गोंडवाना समग्र विकास आंदोलन क्रांति
के जांबाज साथियों कल मैंने सोशल मीडिया में एक छोटा सा पोस्ट किया था शायद आप
लोगों ने पढ़ा होगा और अगर नहीं पढ़ा हो तो पुनः पोस्ट करता हूं......
"अभी MP राजनीति की प्रयोगशाला बन गई है...,
गोंडवाना के युवाओं सीख लेने का सुअवसर
हैं."
(युवा साथियों सीख लीजिए तथा धैर्य और
दूरदृष्टी बनाएं रखिए। क्योंकि आप लोगों के मजबूत कंधों पर ही गोंडवाना को सजाने, संवारने का भार है।)
वर्तमान दौर में जब मनुवादी/पूंजीवादी
ताकतों का गठजोड़ सत्ताबल,मीडिया,माफिया के दम पर जनता के द्वारा दिए हुए जनादेश को धता बताते हुए
बड़े बड़े राजा-महाराजाओं को भी झुकने,पाला बदलने के लिए के लिए मजबूर कर
दिया है।विधायकों/मंत्रियों की मंडी खोल कर रख दिया हैं और राजनैतिक सिद्धांत
विधवाविलाप कर रही हैं। ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता की मलाई खाना ही राजनैतिक धुरंधरों
का अंतिम लक्ष्य बन गया है ऐसे दौर में गोंडवाना रत्न दादा हीरा सिंह मरकाम जी के
सामाजिक/राजनैतिक सिद्धांत और संघर्ष हम जैसे युवाओं के लिए जेठ की दुपहरी में
तपती रेगिस्तान में बरगद के पेड़ और शीतल जल के समान ही हैं और मुझे गर्व हैं कि
ऐसे महामानव का सानिध्य हम जैसे युवाओं को मिलता रहता हैं।
महात्मा गांधी इंटरनेशनल हिंदी
युनिवर्सिटी वर्धा के सहायक प्राध्यापक हमारे अग्रज डॉ सुनिल कुमार सुमन जी ने एक
बार कहा था कि.....
"परिवर्तन रातों-रात घटित नहीं होतें, इसमें समय लगता हैं। 'शार्टकट' की 'क्रांति' से केवल नेता को फायदा होता हैं, उसके समाज को नहीं..!"
"बहुजन समाज में जिसका एकमात्र गुप्त
लक्ष्य महज़ विधायक-सांसद या मंत्री बनने तक ही सीमित रहता हैं,उसकी सामाजिक-ऐतिहासिक उम्र बहुत कम
होती हैं..!"
दादा मरकाम जी जिन्होंने गोंडवाना
समग्र विकास आंदोलन क्रांति के माध्यम से मुर्दा समाज में जान फूंकने का कार्य
किया हैं। गोंडवाना समग्र विकास आंदोलन क्रांति के दुश्मनों के लाखों
साम-दाम-दण्ड-भेद के बावजूद भी विषम से विषम परिस्थितियों में भी धैर्य का दामन
नहीं छोड़ें, लक्ष्य
से नजरें नहीं हटाये और आज भी गोंडवाना जिनके हृदय के हर धड़कन में बसता हों ऐसे
महामानव को मेरा नतमस्तक सेवा जोहार हैं।
7 मार्च को जब मैं उनके बुलावे पर
बिलासपुर गया तो उन्होंने हमें दो टूक शब्दों में कहा कि....."गोंडवाना
गणतंत्र गोटूल से गोंडवाना विश्वविद्यालय तक"
इस उम्र में भी दादा मरकाम जी की ऊर्जा,जीवटता और गोंडवाना के प्रति अटूट
प्रेम को देखकर तो मैं हैरान हूं।
दादा मरकाम जी को देखकर मुझे फिदेल
कास्त्रो जी याद आते हैं जिन्होंने पूरे विश्व में दादागिरी करने वाले पूंजीवाद के
गढ़ अमेरिका से भी नज़र से नज़र मिलाकर ललकारते थे और कहा करते थे कि....
"मैंने क्रांति की शुरुआत 82 लोगों के साथ की। अगर आज मुझे यह फिर
करना पड़े तो मैं इसे 10-15 लोगों और भरपूर विश्वास के साथ करूंगा। इस बात से कोई फर्क नहीं
पड़ता कि आपकी संख्या कितनी है। बशर्ते आपके भीतर विश्वास और एक कार्ययोजना
हो..."
वहीं ऊर्जा,वहीं जीवटता,लक्ष्य के प्रति वैसी ही समर्पणता मुझे
दादा मरकाम जी में दिखाई देती हैं........
माननीय श्री रघुवीर सिंह मार्को जी के
शब्दों में अपनी बात को विराम दूंगा....
"गोंडवाना जो बरबाद करेगा वो
मिटेगा......,
जो हद मे हैं आंधियो में दिया उनका
जलेगा।
हीरा अभी जिंदा हैं सबको बता
दो............,
गोंडवाना का परचम ना झुका हैं न
झुकेगा...।
गोंडवाना आंदोलन का एक छोटा-सा सिपाही
गोंड धुर्वे अनिल सिंह

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