2 hours ago विजय शंकर सिंह
अहमदाबाद सिविल अस्पताल।
सबसे पहले कोविड 19 के इन आंकड़ों को देखिए। ये आंकड़े 22 मई 2020 के हैं और वर्ल्ड मीटर डॉट इन्फो से लिये गए हैं।
● भारत नए संक्रमण के मामले में दुनिया में चौथे नम्बर पर आ गया है। प्रतिदिन 6568 मामले आ रहे हैं।
● एक्टिव केस के मामले में भारत 69,244 केस के साथ, दुनिया मे पाँचवें नम्बर पर है।
● प्रतिदिन कोरोना से मृत्यु के मामले, 142 हैं जो दुनिया मे सातवें नम्बर पर है।
● टेस्टिंग में भारत 138 वें नम्बर पर है।
● भारत प्रति 10 लाख लोगों में सिर्फ 1973 टेस्ट कर रहा है।
● दुनिया में कोरोना के कुल मामलों, 1,24,749 के आधार पर भारत, ग्यारहवें नम्बर पर है।
सबसे पहले कोविड 19 के इन आंकड़ों को देखिए। ये आंकड़े 22 मई 2020 के हैं और वर्ल्ड मीटर डॉट इन्फो से लिये गए हैं।
● भारत नए संक्रमण के मामले में दुनिया में चौथे नम्बर पर आ गया है। प्रतिदिन 6568 मामले आ रहे हैं।
● एक्टिव केस के मामले में भारत 69,244 केस के साथ, दुनिया मे पाँचवें नम्बर पर है।
● प्रतिदिन कोरोना से मृत्यु के मामले, 142 हैं जो दुनिया मे सातवें नम्बर पर है।
● टेस्टिंग में भारत 138 वें नम्बर पर है।
● भारत प्रति 10 लाख लोगों में सिर्फ 1973 टेस्ट कर रहा है।
● दुनिया में कोरोना के कुल मामलों, 1,24,749 के आधार पर भारत, ग्यारहवें नम्बर पर है।
गुजरात की चर्चा से इस लेख की शुरुआत मैंने इस लिये की है, कि 2014 के
चुनाव
में
भाजपा
और
नरेन्द्र
मोदी
की
शानदार
सफलता
का
एक
बड़ा
कारण,
गुजरात
मॉडल
का
तिलिस्म
था
जो
तब
देश
का
सबसे
लुभावना
और
दिलकश
नारा
और
एडवरटाइजिंग ध्येय वाक्य बन चुका था। वह मॉडल देश के विकास के मॉडल के अग्रदूत के रूप में समझा जाने लगा था, लगभग वह कालखंड सम्मोहित करने वाले एक पुनर्जागरण की पीठिका बन रहा था। लग रहा था 2014 के
पहले
जैसे
कुछ
हुआ
ही
न
हो।
गुजरात
के
विकास
का
दीदार
करने
के
लिये
वहां
चीन
के
राष्ट्रपति
गए
और
हाल
ही
के
24 फरवरी
को
अमेरिकी
राष्ट्रपति
भी
एक
भव्य
आयोजन
में
तशरीफ़
ले
गए
थे।
लगा
देश
में
अगर
कहीं
विकास
की
सरिता
प्रवाहमान
है
तो,
यहीं
है
यहीं
है,
यहीं
है!
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लेकिन विकास के इस मॉडल में जनता कहां है ? जनता के लिये स्कूल, अस्पताल और उनकी बेरोजगारी दूर करने के लिये सरकार ने नरेंद्र मोदी के मुख्य मंत्री के कार्यकाल में क्या-क्या कदम उठाए हैं ? विकास के इस मोहक मॉडल के पीछे का सच क्या है। यह जानना बहुत ज़रूरी है। यह लेख हेल्थकेयर के एक अध्ययन जिसे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के सीनियर रिसर्च फेलो संजीव कुमार के एक रिसर्च पेपर पर आधारित है।
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लेकिन विकास के इस मॉडल में जनता कहां है ? जनता के लिये स्कूल, अस्पताल और उनकी बेरोजगारी दूर करने के लिये सरकार ने नरेंद्र मोदी के मुख्य मंत्री के कार्यकाल में क्या-क्या कदम उठाए हैं ? विकास के इस मोहक मॉडल के पीछे का सच क्या है। यह जानना बहुत ज़रूरी है। यह लेख हेल्थकेयर के एक अध्ययन जिसे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के सीनियर रिसर्च फेलो संजीव कुमार के एक रिसर्च पेपर पर आधारित है।
कोरोना संकट के समय शुरुआत में, गुजरात सरकार ने विभिन्न अस्पतालों में कोविड 19 के
मरीज़ों
के
लिये,
156 वेंटिलेटर
की
व्यवस्था
की
है
और
9,000 हेल्थ
वर्करों
को
उनकी
सुश्रुसा
के
लिये
ट्रेनिंग
दी।
गुजरात
में
सरकारी
हेल्थकेयर
जिसे
पब्लिक
हेल्थकेयर
भी
कह
सकते
हैं
की
स्थिति
उपेक्षित
तो
पहले
से
ही
है,
अब
तो
वह
और
भी
चिंताजनक
हो
गयी
है।
अब
के
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के, चार बार गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के बाद भी गुजरात का हेल्थकेयर सिस्टम उपेक्षित और कमज़ोर बना रहा।
गुजरात सरकार के विकास मॉडल में हेल्थकेयर कभी भी प्राथमिकता में रहा ही नहीं। नरेंद्र मोदी के गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए जो हेल्थकेयर सेक्टर के प्रति नीति थी, वही नीति उनके देश के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी रही है। केंद्रीय सरकार की प्राथमिकता में, हेल्थकेयर कहीं है भी, जब इस सवाल का उत्तर ढूंढ़ा जाता है तो निराशा ही हाथ लगती है। स्वास्थ्य बीमा की कुछ लोक लुभावन नामों वाली योजनाओं को छोड़ दिया जाए तो अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और बड़े विशेषज्ञ अस्पतालों के लिये, धरातल पर सरकार ने छह सालों में कुछ किया भी नहीं है, बस घोषणाओं को छोड़ कर।
फिलहाल, अग्रदूत की तरह प्रचारित गुजरात मॉडल पर यह अध्ययन केंद्रित करते हैं। गुजरात में प्रति 1,000 की
आबादी
पर
केवल
0.33% हॉस्पिटल
बेड
हैं।
इस
मामले
में
गुजरात
राज्य,
केवल
बिहार
राज्य
से,
एक
पायदान
ऊपर
है।
यह
अलग
बात
है
कि
गुजरात
और
बिहार
की
विकास
की
छवि
के
बारे
में
जन
परसेप्शन
में,
जमीन
आसमान
का
अंतर
समझा
जाता
है।
फिलहाल,
हॉस्पिटल
बेड
का
राष्ट्रीय
मानक,
भारत
में,
0.55 प्रति
1000 की
आबादी
पर
है।
आखिर
विकास
के
इतने
चमकीले
आवरण
के
पीछे
गुजरात
के
हेल्थ
केयर
के
पिछड़ने
का
कारण
क्या
है,
इस
पर
भी
पड़ताल
ज़रूरी
है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में
भारत
में
प्रति
1000 की
आबादी
पर
.70 बेड
थे।
आरबीआई
के
एक
अध्ययन
और
आंकड़ों
के
अनुसार,
अपने
राज्यों
में,
सामजिक
सेक्टर
पर
खर्च
करने
वाले,
देश
के
18 बड़े
राज्यों
में
गुजरात
का
स्थान
इस
क्षेत्र
में
17 वां
था।
गुजरात
अपने
बजटीय
व्यय
का
कुल
31.6 % सामाजिक
सेक्टर
पर
व्यय
करता
था।
2009 – 2010 में गुजरात, सामाजिक सेक्टर में, प्रति व्यक्ति व्यय के मामले में, 11 वें
स्थान
पर
गिर
कर
आ
गया,
जबकि
1999-2000 में वह चौथे स्थान पर था।
इसी अवधि में आसाम ने अपनी रैंकिंग में, सुधार करते हुए खुद को 12 वें
से
तीसरे
स्थान
पर
ले
आया
और
उत्तर
प्रदेश
15 वें
स्थान
से
तरक़्क़ी
कर
के
नौवें
स्थान
पर
आ
गया।
1999- 2000 में गुजरात अपने कुल राज्य व्यय का 4.39% हेल्थ
केयर
पर
व्यय
करता
था।
पर
2009-10 में
व्यय
का
यह
प्रतिशत,
गिर
कर
मात्र
0.77% रह
गया।
एनएसडीपी
में
स्वास्थ्य
व्यय
के
मद
में
गुजरात
की
हिस्सेदारी
1999- 00 से 2009 – 10 के बीच 0.73% से
गिर
कर
0.87% पर
आ
गयी।
जबकि
इसी
अवधि
में
बड़े
राज्यों
की
एनएसडीपी
( नेशनल
समरी
डेटा
पेज
) में
स्वास्थ्य
सेक्टर
के
मद
में
हिस्सेदारी
बढ़
कर
औसतन
0.95% से
बढ़
कर
1.04% हो
गयी।
तमिलनाडु
और
आसाम
ने,
स्वास्थ्य
सेक्टर
में
अपने
व्यय
बढ़ा
कर
लगभग
दूने
कर
लिये।
इस आंकड़े से पब्लिक हेल्थ केयर क्षेत्र में गुजरात की प्राथमिकता का पता चलता है। 2004 – 05 में
जब
यूपीए
केंद
में
सत्ता
में
आयी
तब
देश
की
जीडीपी
का
केवल
0.84% ही
जन
स्वास्थ्य
पर
व्यय
होता
था,
जो
2008 – 09 में 1.41% हो गया था। यही व्यय जब 2014 – 15 के
बजट
में,
जब
एनडीए
सरकार
सत्ता
में
आयी
तो
0.98% पर
सिकुड़
कर
आ
गया।
वर्तमान
वित्तीय
वर्ष
2020 – 21 में यह राशि जीडीपी का 1.28% अनुमानित
रखी
गयी
है।
जबकि
2008 – 09 में सरकार अपनी जीडीपी का 1.41% तक
व्यय
कर
चुकी
है।
गुजरात में किसी भी व्यक्ति का हेल्थकेयर, हॉस्पिटलाइजेशन पर व्यय जिसे आउट ऑफ पॉकेट व्यय कहते हैं, राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है, यहां तक कि बिहार जैसे पिछड़ा समझे जाने वाले राज्य से भी अधिक है। गुजरात में किसी भी व्यक्ति का हेल्थकेयर, हॉस्पिटलाइजेशन पर व्यय, यहां तक कि बिहार जैसे मान्यता प्राप्त पिछड़े राज्य से भी अधिक है। इसका अर्थ यह हुआ कि, जनता को गुजरात के सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने के लिये, बिहार की जनता की तुलना में, अपनी जेब से अधिक धन व्यय करना पड़ रहा है। गुजरात, 2009 – 10 में,
प्रति
व्यक्ति
दवा
पर
व्यय
की
रैंकिंग
में
देश
में
25 वें
स्थान
पर
था।
2001 में जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्य मंत्री बने तो राज्य में कुल 1001 प्राथमिक
स्वास्थ्य
केंद्र
थे।
सामुदायिक
स्वास्थ्य
केन्द्रों
की
संख्या
244 थी
और
कुल
7,274 उप
स्वास्थ्य
केंद्र
थे।
2011-12 में
प्राथमिक
और
सामुदायिक
स्वास्थ्य
केंद्रों
में
थोड़ी
बढ़ोत्तरी
हुई
और
उनकी
संख्या
क्रमशः
1,158 और
318 तक
पहुंच
गयी
पर
स्वास्थ्य
उप
केंद्रों
में
कोई
वृद्धि
नहीं
हुई।
यहां
तक
कि
आज
भी
गुजरात
में
प्राथमिक
स्वास्थ्य
केंद्रों
की
संख्या
बिहार
की
तुलना
में
कम
है।
बिहार
के
ग्रामीण
क्षेत्रों
में
जितने
सरकारी
अस्पताल
हैं
वे
गुजरात
से
संख्या
में
तीन
गुने
अधिक
हैं।
वर्तमान महामारी की आपदा के संदर्भ में दुनिया भर के देश अपने-अपने देशों में हेल्थकेयर सेक्टर की गुणवत्ता और उसकी कमी, क्षमता और आवश्यकता पड़ने पर उनके योगदान का अध्ययन करने और उन्हें बेहतर बनाने के उपायों को अपनाने पर जुटे हुए हैं और तदनुसार अपनी नीतियां भी बना और संशोधित कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में हमें अपने यहां के हेल्थकेयर सेक्टर की कमियों और ज़रूरतों का अध्ययन कर के उन्हें बेहतर बनाने की एक संगठित योजना पर काम शुरू करना होगा।
भारत में इस समय 7,13,986 हॉस्पिटल
बेड
और
कुल
20,000 वेंटिलेटर
हैं।
कोविड
19 के
संबंध
में
एक
आकलन
के
अनुसार,
कुल
5% संक्रमितों
को
वेंटिलेटर
की
ज़रूरत
पड़
सकती
है।
अगर
भविष्य
में
कुल
संक्रमितों
की
संख्या
बढ़कर
और
अधिक
हो
जाती
है
तो,
हमारे
पास
ऐसी
विषम
स्थिति
को
संभालने
के
लिये
वेंटिलेटर
की
कमी
हो
सकती
है।
ऐसी
परिस्थितियों में हमें देश के हेल्थकेयर सिस्टम को और सुदृढ़ करने के लिए विचार करना होगा।
अब सवाल उठता है कि विकास का क्या मानक होना चाहिये ? स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन, बड़े-बड़े शहर या देश की शिक्षित और स्वस्थ जनता ? देश या समाज शून्य में नहीं होता है बल्कि यह जनता से बनता और बिगड़ता है। अगर जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवनयापन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं तो देश को विकसित माना जाना चाहिये, अन्यथा वह पूंजीपतियों का निरा अभयारण्य बन कर रह जायेगा और समाज आपराधिक स्तर तक शोषक और शोषित में विभक्त होकर रह जायेगा।
( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )
विजय शंकर सिंह
विजय शंकर सिंह

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