बडे
आयोजन से आदिवासियों का भला नही बल्कि,उनके
संवैधानिक अधिकारों को जमीन पर लागू करने से होगा : इंद्रपाल मरकाम
देश-प्रदेश
के आदिवासियों को ये समझना होगा
डिण्डौरी। राजनैतिक पार्टिया विशेषकर सत्ताधारी पार्टिया
आदिवासियों को अपने पक्ष में लाने के लिए बडे बडे आयोजन करते है। घोषणाएं भी
बडी-बडी होती हैं। परंतु आदिवासियों की स्थिति मे नही के बराबर बदलाव आया है।
वास्तव मे यदि सरकार बदलाव और आदिवासियों का विकास चाहती है तो आदिवासियों को उनके
संवैधानिक विशेषाधिकार जैसे पांचवी छटवी अनुसूची,वनाधिकार,पेसा एक्ट को अक्षरशः लागू करें, परंतु
सरकार कांग्रेस की हो या बीजेपी की आदिवासियों के विशेषाधिकार देने से सबको परहेज
है क्योंकि कांग्रेस की 6-7 दशको की सरकार
ने भी संविधान में प्रदत्त आदिवासियों के पांचवी,
छटवी अनुसूची के अधिकारो को जमीन पर लागू नही किया । इतना ही नही 1-2 दशको से बीजेपी की सत्ता है और बीजेपी ने भी
इसे जमीन पर लागू नही किया।
जब
पूंजीपतियों और आदिवासियों मे से किसी एक की हित की बात आती है हमेशा सरकार का
निर्णय पूंजीपतियों के पक्ष में होता है और आदिवासियों को हमेशा दरकिनार कर दिया
जाता है। कांग्रेस के 15 माह की सरकार
में इसका उदाहरण सबके सामने आया था जब 89
आदिवासी क्षेत्रों के रेत खदान पांचवी अनुसूची क्षेत्र में होने के बाद भी उन्हे
ग्राम सभा को सौंपने के बजाए तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने पूंजीपतियों को नीलाम कर
दिया।
बीजेपी
की सत्ता पहले भी थी और आज भी है परंतु उन्होंने भी सरकार में आते ही रेत नीति में
बदलाव नही किया और खदान ग्राम सभा के बदले पूंजीपतियों को सौंपने का काम किया। हां
इतना जरूर है कि कुछ दिन पहले कमलनाथ जी का स्टेटमेंट आता है कि कांग्रेस
आदिवासियों की पार्टी है। छिंदवाड़ा में आयोजित विश्व आदिवासी दिवस 2019 को तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी ने
आपने उद्बोधन में वनाधिकार कानून में बदलाव कर वन ग्राम को राजस्व ग्राम में
परिवर्तन करने की बात कही थी और बीजेपी तो 15
नंवबर को जनजातीय गौरव दिवस मना रही है।
सरकार,समाज और समाज के प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओ को इस बात को समझना
चाहिए कि आदिवासियों का भला वोट के लिए हो रहे बडे आयोजनो से नही होगा ।
आदिवासियों का भला होगा उनके लिए बने योजनाओं के उचित क्रियान्वयन से , उनके लिए आवंटित बजट का पूरी पारदर्शिता से उपयोग करने से, योजनाओं का लाभ उन आदिवासी नौजवानों को देने से जिन्हें सच मे आज उस
योजना की जरूरत है,ना कि उन्हें
जिनके लिए पार्टी या कुछ विशेष व्यक्तियों द्वारा अनुमोदित किया जाता हैं।
विगत
1-2 दशको से आदिवासियों की जागरूकता ने आज
आदिवासियों को भारतीय राजनीति के केंद्र मे लाकर खडा कर दिया है और यही कारण है कि
उन्हे रिझाने के लिए आज सरकारो मे होड़ सी मची है परंतु वास्तव मे किसी भी पार्टी
की सरकार उनके वास्तविक विकास को लेकर चिंतित नही है सिर्फ उनको वोट बैंक के लिए
ही उपयोग किया जा रहा है। मध्यप्रदेश-गुजरात की बीजेपी सरकार हो या छत्तीसगढ़
राजस्थान की कांग्रेस सरकार आज किसी ने भी आदिवासियों के वास्तविक हित के लिए कोई
ठोस कदम नही उठाया है। आज तक तो सरकारों ने आदिवासियों के पांचवी अनुसूची के
अधिकार को तक जमीन पर लागू नही किया है।
जनजातीय
गौरव दिवस पर आदिवासियों के हक के पैसो के हो रहे दुरूपयोग को आदिवासी समाज को
समझना चाहिए
15 नवंबर को भोपाल मे मध्यप्रदेश सरकार जनजातीय गौरव दिवस मना रही है।
जिसमे आदिवासियों के नाम से आवंटित बजट का दुरुपयोग किया जा रहा है। इसके पहले भी
जबलपुर मे बडे आयोजन मे आदिवासियों के हिस्से का बजट का ही उपयोग किया गया था जो
आदिवासियों की संस्कृति के संरक्षण,उनके
शिक्षा स्वास्थ्य पर खर्च होना था उस बजट के करोडो रूपयो का उपयोग सिर्फ राजनैतिक
रोटिया सेकने के लिए किया जा रहा है। इस बात को आदिवासी समाज को समझना होगा। समझना
होगा कि आज आदिवासी क्षेत्रो मे शिक्षा स्वास्थ्य की बदतर स्थिति को इस बजट से
सुधारा जा सकता था, सरकार से हमारा
सीधा कहना है कि आयोजन करो आपका आयोजन है परंतु,
आदिवासियों के हक के पैसे से नही अपने हक के पैसो से करो।
आदिवासियों
के लिए आवंटित बजट का उपयोग आदिवासी क्षेत्रों मे स्थित छात्रावासो,विद्यालयों और कॉलेजों की स्थिति को सुधारने के लिए होना चाहिए जहां
आज पर्याप्त शैक्षणिक संसाधन नही है,सम्पूर्ण
शैक्षणिक स्टाफ नही हैं,छात्रावासो मे
साफ पानी और अन्य संसाधनों की कमी है। 90
प्रतिशत आदिवासी गांवों मे पीने का साफ पानी तक नही है या एक दो हैंडपंप के सहारे
पूरा गांव आज जी रहा है। इन समस्याओं के समाधान के बजाय आदिवासियों के हक के पैसे
का दुरुपयोग सत्ताधारी पार्टी द्वारा अपने राजनैतिक फायदे के लिए करना निंदनीय और
चिंतनीय है। इस प्रकार आयोजन का वित्तीय प्रबंधन आयोजन करने वाली राजनीतिक दलों को
करना चाहिए जिससे सरकार को अतिरिक्त बोझ का सामना न करना पड़े।
रेत
खदान ग्राम सभा को सौपे सरकार आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और लोगो को
मिलेगा सस्ती रेत
डिंडोरी
जिले सहित अन्य अनुसूचित क्षेत्रों मे स्थित रेत खदानों के खनन और नियंत्रण के
अधिकार स्थानीय ग्राम सभा को सौपे सरकार इसके लिए हम जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस)
के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनो दलों की सरकार से मांग करते आए
हैं, परंतु आज आदिवासियों के बजट से बड़े बड़े
आयोजन किये जा रहे हैं। सरकार इन आदिवासियों की मांगों को मानना तो दूर, इस पर बात भी नहीं करना चाहती। जो कि आदिवासी और उन क्षेत्रों में
निवासरत अन्य लोगो के साथ भेदभाव है,जहाँ
उन्हे अपने जिले का रेत महगे दामो मे बाहरी जिलों के पूंजीपतियों से लेना पडता है।
12 करोड बियानबे लाख पिच्यासी हजार से हो सकता सैकडो आदिवासियों का भला
आदिवासी
संस्कृति के परिरक्षण,विकास एवं
देवठान मद अंतर्गत आवंटित बजट का उपयोग जनजातीय गौरव दिवस मे राजनैतिक रोटिया
सेकने के लिए किया जाना आदिवासियों के साथ अन्याय है। और इस बात को आदिवासियों को
समझना होगा कि आजादी के बाद से आज तक अरबो खरबो रुपए खर्च करने के बाद भी आज
आदिवासी समाज हासिए मे है और उनकी स्थिति बदतर होती जा रही है।
इसका
एक कारण यह भी है कि उनके लिए आवंटित बजट का दुरुपयोग सिर्फ राजनैतिक रोटियां
सेंकने के लिए किया जा रहा है जिसमे सत्ताधीश सत्ता का गलत उपयोग करते हुए
सम्पूर्ण सरकारी तंत्र को लगाया गया है। जबकि ऐसे लाखों आदिवासी युवा जो स्वरोजगार
करना चाह रहे हैं उनकी ऋण की फाइलें बैंकों में अटकी पड़ी हैं। उनको पूंजी उपलब्ध
कराने का दायित्व प्रशासन का है।
12,92,85000 रूपयो से ना जाने कितने आदिवासियों का भला
होता और उनकी संस्कृति के संरक्षण केे लिए प्रशासन प्रयासरत होता तो आदिवासी समाज
का कितना भला होता। सरकार को आयोजन करना है तो आदिवासियों के हक के पैसे के बजाए
अपने पैसे का उपयोग करें और राजनैतिक रोटी सेकना है तो पार्टी फंड से आयोजन करें।
सरकार आदिवासियों को गुमराह कर उनके हक के पैसे का बंदरबांट करना बंद करे
आदिवासियों के बजट का उपयोग केवल आदिवासियों के विकास,उनके उत्थान के लिए होना चाहिए।
सरकार
वास्तव मे आदिवासी समाज का हित चाहती है तो आदिवासी समाज के रीति रिवाज और परंपरा
के आधार पर पेसा कानून को लागू करे और आदिवासी क्षेत्रों में विद्यालय, महाविद्यालय, स्वास्थ्य
सुविधाओं में बेहतरी कर रोजगार मूलक शिक्षा कृषि,विधि
जैसे विषयों पर सभी सरकारों को सोचने की आवश्यकता है। आदिवासी समाज को अन्य समाज
की भांति समाज के मुख्यधारा में लाना है तो सरकार को कुछ नियमो में परिवर्तन कर
उच्च शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में अवसर प्रदान कर आदिवासियों की
प्रतिनिधित्व को बनाए रखना चाहिए।
डॉ
मनमोहन सिंह के कार्यकाल में स्व.श्री अर्जुन सिंह जी के अथक प्रयास से आदिवासी
समाज के विकास और उत्थान के लिए देश की एकमात्र आदिवासी विश्वविद्यालय इंदिरा
गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय अमरकंटक की स्थापना 2008 में की गई थी जिसकी मूल उद्देश्य आदिवासी समाज
को उच्च शिक्षा , उनकी संस्कृति,साहित्य को संजोय रखने के उद्देश्य लेकर स्थापना की गई लेकिन आज
विश्वविद्यालय में आदिवासी छात्र प्रवेश पाने के संघरशील है और विभिन्न कठिनाइयों
का सामना करना पडता है।
रानी
दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के अंतर्गत आदिवासी रहवासी छात्रावासो को कोरोना
के आड़ में बंद कर दिया है आज भी अपने हक और अधिकार के लिए आदिवासी छात्र संघर्ष
कर रहा है। उच्च शिक्षा अध्ययन कर रहे आदिवासी छात्रों के लिए आवास सहायता योजना
सरकार की लेकर आई थी लेकिन कुछ वर्षों से आवाज सहायता योजना और छात्रवृत्ति योजना
का लाभ छात्रों को नियमित रूप से नहीं मिल पा रहा है। सरकार आदिवासी समाज का
सर्वांगीण विकास करना चाहती है तो निश्चित ही सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव कर
उनको दूसरे समाज की भांति समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।
- जयस डिंडोरी
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