प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (पीएमएमएसवाई)
पृष्ठभूमि
उठाए गए कदम
निर्धारित लक्ष्य
प्रमुख उद्देश्य
निवेश और उन्नयन
दूसरे सबसे बड़े मत्स्यपालक देश का दर्जा
नई गतिविधियां और क्षेत्र
नई तकनीक पर केंद्रित
पृष्ठभूमि
मत्स्यपालन के विकास की व्यापक संभावना को देखते हुए दिसंबर 2014 में, मत्स्यपालन क्षेत्र में “एक क्रांति” का आह्वान किया गया था और इसे “ब्लू रेवोल्यूशन”यानी नीली क्रांति का नाम दिया था। इसके अंतर्गत सरकार द्वारा मत्स्यपालन क्षेत्र में नीली क्रांति को लाने के लिए कई पहल शुरू की गई ताकि एक स्थायी और जिम्मेदार तरीके से मत्स्यपालन क्षेत्र की क्षमता का दोहन किया जा सके।
उठाए गए कदम
कुछ प्रमुख सुधारों और कदमों में शामिल हैं
मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी का एक अलग मंत्रालय बनाना
स्वतंत्र प्रशासनिक ढांचे के साथ मत्स्यपालन का एक नया और समर्पित विभाग स्थापित करना,
नीली क्रांति पर आधारित केंद्र द्वारा प्रायोजित योजना का कार्यान्वयन: मत्स्यपालन का एकीकृत विकास और प्रबंधन
फिशरीज और एक्वाकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (एफआईडीएफ-करीब 7,522.48 करोड़ ) का सृजन
मछली पालन क्षेत्र के लिए सबसे अधिक निवेश वाली योजना पीएमएमएसवाई योजना का शुभारंभ करना।
निर्धारित लक्ष्य
प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (पीएमएमएसवाई) का लक्ष्य 2018-19 के 137.58 लाख मीट्रिक टन से लगभग 9 फीसदी की औसत वार्षिक वृद्धि दर पर मछली उत्पादन को 2024-25 तक 220 लाख मीट्रिक तक बढ़ाने का है।
इस महत्वाकांक्षी योजना से निर्यात आय दोगुनी होकर 1,00,000 करोड़ रुपये हो जाएगी और अगले पांच वर्षों में मत्स्यपालन क्षेत्र में लगभग 55 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। मत्स्यपालन क्षेत्र से जुड़े मछुआरों, मछली किसानों, मछली श्रमिकों, मछली विक्रेताओं और अन्य हितधारकों के साथ पहली बार मछली पकड़ने वाले जहाजों के लिए बीमा कवरेज को लाया जा रहा है।
प्रमुख उद्देश्य
पीएमएमएसवाई के तहत मछली उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने, गुणवत्ता, स्थिरता, प्रौद्योगिकी के उपयोग, फसल कटाई पश्चात के बुनियादी ढांचे, मूल्य श्रंखला के आधुनिकीकरण और सुदृढ़ीकरण, 'कैच टू कंज्यूमर' से मत्स्यपालन क्षेत्र में मानक और ट्रेसेबिलिटी लाने, एक मजबूत मत्स्यपालन प्रबंधन ढांचा स्थापित करने, मछुआरों का कल्याण करने और मत्स्य निर्यात प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी करने की दिशा में पूरा ज़ोर देना है। पीएमएमएसवाई निजी क्षेत्र की भागीदारी, उद्यमशीलता के विकास, व्यापार मॉडलों, 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' को बढ़ावा देने, मत्स्यपालन क्षेत्र में स्टार्ट-अप, इनक्यूबेटर आदि समेत नवीनता और नवीन परियोजना गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण करेगा।
पीएमएमएसवाई एक मछुआरा केंद्रित अंब्रैला योजना है इसलिए इसमें जो विकास गतिविधियां सोची गई हैं उनमें मछुआरे, मछली किसान, मछली श्रमिक और मछली विक्रेता प्रमुख हितधारक हैं और उनके सामाजिक आर्थिक दर्जे में बढ़ोतरी करना इस योजना के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है।
निवेश और उन्नयन
पीएमएमएसवाई के कुल अनुमानित निवेश का लगभग 42 फीसदी हिस्सा मत्स्यपालन सुविधाओं के निर्माण और उन्नयन के लिए निर्धारित है। इसके प्रमुख ध्यान वाले क्षेत्रों में फिशिंग हार्बर और लैंडिंग सेंटर, पोस्ट-हार्वेस्ट और कोल्ड चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर, मछली बाज़ार और मार्केटिंग ढांचा, एकीकृत आधुनिक तटीय मछलीपालन गांव और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने का विकास आदि शामिल हैं।
मत्स्यपालन क्षेत्र में निजी निवेश को आकर्षित करके जरूरी मत्स्यपालन बुनियादी ढांचे का निर्माण करने के अलावा, इस योजना का मकसद वैल्यू चेन का आधुनिकीकरण और सुदृढ़ीकरण करके हार्वेस्ट के बाद के नुकसान को 25 फीसदी के उच्च स्तर से घटाकर लगभग 10 फीसदी तक लाना है।
स्वच्छ सागर योजना के तहत मत्स्य क्षेत्र के आधुनिकीकरण के लिए सोची गई गतिविधियों में जैव शौचालयों को बढ़ावा देना, मछली पकड़ने के जहाजों के लिए बीमा कवरेज, मत्स्य प्रबंधन योजनाएं, ई-ट्रेडिंग / मार्केटिंग, मछुआ एवं संसाधन सर्वेक्षण और राष्ट्रीय आईटी आधारित डेटाबेस का निर्माण करना शामिल है।
इससे जुड़े स्वास्थ्य लाभों के साथ घरेलू मछली की खपत बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए बताया गया है कि “सागर मित्र” को पंजीकृत किया जाएगा और पीएमएमएसवाई लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करने के लिए मछली किसान उत्पादक संगठनों (एफएफपीओ) के गठन को प्रोत्साहित किया जाएगा। तटीय मछुआरा गांवों में 3477 सागर मित्र बनाकर युवाओं को मत्स्यपालन विस्तार में लगाया जाएगा। युवा पेशेवरों के वास्ते रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए निजी दायरे में बड़ी संख्या में मत्स्यपालन विस्तार सेवा केंद्र स्थापित किए जाएंगे।
दूसरे सबसे बड़े मत्स्यपालक देश का दर्जा
वैश्विक मछली उत्पादन के लगभग 7.73 फीसदी के बराबर होकर और 46,589 करोड़ (2018-19) की निर्यात आय प्राप्त करते हुए भारत ने आज दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मत्स्यपालक और चौथे सबसे बड़े मछली निर्यातक देश का दर्जा पा लिया। मत्स्यपालन क्षेत्र ने पिछले पांच वर्षों के दौरान मछली उत्पादन और निर्यात आय के मामले में प्रभावशाली वृद्धि हुई है। इस क्षेत्र ने 2014-15 से 2018-19 के दौरान 10.88 फीसदी की औसत वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की, मछली उत्पादन में 7.53 फीसदी की औसत वार्षिक वृद्धि और निर्यात आय में 9.71 फीसदी की औसत वार्षिक वृद्धि हासिल की, जिसमें कृषि निर्यात में 18 फीसदी की हिस्सेदारी भी शामिल थी। 2018-19 के दौरान राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में मत्स्यपालन क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) 2,12,915 करोड़ रुपये रहा, जो कुल राष्ट्रीय जीवीए का 1.24 फीसदी और कृषि जीवीए का 7.28 फीसदी हिस्सा था।
नई गतिविधियां और क्षेत्र
इस योजना में कई नई गतिविधियों और क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जैसे कि– ट्रेसेबिलिटी, प्रमाणन और प्रत्यायन, खारे / क्षारीय क्षेत्रों में एक्वाकल्चर, जेनेटिक सुधार कार्यक्रम और न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर, फिशरीज और एक्वाकल्चर स्टार्ट-अप, मछली की खपत के लिए प्रचार गतिविधियां, ब्रांडिंग, मछली में जीआई, एकीकृत एक्वा पार्क, एकीकृत तटीय मछली पालन ग्रामों का विकास, अत्याधुनिक थोक मछली बाजार, जलीय रेफरल प्रयोगशालाएं, एक्वाकल्चर एक्सटेंशन सर्विसेज, बायोफ्लोक, मछली पकड़ने की नई नावों या उन्नयन के लिए सहयोग, रोग निदान और गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाएं, ऑर्गेनिक एक्वाकल्चर का संवर्धन व प्रमाणन और संभावित मत्स्यपालन क्षेत्र (पीएफजेड) उपकरण।
नई तकनीक पर केंद्रित
पीएमएमएसवाई नई और उभरती हुई तकनीकों को ज़ोर प्रदान करती है जैसे कि री-सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम, बायोफ्लोक, एक्वापोनिक्स, केज कल्टीवेशन वगैरह ताकि उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ाया जा सके, एक्वाकल्चर के लिए बंजर भूमि और जल का उत्पादकता भरा उपयोग किया जा सके। मैरीकल्चर, समुद्री शैवाल की खेती और सजावटी मछलीपालन जैसी कुछ गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा जिनमें ग्रामीण महिलाओं के लिए खास तौर पर बड़े पैमाने का रोजगार पैदा करने की क्षमता है।
सस्ती कीमत पर गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता में आत्मनिर्भरता हासिल करने के अंतर्गत इस योजना के परिणामस्वरूप मत्स्यपालन औसत उत्पादकता 3 टन प्रति हेक्टेयर के वर्तमान राष्ट्रीय औसत से बढ़कर 5 टन प्रति हेक्टेयर होगी। ऐसा ऊंचे मूल्य वाली प्रजातियों को बढ़ावा देकर, सभी व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों के लिए ब्रूड बैंकों का एक राष्ट्रीय नेटवर्क स्थापित करके, झींगों के ब्रूड भंडार में आत्मनिर्भरता के लिए नाभिक प्रजनन केंद्रों की स्थापना और आनुवंशिक सुधार के माध्यम से, ब्रूड बैंकों, हैचरी, खेतों को मान्यता देकर, बीमारियों, एंटीबायोटिक्स और अवशेष विषयों, जलीय स्वास्थ्य प्रबंधन को संबोधित करके हासिल किया जाएगा। ये कदम गुणवत्ता और ऊंची उत्पादकता को सुनिश्चित करेंगे, निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार लाएंगे और मछुआरों व किसानों को ऊंचा मूल्य दिलवाने में मदद करेंगे।
कार्प मछलियों का प्रेरित प्रजनन
परिचय
भूमिका
कार्प मछली की प्रजनन क्षमता
प्रेरित प्रजनन तकनीक
नर व मादा मछलियों की पहचान एवं प्रजनकों का चयन
सुई लगाने के लिए पियूष ग्रंथि सार का निर्धारण
सिंथेटिक हॉर्मोन की मात्रा
प्रजनक मछलियों को सुई लगाना
प्रजनन एवं स्फुटन के लिए उपयुक्त वातावरण
स्त्रोत: पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार।
झींगा गड्ढे से जैविक अपशिष्ट प्रबंधन
अवशिष्ट प्रबंधन आवश्यक
जलकृषि उत्पादन बढ़ाना जरुरी
झींगा अपशिष्ट एकत्रण
झींगा गड्ढे के लाभ
अवशिष्ट प्रबंधन आवश्यक
वैज्ञानिक तरीके से एक कि.ग्रा. झींगा उत्पादन में लगभग 500 ग्राम जैविक अपशिष्ट निकलता है। अगर इन अपशिष्टों का उचित तरीके से प्रबंधन नहीं किया जाता है तो झींगे में बहुत सारे संक्रामक रोग हो सकते हैं। इन अपशिष्टों का प्रबंधन अति आवश्यक है। झींगा मल से निकले अपशिष्ट का कृषि के लिए कार्बनिक खाद के रूप में इस्तेमाल करके किसानों को फायदा पहुंचाया जा सकता है।
जलकृषि उत्पादन बढ़ाना जरुरी
खाद्य और कृषि संगठन (एपफएओ) के अनुसार जलकृषि वैश्विक मानव मछली खपत का 47 प्रतिशत (51 मिलियन टन) हिस्सा प्रदान करती है। जनसंख्या वृद्धि और प्रति व्यक्ति मछली खपत निरंतर बढ़ने के साथ-साथ जलकृषि उत्पादन को बढ़ाना भी जरुरी है।। इसकी बड़ी मात्रा हासिल करने के लिए भंडारण (स्टॉकिंग) क्षमता और तालाब की दशा सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानदंड हैं। तालाब में सघन कृषि के लिए अत्यधिक इनपुट (मुख्य रूप से तैयार खाद्य एवं उर्वरक) की जरुरत होती है। बचा हुआ खाद्य पदार्थ एवं झींगे द्वारा उत्सर्जित पदार्थों का जमाव होने से इन कार्बनिक पदार्थों का विघटन होने लगता है। इससे तालाब के तलछट में हानिकारक गैसों का निर्माण होता है।
झींगा तालाब के केंद्र में एकत्रित स्लज(कीचड़) कई संक्रामक रोगों का मुख्य कारण है। कार्बनिक अपशिष्ट तालाब की तली तक पहुंच जाता है जहां अधिकांश अनोक्सिक क्रियायें होती हैं। और अमोनिया एवं हाइड्रोजन सल्फाइड का निर्माण होता है। इससे झींगों में तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है। यह तनाव जल्दी और आसान संक्रमण का मौका देता है। ऐसी समस्याओं के निदान के लिए अब तक बहुत सारी भौतिक, रासायनिक और जैविक तकनीकों का उपयोग किया गया है जैसे-पानी का आदान-प्रदान, वायु का संचार, तलछट को हटाना एवं चूना डालना इत्यादि। आजकल झींगा तालाब से कार्बनिक अपशिष्टों के उचित प्रबंधन के लिए झींगा मल के उपयोग के तरीके तलाशे जा रहे हैं।
झींगा अपशिष्ट एकत्रण
दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में जैविक अपशिष्टों के जमाव की समस्या के समाधान के लिए इस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। बांग्लादेश और भारत में झींगा गड्ढे की स्थापना की ओर ध्यान गया है। इसके लिए तालाब के कुल सतह क्षेत्र का लगभग 5-7 प्रतिशत का उपयोग कर रहे हैं। झींगा शौचालय की स्थापना के लिए तालाब का आकार लगभग 1000-5000 वर्ग मीटर होना चाहिए। तालाब के तल में केंद्र की ओर ढलान होना चाहिए, जिससे अपशिष्ट पदार्थ केंद्र की तरफ 2-3 फीट गहरे गड्ढ़े या पिट में एकत्रित हो जाये। यह अपशिष्ट एक साइफनिंग मोटर से हर सप्ताह बाहर निकल दिया जाता है।। आजकल नई प्रणाली में कार्बनिक अपशिष्ट को निकालने के लिए केंद्रीय नली में एक एचडीपीई और रबर पैराबोला कवर प्रयोग किया जा रहा है।
झींगा गड्ढे के लाभ
संक्रमण की आशंका कम
झींगा तनावमुक्त
हानिकारक गैसों का निर्माण कम
एफ.सी.आर. नियंत्रित
झींगा तालाब प्रदूषण मुक्त
झींगा में मृत्युदर कम
सामान्य झींगा पालन की तुलना में इस विधि का उपयोग करने से किसानों की आय में वृद्धि
स्त्रोत: खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली, लेखक: नरेश राज कीर, उदयराम गुर्जर, सुमन ताकर, राजपाल यादव और खेमराज बुनकर भाकृअनुप-केंद्रीय मात्स्यिकी शिक्षण संस्थान, मुंबई-400061 (महाराष्ट्र)
रंगीन मछलियों का पालन एवं एक्वेरियम निर्माण
परिचय
अलंकारी मछलियों के प्रकार
अलंकारी मछलियों का पालन
सहायक उपकरणों का विक्रय
एक्वेरियम निर्माण
एक्वेरियम बनाने के लिए आवश्यक सामग्री
एक्वेरियम प्रबन्धन
एक्वेरियम कहां रखें?
रंगीन मछलियों का आहार
रंगीन मछलियों के आहार में कैरोटीन
परिचय
शहरों तथा कस्बों में रंगीन मछलियों को एक्वेरियम में रखने का प्रचलन दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। यह रखने वाले को सिर्फ मानसिक शान्ति ही नहीं देती बल्कि वास्तु दोष का भी निवारण करती है। आज झारखंड में तमाम रंगीन मछलियाँ दूसरे राज्यों से मंगाई जाती है जबकि इन्हें पालना कठिन नहीं है। खासकर महिलाएं इन्हें आंगन में भी कम पूंजी की लागत से कर सकती है। रंगीन मछलियों के पालन एवं एक्वेरियम निर्माण की तकनीकी जानकारियों से अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है।
अलंकारी मछलियों के प्रकार
शिशु जनक – गप्पी, सॉर्ड टैल, प्लेटो, मॉली आदि।
अंड जनक – गॉरामी, गोल्डफिश, एंजल, डॉलर फिश, पुन्टीयस आदि।
अलंकारी मछलियों का पालन
अलंकारी मछलियों के छोटे-छोटे तालाब या सीमेंट टैंक में पाला जा सकता है। इसके लिए जल का प्रवाहबद्ध पद्धति तैयार कर जल की गुणवत्ता बरकरार रखनी चाहिए। इनके लिए बाजार में सजीव एवं कृत्रिम आहार मौजूद हैं।
सहायक उपकरणों का विक्रय
रंगीन मछलियों के प्रजनन, पालन एवं निर्यात के अतिरिक्त इस व्यवसाय में एक्वेरियम की सुन्दरता को बढ़ाने तथा उनके प्रबन्धन हेतु तरह-तरह के पत्थर के टुकड़े, खिलौने, प्राकृति एवं कृत्रिम पौधे, शुष्क आहार, सजीव आहार, फिल्टर आदि की मांग काफी अधिक है। इन सामग्रियों का व्यवसाय भी शुरू कर अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है।
एक्वेरियम निर्माण
रंगीन मछलियों का अक्सर एक्वेरियम में पालते है। शीशे का बना हुआ आयताकार टैंक काफी प्रचलित है क्योंकि यह देखने में काफी आकर्षक लगता है तथा इसमें पानी रिसने की संभावना भी कम होती है। इसको बनाने एवं प्रबन्धन की जानकारी एक सफल व्यवसायी के लिए जरूरी है।
एक्वेरियम बनाने के लिए आवश्यक सामग्री
1.शीशे का टैंक, 2. बल्ब लगा ढक्कन, 3. छोटे-छोटे रंग-बिरंगे पत्थर, 4. स्टैंड, 5. जलीय पौधे, 6. सजावटी खिलौने, 7. वायुप्रवाहक, 8. एयरस्टोन, 9. फिल्टर, 10. रंगीन मछलियाँ, 11. हैण्ड नेट, 12. कृत्रिम आहार, 13. बाल्टी एवं मग, 14. स्पंज, 15. स्वच्छ जल।
एक्वेरियम प्रबन्धन
आकर्षक लगने हेतु एक्वेरियम का प्रबन्धन बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान देना आवश्यक है।
एक्वेरियम के शीशे की दीवार कुछ समय बाद धुंधली दिखाई देने लगती है इसलिए इसे मुलायम, साफ़ कपड़े से बिना खरोंच के शीशे को प्रतिदिन पोंछना चाहिए।
मछलियों के स्वास्थ्य का परीक्षण प्रतिदिन करना चाहिए।
एक्वेरियम में लगाए गए उपकरणों की क्रियाविधि की जांच समय-समय पर करते रहना चाहिए।
प्रत्येक 15 दिन पर जल का 10-30 प्रतिशत भाग बदलते रहना चाहिए।
अगर किसी कारणवश मछली बीमार हो तो तुरंत उसे अलग कर देना चाहिए।
एक्वेरियम कहां रखें?
एक्वेरियम रखने का स्थान समतल होना चाहिए। एक्वेरियम को लोहे या लकड़ी के मजबूत स्टैंड पर रखना चाहिए। सूर्य की किरणें उसपर सीधी नहीं पड़नी चाहिए, अन्यथा कई जमने की संभावना अधिक हो जाती हैं, जिससे एक्वेरियम गंदा दिखाई देने लगता है। 40 वाट के बल्ब की रोशनी का साधारण एक्वेरियम के लिए उपयुक्त होती है।
रंगीन मछलियों का आहार
मछलियों के अच्छी वृद्धि के लिए कृत्रिम आहार दिन में दो बार निश्चित समय पर 2-3 प्रतिशत शरीर के भार के अनुसार खिलाया जाना चाहिए।
रंगीन मछलियों की पोषण आवश्यकता
प्रोटीन
वसा
कार्बोहाइड्रेट
खनिज
विटामिन
30-45%
6-8%
40-50%
1%
1%
रंगीन मछलियों के आहार में कैरोटीन
रंगीन मछलियों का व्यावसायिक मूल्य उनके चमकीलें रंगों पर निर्भर करती है। कैरोटीन मछलियों की त्वचा के रंग का प्राथमिक श्रोत है। चूँकि कैरोटीन केवल पौधों द्वारा संश्लेषित किये जाते हैं इसलिए मछलियाँ इसकी आवश्यकता आहार से पूरी करती है। अत: मछलियों के व्यावसायिक संभावनाओं के देखते हुए यह आवश्यकता है कि उनके आकर्षक रंगों को बनाए रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में कैरोटीन लगातार आहार में मिलाया जाए। निम्नलिखित तालिका द्वारा विभिन्न अवयवों में कैरोटीन की उपलब्धता दर्शायी गई है।
आहार
औसत कैरोटीन की मात्रा
अवयवप
(मिग्रा./किग्रा.)
पीला मक्का
17
घास का चूरा
320
गेंदे के फूल का चूरा
8800
प्रॉन का चूरा
200
अलंकारी मछलियों के व्यवसाय की असीम संभावनाएँ है। यह स्वरोजगार का एक अच्छा साधन बन सकता है।
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