मैं कोइतूर भारत हूँ
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मैं वही हूँ
जिसने पहली बार
इतिहास के भयानक बियाबान में एकदूजे की परछाई से डरती भीड़ के बीच
हम और हमारे की पहिचान बताते हुए विवाह और परिवार को जन्म दिया
मैं वही हूँ जिसने पहली बार अनुमानों और भूलों के अंधियारे में सफलता के पुरस्कार व असफलता के दंड के बीच ज्ञान और विज्ञान की मशाल ऊंची करते हुए शिक्षा और गोटूल को जन्म दिया मैं वही हूँ जिसने पहली बार पाषाण युग की अनिश्चितताओं में
युद्ध और साजिशों से कराहती भीड़ के बीच मैत्री और सहकार की खुशबू बिखेरते हुए
जीवन के मिजान को जन्म दिया मैं वही हूँ जिसने पहली बार आदिम भयों की अँधेरी सुरंगों में एकदूजे को नोच रही भीड़ के बीच प्रतीकों और कहानियों की बुनाई करते हुए
साझे विश्वास और सपनों को जन्म दिया मैं वही हूँ जिसने पहली बार अज्ञान और अफवाहों की धुंध में पंचभूतों की फुफकारती शक्तियों के बीच प्रकृति को सबकी माँ घोषित करते हुए पहले मिथकों और धर्म को जन्म दिया मैं वही हूँ जिसने पहली बार
शोषण और दमन की सडांध में लिंग, रंग और उंच नीच के भेदभाव के बीच सबको बराबर घोषित करते हुए पहले सभ्य समाज को जन्म दिया हां मैं वही हूँ
और आज भी ज़िंदा हूँ तुम्हारे शोषण और दमन के बीच तुम्हारी हवस और आतंक के बीच तुम्हारी घृणा और अपमान के बीच अपनी संस्कृति और धर्म की चिंगारी को
अपने मिथकों और भाषा की सुगंध को और अपने भविष्य के बीज को
अपने ह्रदय की गहराइयों में संभाले हुए मैं आज भी ज़िंदा हूँ मैं मूल निवासी हूँ
मैं इस देश का पिता हूँ मैं इस देश का निर्माता हूँ मैं कोइतूर हूँ
मैं कोइतूर भारत हूँ ... -संजय श्रमण*चित्र गूगल से साभार
मैं कोई नई बात या फिर विचारधारा की बात नहीं करता। मेरे पुरखा जिस बीज को कोठी (अनाज रखने का पात्र) की गडारी(कोठी का खाली स्थान) मेंं सहेजकर रखें थे उसी को बिखेरने का कार्य कर रहा हूं।
-दादा हीरा सिंह मरकाम जी

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