Cr.P.C
. की धारा 482 : एफआईआर में लगे आरोपों पर कुछ तथ्यात्मक सहायक सामग्री होनी चाहिए
: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द की
सुप्रीम
कोर्ट ने एक महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि एफआईआर (प्राथमिकी)
में जो आरोप लगाए गए हैं, उनके के लिए कम से कम कुछ तथ्यात्मक सहायक सामग्री होनी चाहिए।
एफआईआर में दर्ज शिकायतकर्ता का मामला इस प्रकार था: आरोपी ने 11 दिसंबर, 2016 को शिकायतकर्ता
के भाई के साथ शादी की और उसके बाद वह अपने भाई को मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान
करने लगी और यही कारण था कि उसके भाई की 8 दिसंबर, 2017 को नौकरी के दौरान अचानक मृत्यु
हो गई।
उनकी
मृत्यु के तुरंत बाद, उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आया और उसने उनको और अन्य ससुराल
वालों को घर से निकालने की कोशिश की। हर दिन, वह परिवार के सदस्यों को धमकाती और गाली
देती थी और जालसाजी करके, उसने अनुकंपा के आधार पर नौकरी प्राप्त की और सभी अंतिम लाभ
ले लिए और स्वर्गीय मोहम्मद शमीम खान (शिकायतकर्ता का भाई) के वास्तविक आश्रितों को
अंतिम लाभों से वंचित कर दिया और यह निकाह (विवाह) उसके द्वारा अपने पिछले पति से तलाक
के बिना किया गया था।
इस
शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई और उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा
494, 495, 416, 420, 504 और 506 के तहत आरोप तय किए गए। आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट
के समक्ष प्राथमिकी रद्द करने की मांग करते हुए धारा 482 सीआरपीसी के तहत एक याचिका
दायर की जिसे खारिज कर दिया गया।
इस
आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि शिकायत
में जो आरोप लगाया गया है उसका समर्थन करने के लिए कोई सबूत नहीं है जिसके आधार पर
प्राथमिकी दर्ज की गई है और भले ही प्राथमिकी में जो कहा गया है, उसे उसके चेहरे के
मूल्य पर ले भी लिया जाए तो प्रथम दृष्ट्या, चार्जशीट में उसके खिलाफ लगाए गए अपराधों
में से कोई भी अपराध नहीं बनता है।
राज्य और शिकायतकर्ता ने संयुक्त रूप से प्रस्तुत
किया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद, जांच की गई और उसके बाद ही चार्जशीट दायर की गई
और इसलिए कम से कम यह माना जा सकता है कि उसके खिलाफ प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है।
अदालत ने कहा कि हरियाणा राज्य और अन्य बनाम भजन लाल और अन्य के फैसले में असंख्य प्रकार
के मामलों की एक विस्तृत सूची दी गई है जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482/संविधान
के अनुच्छेद 226 के तहत शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए।
अदालत
ने नोट किया,
"इसमें कोई संदेह नहीं है कि आपराधिक कार्यवाही
को रद्द करने की शक्ति का प्रयोग बहुत कम और सावधानी के साथ किया जाना चाहिए और वह
भी दुर्लभतम से दुर्लभ मामलों में और विश्वसनीयता या वास्तविकता के रूप या अन्यथा प्राथमिकी
या शिकायत में लगाए गए आरोपों के बारे ममें जांच शुरू करना न्यायालय के लिए उचित नहीं
था और यह कि निहित शक्तियां न्यायालय को अपनी मर्जी और कल्पना के अनुसार कार्य करने
के लिए कोई मनमाना अधिकार क्षेत्र प्रदान नहीं करती हैं।"
पीठ ने कहा कि, इस मामले में, यदि आपराधिक कार्यवाही
जारी रखने की अनुमति दी जाती है, तो यह कानून की प्रक्रिया के स्पष्ट दुरुपयोग के अलावा
और कुछ नहीं होगा और आरोपी के लिए एक मानसिक आघात होगा।
अदालत
ने कहा कि धारा 482 सीआरपीसी के तहत उसके कहने पर दायर याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट
ने इस पहलू को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है।
अपील
की अनुमति देते हुए अदालत ने कहा:
हालांकि
यह सच है कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों की विश्वसनीयता या वास्तविकता के बारे में
किसी भी जांच को शुरू करने के लिए अदालत के लिए खुला नहीं था, लेकिन कम से कम प्राथमिकी
में जो आरोप लगाया गया है, उसके लिए कुछ तथ्यात्मक सहायक सामग्री होनी चाहिए जो वर्तमान
मामले में पूरी तरह से गायब है और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजी साक्ष्य स्पष्ट रूप से
समर्थन करते हैं कि उसका निकाहनामा सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिवत पंजीकृत और जारी
किया गया था और यहां तक कि उसके खिलाफ दायर चार्जशीट भी प्रथम दृष्ट्या खुलासा नहीं
करती है कि विवाह प्रमाण पत्र कैसे जला था।
बीमा
कंपनी केवल इस आधार पर कि चोरी की सूचना देरी से दी गई, दावा अस्वीकार नहीं कर सकती,
यदि एफआईआर तुरंत दर्ज की गई थी: सुप्रीम कोर्ट
⭐सुप्रीम
कोर्ट ने माना है कि यदि चोरी की वारदात की स्थिति में बीमा कंपनी केवल इस आधार पर
दावा अस्वीकार नहीं कर सकती कि कंपनी को वारदात की सूचना विलंब से दी गई, हालांकि एफआईआर
तुरंत दर्ज की गई थी। मामले में शिकायतकर्ता का बीमाकृत वाहन लूट लिया गया था। शिकायतकर्ता
ने धारा 395 आईपीसी के तहत अपराध के लिए एफआईआर दर्ज कराई थी। पुलिस ने आरोपितों को
गिरफ्तार किया और संबंधित न्यायालय में चालान किया। हालांकि वाहन का पता नहीं चल सका,
इसलिए पुलिस ने अन्ट्रेसबल (पता नहीं लगाया जा सका) रिपोर्ट दर्ज की।
⭐इसके
बाद, शिकायतकर्ता ने वाहन की चोरी के संबंध में बीमा कंपनी के समक्ष दावा दायर किया।
हालांकि बीमा कंपनी उचित समय में दावे का निस्तारण करने में विफल रही, और इसलिए, शिकायतकर्ता
ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम, गुड़गांव के समक्ष शिकायत दर्ज की। शिकायत के
लंबित रहने के अवधि में बीमा कंपनी ने इस आधार पर दावा अस्वीकार कर दिया कि शिकायतकर्ता
ने बीमा अनुबंध की शर्त संख्या एक का उल्लंघन किया। शर्त इस प्रकार है- "1. किसी भी दुर्घटना की स्थिति में कंपनी
को तुरंत लिखित नोटिस दिया जाएगा। किसी भी दावे की स्थिति में नुकसान या क्षति और ऐसी
सभी जानकारी और सहायता, जिसकी कंपनी को आवश्यकता होगी, बीमाधारक कंपनी को उपलब्ध कराएगा।"
जिला फोरम ने शिकायत की अनुमति दी हालांकि बाद में राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग
ने बीमाकर्ता की अपील को खारिज कर दिया। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने पुनरीक्षण
याचिका की अनुमति दी। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपील में मुद्दा यह था कि क्या बीमा कंपनी
चोरी के कारण वाहन के नुकसान के मामले में वाहन मालिक को, केवल इस आधार पर कि वाहन
चोरी के संबंध में कंपनी को विलंब से सूचना दी गई, दावे को पूरी तरह अस्वीकार कर सकती
है, जबकि वाहन मालिक ने बीमा कंपनी के साथ विधिवत बीमा कराया था।
⭐इस संबंध में, पीठ ने कहा कि गुरशिंदर सिंह बनाम
श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और एक अन्य, 2020 (11) एससीसी 612 में तीन जजों
की पीठ के समक्ष यह मुद्दा विचार के लिए मौजूद था, जिसमें माना गया था- जब एक बीमाधारक
ने वाहन चोरी के तुरंत बाद एफआईआर दर्ज की है और जब पुलिस ने जांच के बाद वाहन का पता
नहीं चलने के बाद अंतिम रिपोर्ट दर्ज की है और जब सर्वेयर /बीमा कंपनी द्वारा नियुक्त
जांचकर्ताओं ने चोरी के दावे को वास्तविक पाया है, तो चोरी की घटना के बारे में बीमा
कंपनी को सूचित करने में देरी बीमाधारक के दावे को अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकती
है।
⭐अदालत ने अपील की अनुमति देते हुए कहा, यह ध्यान
देने योग्य है कि बीमा कंपनी ने इस आधार पर दावे को अस्वीकार नहीं किया है कि यह वास्तविक
नहीं था। इसे केवल विलंब के आधार पर खारिज किया गया है।" केस शीर्षक: जैन कंस्ट्रक्शन
कंपनी बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड सिटेशन: 2022 लाइव लॉ (एससी) 154 केस
नंबर | तारीख: CA 1069 of 2020| 11 फरवरी 2022 कोरम: जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस
बेला एम. त्रिवेदी
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