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Monday, December 16, 2019

जैसे-जैसे किसी देश के लोग समझदार होते जाते हैं वहाँ राजतंत्र से लोकतांत्रिक राजतंत्र पर आते हैं और फिर लोकतंत्र स्थापित कर देते हैं



जैसे-जैसे किसी देश के लोग समझदार होते जाते हैं वहाँ राजतंत्र से लोकतांत्रिक राजतंत्र पर आते हैं और फिर लोकतंत्र स्थापित कर देते हैं.ऐसा नेपाल के मामले में बीते तीस बरसों में सबने देखा होगा कि कैसे वहाँ राजतंत्र से लोकतांत्रिक राजतंत्र आया और फिर लोकतंत्र आ गया.इसके विपरीत ऐसे देश के लोगों को कमअक्ल ही समझा जाएगा जो इस चक्र को उलट दें,लोकतांत्रिक गणतंत्र से लोकतांत्रिक राजतंत्र की तरफ़ अग्रसर हो जाएं,फिर तो वहाँ आगे चलकर निरंकुश राजतंत्र भी स्थापित हो जाएगा.लोकतांत्रिक राजतंत्र में लोकतंत्र जैसी आज़ादी नहीं होती,ये किसी देश के किसी ख़ास वर्ग के लिए ही सिर्फ़ ख़तरनाक नहीं होता बल्कि उस देश के हर निवासी के अधिकारों में भारी कटौती कर देता है.उदाहरण के तौर पर नेपाल का मामला देखते हैं,नेपाल के महाराजा बीरेन्द्र ने जब 1990 में राजतंत्र की जगह लोकतांत्रिक राजतंत्र लागू किया तो महाराज के पास ये भी अधिकार था कि वो अगर किसी का क़त्ल भी कर देते हैं तो उनके ऊपर कार्रवाई नहीं की जा सकती थी.वो अदालत से ऊपर थे,वो चाहे कितने भी लोगों को गोली मार देते,अदालत उनको सज़ा नहीं सुुना सकती थी.लोकतंत्र में ये अधिकार किसी को प्राप्त नहीं होता.ख़ैर,महाराज तो ख़ुद ही क़त्ल हो गए और उनके बेटे दीपेंद्र ने ही उनका क़त्ल कर दिया था. वैसे उसने पहले महाराज को सीधे गोली नहीं मारी थी,राजकुमार दीपेंद्र चरस और शराब के नशे में था और प्रेमिका देवयानी से शादी ना होने देने की महारानी की ज़िद के चलते उस ख़ूनी रात को पागल हो उठा,उसने एम 16 रायफ़ल से हवाई फ़ायरिंग की जिसकी गोलियाँ छत से टकराकर वापस आ गईं और बैठकर कोन्याक पी रहे महाराज को लग गईं.जब भगदड़ मची तो दीपेंद्र भाग गया और वापस हेकलर एंड कॉश रायफ़ल लेकर आया,तब उसने महाराज को सीधे गोलियों से भून डाला.लोकतांत्रिक राजतंत्र अजीब होता है कि जब महाराज मर गए तो ख़ुद को गोली मार लेने वाले ब्रेन डेड क़ातिल को ही नेपाल के राज परिषद ने राजा घोषित कर दिया,फिर अगले दो दिनों तक नेपाल में ऐसे राजा का राज रहा जो ब्रेन डेड था.ये राज परिषद की देन थी,125 सदस्यों वाली राज परिषद राजकुमार भी चुनती थी,राज परिषद तय नहीं कर पा रही थी कि महाराज के क़त्ल का मामला राजकुमार पर चलेगा या नहीं,वजह कि राजकुमार अब राजा हो चुका था लेकिन जब उसने महाराज को गोली मारी तब वह राजा नहीं था.अगर राजकुमार दीपेंद्र जीवित रह जाता तो वो ख़ुद को क़त्ल से ख़ुद ही बरी भी कर देता,वजह कि राजा के पास ऐसी शक्ति थी कि वो जब चाहे संविधान और कानून बदल दे.राजतंत्र इसीलिए दुनियाँ में पसंद नहीं किया जाता,आज की जागी हुई जनता किसी को निरंकुश नहीं बनने देना चाहती,लेकिन जब जनता का दिमाग़ काम करना बंद कर दे तो निरंकुश बनने ही देगी.लोकतंत्र में जो लोग जनता द्वारा चुनकर आते हैं उनको अपने संविधान की रक्षा करनी चाहिए,ऐसा काम नहीं करना चाहिए कि दुनियाँ उनके ऊपर हँसे,लोकतंत्र में नेपाल के शाही दौर के राज परिषद जैसा सदस्यों को नहीं होना चाहिए जो महाराज के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कर सकते.फिर जहाँ संसद नेपाली राज परिषद जैसा व्यवहार करने लगे वहाँ की संसद को अपना नाम बदलकर राज परिषद रख लेना चाहिए.अपना राजा और राजकुमार चुन लेना चाहिए,जब काम लोकतांत्रिक राजतंत्र जैसा किसी देश की संसद करेगी तो वो संसद नहीं रही राज परिषद हो गई.


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