सुप्रीम
कोर्ट ने कहा कि मामले को वाापस भेजने का आदेश स्वाभाविक तौर पर पारित नहीं किया जा
सकता है।
जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी की
पीठ ने कहा कि जहां दोनों पक्षों ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पेश किये हैं, अपीलीय
कोर्ट को मामले को निचली अदालत या ट्रिब्यूनल में भेजने के बजाय योग्यता के आधार पर
फैसला करना होगा। इस मामले में, एक भूमि न्यायाधिकरण द्वारा जारी एक नोटिस को कर्नाटक
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने भूमि मालिकों द्वारा दायर एक रिट याचिका स्वीकार करते हुए रद्द
कर दिया था। खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को भूमि संबंधी
ट्रिब्यूनल में भेज दिया। इसलिए विचारणीय मुद्दा यह था कि क्या एकल न्यायाधीश के आदेश
को पलटने, भूमि न्यायाधिकरण के आदेश को रद्द करने और मामले को भूमि न्यायाधिकरण को
भेजने का खंडपीठ का फैसला न्यायोचित था?
अभिलेखों को देखते हुए, पीठ ने कहा कि डिवीजन बेंच
ने बिना कोई ठोस कारण बताए एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द कर दिया है और मामले को भूमि
न्यायाधिकरण को भेज दिया है। कोर्ट ने कहा: यह स्थापित कानून है कि रिमांड का आदेश
स्वाभाविक या अनिवार्य तौर से पारित नहीं किया जा सकता है। केवल ट्रायल कोर्ट या ट्रिब्यूनल
को मुकदमा वापस करने के उद्देश्य से रिमांड आदेश भी पारित नहीं किया जा सकता है। अपीलीय
न्यायालय द्वारा मामले को गुण-दोष के आधार पर निपटाने का प्रयास किया जाना चाहिए। जहां
दोनों पक्षों ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पेश किये हैं, अपीलीय न्यायालय को मामले
को ट्रायल कोर्ट या ट्रिब्यूनल को वापस भेजने के बजाय योग्यता के आधार पर निर्णय लेना
चाहिए। अदालत ने इस प्रकार निष्कर्ष निकाला
कि डिवीजन बेंच ने बिना किसी औचित्य के मामले को वापस भेजने का फैसला किया है। मामले
का विवरण: नादकेरप्पा (मृत) बनाम पिल्लम्मा (मृत) | 2022 लाइव लॉ (एससी) 332 | सीए
7657-7658/2017 | 31 मार्च 2022 कोरम: जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी
वकील : वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एन. वेणुगोपाल गौड़ा (अपीलकर्ता के लिए), वरिष्ठ अधिवक्ता
विकास सिंह और वरिष्ठ अधिवक्ता किरण सूरी (प्रतिवादी के लिए) अनिवार्य तौर पर मामला वापसी (रिमांड) का आदेश पारित
नहीं किया जा सकता है। केवल निचली अदालत या ट्रिब्यूनल को कार्यवाही वापस करने के उद्देश्य
से भी रिमांड आदेश पारित नहीं किया जा सकता है। अपीलीय कोर्ट द्वारा मामले को गुण-दोष
के आधार पर निपटाने का प्रयास किया जाना चाहिए। जहां दोनों पक्षों ने मौखिक और दस्तावेजी
साक्ष्य पेश किये हैं, अपीलीय कोर्ट को मामले को ट्रायल कोर्ट या ट्रिब्यूनल को वापस
करने के बजाय योग्यता के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। (पैरा 25) में केंद्र और बीमा कंपनियों ने बताया कर्नाटक भूमि
सुधार अधिनियम, 1961- कृषि भूमि के काश्तकारों को कब्जा अधिकार प्रदान करने के लिए
लाभकारी कानून - ऐसे अधिनियमों के प्रावधानों को समझने में, अदालत को संरचनात्मक सोच
अपनाना चाहिए जो अधिनियम के उद्देश्य को आगे बढ़ाता है, पूरा करता है और आगे बढ़ाता
है न कि ऐसी सोच जिससे उद्देश्य फलीभूत नहीं होगा और सुरक्षा को भ्रम में डाल देगा
- अधिकांश किरायेदार दूरदराज के इलाकों के ग्रामीण हैं और उनमें से अधिकतर अनपढ़ व्यक्ति
हैं और यह अधिनियम एक लाभकारी कानून है। अधिनियम के तहत मामलों का फैसला करते समय इस
पहलू को ध्यान में रखा जाना चाहिए। (पैरा 23,28) सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता की आरोपी से शादी करने पर अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति
का प्रयोग करते हुए बलात्कार का मामला खारिज किया
⚫
भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट
ने बलात्कार के एक मामले को रद्द कर दिया, क्योंकि उसने कहा कि शिकायतकर्ता/कथित पीड़िता
ने अपीलकर्ता/अभियुक्त से शादी कर ली।
तेलंगाना
हाईकोर्ट द्वारा सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर उनके आवेदन को खारिज करने के आदेश
के खिलाफ अपीलकर्ता/अभियुक्त द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए जस्टिस विनीत सरन
और जस्टिस जे.के. माहेश्वरी की पीठ ने कहा:
🟤उपरोक्त
तथ्यों और यह ध्यान में रखते हुए कि प्रतिवादी नंबर दो/शिकायतकर्ता ने स्वयं हमारे
सामने एक बयान दिया है कि उसने अपीलकर्ता से शादी कर ली है और अब खुशी से रह रही है,
हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मामले में पूर्ण न्याय के लिए अपनी शक्तियों
का प्रयोग करते हैं। हम भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 417, 420 और 376 के तहत
अपीलकर्ता के खिलाफ प्रतिवादी नंबर दो द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करते हैं।"
🟢अपीलकर्ता/अभियुक्त
के खिलाफ प्रतिवादी नंबर दो/शिकायतकर्ता द्वारा आईपीसी की धारा 417, 420, और 376 के
तहत अपराधों के लिए एफआईआर दर्ज की गई। उनका मामला है कि वे दोनों एक-दूसरे से भारत
मैट्रिमोनी के जरिए मिले और उसके बाद वे एक-दूसरे के संपर्क में रहे।
🔵इसके
अलावा, उसने आरोप लगाया कि शादी के वादे पर अपीलकर्ता/आरोपी ने उसके साथ शारीरिक संबंध
बनाए। उसके बाद जब उसने उससे शादी करने से इनकार कर दिया तो उसने उसके खिलाफ एफआईआर
दर्ज कराई। हालांकि, बाद में दोनों ने शादी कर ली, इसलिए वे एफआईआर को रद्द करने के
लिए तेलंगाना हाईकोर्ट चले गए।
तेलंगाना
हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी।
🟡इसके
बाद वे सुप्रीम कोर्ट चले आए। न्यायालय के समक्ष प्रतिवादी नंबर दो/शिकायतकर्ता ने
एक बयान दिया कि वह अब अपीलकर्ता से शादी कर चुकी है और एक सुखी वैवाहिक जीवन जी रही
है। इस प्रकार, उसने कहा कि वह अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर को जारी रखने की इच्छा
नहीं रखती है। इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील को मंजूर करते हुए एफआईआर रद्द
कर दी।
केस
का शीर्षक - जतिन अग्रवाल बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य।
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