नर्मदा नही,नरमादा नदी है ➖जानिये - jagoindia Sarkari Yojana : नई सरकारी योजना 2025

Breaking

more info click below

Wednesday, October 14, 2020

नर्मदा नही,नरमादा नदी है ➖जानिये

 

नर्मदा नही,नरमादा नदी है

 ➖➖➖➖➖➖➖

🎯 जानिये

आज जो भी शब्द या नाम जिस किसी नदी को दिये हुवे है,वह सभी को पता होते है लेकिन उसके पीछे की वजह और समय के साथ नामो में होता गये बदलाव के बारे में बहोत ही कम लोग जानते है।

 

ऐसाही कुछ कुदरती राझ इस नरमादा नदी मतलब आज की नर्मदा नदी के साथ जुड़ा हुवा है।

1) इस नदी को नरमादा नदी ही क्यों बोला गया है?

2) इसका उगम कहासे हुवा है?

3) जहासे उगम हुवा है वो कोनसी जगह है और इतिहास में और वर्तमान में भी कोनसे समाज से जुडी हुई थी और आज भी है?

4) नर और मादा मतलब सल्ला और गांगरा को सर्वोच्च प्रकृती शक्ती का अंश मानने वाला कोनसा समाज है?

ऐसे कयी सवाल खड़े होते है ,जिसका जवाब इतिहास के  गहराई में जाकर सबूतों के साथ अभ्यास करना पड़ता है।

तब सभी सवालों के जवाब भी मिल जाते है और हम सच्चाई से वाकिफ भी हो जाते है।

 

इस धरती पर कुदरती शक्ती को ही सर्वोच्च शक्ती माननेवाला और उसकी पूजा करनेवाला अगर कोई समाज है तो वह गोंडबाना लैंड का गोंड समूह है।

जाहिर है कि जो समाज कुदरत को ही सबकुछ मानता हो,कुदरती नीयमो का सदियों से पालन करते आया हो,कुदरत को ही फड़ापेन बोलकर सदियों से लेकर आजतक और आज भी पूजता हो,वह कुदरत के सभी अंशों को जरूर महत्व देता है।

 

इस सर्वोच्च प्रकृती शक्ती फड़ापेन के अंश नर और मादा होते है जिनकी वजह से यह पूरी दुनिया/संसार अस्तित्व में है।

उसी कुदरती नरमादा शक्ती को गोंड समूह सदियों पूजते आया है।

उसी नरमादा शक्ती को आव्वाल बाबो मतलब आज के मा और बाप रूपी शब्दो को पूजते आया है जिन दो शक्तियों की वजह से ही वह खुद जन्म लें पाये है। उनकी सेवा करते आया है इसलिये आज भी यह गोंड समूह जय सेवा कहकर गर्व महसूस करते है।

इसी नरमादा रूपी कुदरती अंशों को गोंड समूह सल्ला गांगरा बोलता है।

 

रही बात उस नरमादा नदी के उगमस्थान की तो वो अमरकंटक भी गोंड समूह का ही सदियों से एक महत्वपूर्ण पूजनीय स्थल था और आज भी है जिसे गोंडी भाषा में आमोररकोट मतलब हमारा स्थान बोला जाता है।

उसी गोंडी भाषा के सल्ला और गांगरा को आज नरमादा बोला जाता है।

नदी को गोंडी भाषा में गंगा बोला जाता है।

मतलब आज की गंगा नदी का नाम भी एक गोंड समूह की ही देन साबित होता है।

 

सदियों पहले इन सभी रहस्यों का सम्बन्ध सीधे सीधे कुदरती शक्ती को ही सर्वोच्च प्रकृती शक्ती माननेवाले गोंड समूह के गोंड,गोंडी,गोंडबाना से मतलब गोंड समूह से,गोंडी भाषा से और गोंडबाना लैंड से था।

लेकिन आर्यो की कूटनीती ने ,छल कपट से इस गोंडबाना को नष्ट कर दिया है।

गोंड समूह से जो भी बाते सम्बंधित थी उन सभी बातों को मिटाने के लिये आर्यो ने नामकरण की ऐतिहासिक कपटी चाल चली है।

 

और आज ताजा उदाहरण देखो ,

कभी गोंड समूह की नरमादा नदी हुवा करती थी,

आज नर्मदा बन चुकी है।

गोंड समूह की पेंकमेढ़ी आज पचमढ़ी बन चूका है।

गोंड समूह का चवरागढ़ आज चौऱ्यागढ़ बन चूका है।

चांदागड़ आज चंद्रपुर है तो बल्लारशाह ,बल्लारपुर हो गया है।

पवननार(पवन राजा का गांव)

सिर्फ पवनार बन चूका है।

 

ऐसेही राझ को पढ़े लिखे अनपढ गोंडो ने अच्छेसे समझना चाहिये कि वह और उनका समाज कितना प्रभावशाली था और है।

उन्हें कही और भटकने की जरूरत नही पड़ेगी।

क्यों की इतिहास गवाह है और गांव के लोग भी की जब गोंड समूह का मोठादेव अपनी चाल चलता है तो सिर्फ गोंड ही नही,

गैर गोंडियन भी उन्हें रास्ता खुला कर देते थे और आज भी देते है।

यही तो अपनी और गोंड,गोंडी,गोंडबाना की ताकत है।

अपने पेंनशक्तियो का सभीपर भारी पड़ना है जिसे लोग साढ़ेसाती कहते है।

वो असल में अपने 750 गोत्रों की साढ़ेसाती की ताकत है जिससे आर्य डरते थे।

समझो,मानो या ना मानो।

सर्वोच्च प्रकृती शक्ती फड़ापेन पछताने का मौका नही देती।

-एसी राकेश कुमराल राजनेगी

    🙏🏻 सुर्वेय सेवा 🙏🏻

फड़ापेन सर्वोच्च प्रकृती शक्ती

5--आदिवासियों में कडुवा सच

-----------------------------------------------

वैचारिक मतभेद वैचारिक मतभेद का सबसे बड़ा कारण है। धर्म संस्कृति।

   हालांकि अलग धर्म कोड के अभाव में हम अपने को हिन्दू मानते हैं।और हिन्दू रीति नीति संस्कृति परंपरा पर चलते हुए हिन्दू देवी देवताओं की पूजा करतें हैं।

    चुंकि पूर्व में पूर्वजों को उतना ज्ञान नहीं था।आर्य मनुवादी जैसा कहें करने लगे।

   पर अब संविधान का ज्ञान ,मूल संस्कृति का ज्ञान होने के बावजूद हम विभिन्न धर्मों संस्कृति देवी देवताओं को मानते हैं।

   यही वैचारिक मतभेद एकता में बाधक है ।

   रावण को मत जलाओ कह तो रहें हैं।पर अधिकांश आदिवासी समाज राम रामायण लीला के आयोजक होते हैं।

   अब जब सब जानते है तो हर ब्लाक, जिला, प्रदेश से आवाज उठना चाहिए पर नहीं कर पाते कुछ जिला ब्लाक जरूर देते हैं।

     उसी प्रकार दुर्गा पूजा नहीं करना है पर कुछ लोग शान से दुर्गा बैठाते हैं और पूजा करते हैं। जबकि गांव की रक्षा करने वाली शीतला महामाया में एक दीपक भी नहीं जलता।

   इसके लिए सभी दुर्गा मूर्ति में महिषासुर वध से संबंधित सीन न हो ऐसा ज्ञापन सभी जिला ब्लाक प्रदेश सभी पदाधिकारियों से अपील किया गया था ‌।पर इंटरेस्ट अधिकांश लोग और संगठनों ने नहीं लिया।

   यही हमारी खामियां हमारे कर रहे हैं।*

   जब जानकारी नहीं थी बात की बात अब जब जानकारी हो गया तो सभी आदिवासी समाज संगठन को आगे आना चाहिए।पर ऐसा नहीं हुआ।

   साथियों जब तक भले हिन्दू धर्म लिखते हो पर जब तक अपने मूल धर्म संस्कृति रीति नीति परंपरा में नहीं * चलोगे तो कैसे सिद्ध करोगे आदिवासी हो ,क्या पहचान रह जायेगा आदिवासियों का।

और यही मनुवादियों के लिए बेस बन रहा है

   आज हम समझ नहीं पा रहे हैं-सतनामी समाज, कबीर पंथी भी हिन्दू धर्म के अंतर्गत आते हैं, पर वह अपने मूल धर्म संस्कृति का पालन करते हुए ब्राह्मणवाद से दूर है ब्राह्मणों से कभी भी पूजा आदि नहीं कराते।समाज संस्कृति संरक्षित और कट्टरता है‌।*

    विभिन्न धर्मों के लोग ब्राह्मणवाद से दूर है जैसे सिक्ख,ईसाई,जैन, बौद्ध आदि।

   पर आदिवासी समाज इतना गिर चुका है कि अपने मूल धर्म संस्कृति को संवैधानिक रूढ़ीवादी परंपरा रीति नीति को छोड़कर हिन्दू धर्म संस्कृति के देवी देवताओं वेद-पुराण गीता भागवत रामायण महाभारत का अनुसरण और वरण करतें हैं।

    और यही धार्मिक गुलामी आदिवासी समाज समुदाय संगठन को एकता में मजबूती प्रदान में घातक साबित हो रहा है। भविष्य में इसी के चलते आदिवासी समाज, संस्कृति, मूल देव संस्कृति का समूल नाश हो जायेगा।

    इसमें सबसे ज्यादा वैचारिक मतभेद हैं तो पढ़ें लिखो में है।कारण पढ़ें लिखे ही कोई गायत्री को मानता है,कोई राम रामायण को मानता है,तो कोई साईं को मानता है कई प्रकार के।

   यही धार्मिक भावनाएं ही आज समाज को ब्राह्मणों का धार्मिक गुलाम बना दिया है।

   *आखिर कब तक समझोगे।

खैर ये अलग बात है कि आदिवासियों को जनजाति का संज्ञा दिया गया है।पर आदिवासी ही तो हो, मूलनिवासी ही तो हो।

    समझो साथियों बचाना बिगाड़ना आपके हाथ है।जब जगे तभी सबेरा होता है ‌।

   आवाज उठाना सीखो, आवाज उठाओ धार्मिक गुलामी और ब्राह्मणवाद हिन्दू धर्म संस्कृति से अलग हटकर देखो।क्या होता है।

     दान पाप पुण्य स्वर्ग नरक में सब काल्पनिक और ब्राह्मणों के जीविका का साधन है।

   दान करना है अपने समाज को शिक्षित करने में करो, समाज को उठाने में करो।बुढ़ो गरीब लाचारो को दो तो निश्चित ही समाज का विकास होगा।

   गीता भागवत कहलाते हो लाखों पैसा खर्च करते हो उसी को अपने तथा समाज के बच्चो के पढ़ाई और व्यवसाय धंधे में लगाओ‌।।

     मंदिरों में दान करते हो , रामायण गीता भागवत में चढ़ाते हो किसका होता है । भगवान का नहीं ‌‌। मात्र ब्राह्मण का होता है ‌‌।बिना मेहनत।

    आप दिन रात मेहनत करते हैं, और कोई धर्म के नाम पर आस्था के नाम पर बिना मेहनत खाते हैं। सोचो आप उसको पाल रहे हो, जो आपके धर्म संस्कृति देवी देवताओं का विनाशक है। वह नहीं कह रहा है।आप स्वयं कर रहे हैं।

   पर कारण ब्राह्मण मनुवादी आर्य नहीं‌। आपके हमारे , गुलामी, अज्ञानता,और बेवकुफी,के ही कारण है

 

    समाज हम सुधरना और समाज को सुधारना संस्कृति को संरक्षित सुरक्षित करना आप हम सबका कर्तव्य है। चाहे पढ़े-लिखे अधिकारी कर्मचारी हो या अनपपढ अशिक्षित हो‌।

     सोचो समझो

No comments:

Post a Comment

you have any dauts, Please info me know