]co-operative societies;
(d) to move freely throughout the territory of India;
(e) to reside and settle in any part of the territory of India;
[3]and[4]
(g) to practise any profession, or to carry on any occupation,
trade or business.
[1](2) Nothing in sub-clause(a) of clause(1) shall affect the
operation of any existing law, or prevent the State from making any law, in so
far as such law imposes reasonable restrictions on the exercise of the right
conferred by the said sub-clause in the interests of the sovereignty and
integrity of India, the security of the State, friendly relations with foreign
States, public order, decency or morality, or in relation to contempt of court,
defamation or incitement to an offence.
(3) Nothing in sub-clause(b) of the said clause shall affect the
operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State
from making any law imposing, in the interests of the sovereignty and integrity
of India or public order[5], reasonable restrictions on the exercise of the
right conferred by the said sub-clause.
(4) Nothing in sub-clause(c) of the said clause shall affect the
operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State
from making any law imposing, in the interests of the sovereignty and integrity
of India or public order or morality, reasonable restrictions on the exercise
of the right conferred by the said sub-clause.
(5) Nothing in sub-clauses(d)and(e)[6] of the said clause shall
affect the operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent
the State from making any law imposing, reasonable restrictions on the exercise
of any of the rights conferred by the said sub-clauses either in the interests
of the general public or for the protection of the interests of any Scheduled
Tribe.
[2](6) Nothing in sub-clause(g) of the said clause shall affect
the operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State
from making any law imposing, in the interests of the general public,
reasonable restrictions on the exercise of the right conferred by the said sub-clause,
and, in particular, nothing in the said sub-clause shall affect the operation
of any existing law in so far as it relates to, or prevent the State from
making any law relating to,
(i) the professional or technical qualifications necessary for
practising any profession or carrying on any occupation, trade or business, or
(ii) the carrying on by the State, or by a corporation owned or
controlled by the State, of any trade, business, industry or service, whether
to the exclusion, complete or partial, of citizens or otherwise.
-----
1. Ame. by First Amendment Act, s.3 (w.e.f. 18-06-1951).
2. Added by First Amendment Act, s.3 (w.e.f. 18-06-1951).
3. Ins. by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act, 1978,
s.2 (w.e.f. 20-6-1979).
4. Sub-clause(f) omitted by s.2, ibid. (w.e.f. 20-6-1979).
5. Ins. by the Constitution (Sixteenth Amendment) Act, 1963, s.2.
6. Subs. by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act, 1978,
s.2, for "sub-clauses(d),(e)and(f)" (w.e.f. 20-6-1979).
7. Ame. by Ninety Seventh Amendment Act, s.2 (w.e.f. 12-01-2012).


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