5 सितम्बर ( शिक्षक दिवस ) पर विशेष
तथ्य.
आज मै यूऋषियाई मूल के'' सर्वपल्ली राधाकृष्णन '' और मूलनिवासी बहुजन समाज के '' राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले''
दोनो के ''एजुकेशन'' के लिए किये गए कार्यो को बताउंगा.
फिर फैसला आपलोग ही करना की किसका
जन्मदिन ''राष्ट्र
गुरु'' / टीचर
दिवस के रूप में मनाना चाहिए.
1)तथाकथित सर्वपल्ली राधाकृष्णन के पैदा
होने के 40
साल पहले से ही ''राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले'' ने आधुनिक भारत में एजुकेशन के फिल्ड
में क्रांति सुरु कर दी थी.
सबूत 👇
'राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले'' का जन्म 11 अप्रैल 1827 में हुआ और उन्होंने क्रांति की
सुरुवात 1848 को
कर ही दिया जबकि विदेशी ब्राह्मण जात ''सर्वपल्ली राधाकृष्णन'' का जन्म 5 sep
1888 को हुआ मतलब
फुले की क्रांति के 40 साल बाद.
2)''राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले'' ने 1848 से शुरू कर 4 साल के अन्दर ही करीब 20 स्कूल खोल डाले ,जब की ब्राह्मण सर्वपल्ली ने एक भी
स्कूल नहीं खोला.
3)''राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने पिछड़ी
जात के लोगो को बिना पैसे लिए एजुकेशन दिया ,जब की ब्राह्मण श्रेष्ठ सर्वपल्ली ने
जिंदगी भर पैसे की लालच में लोगो को पढ़ाया.
4)''राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले'' ने खुद की जेब से पैसे खर्च कर लोगो को
education दी
जबकि उच्चगवर्णी सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एजुकेशन देने के नाम पर खूब पैसा कमाया.
5)गाव देहातो में ''राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले'' ने 20 स्कूल खोले ,जब की ब्राह्मण जात सर्वपल्ली गावो में
स्कूल खोलने गये ही नहीं.
6)सबको बैज्ञानिक सोच वाली एजुकेशन 'राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने दिया ,जब की ब्राह्मण सर्वपल्ली ने ''ब्राह्मण धर्म'' (हिन्दू धर्म) की गैर बराबरी और
अंधविश्वास वाली एजुकेशन के कट्टर समर्थक थे.
7)''बालविवाह'' का विरोध और ''विधवा विवाह'' को बढ़ावा दिया "'राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने जबकि
ब्राह्मण सर्वपल्ली जी बाल विवाह के समर्थक थे,और विधवा विवाह के विरोधी.
8)महिलाओं के लिए पहला स्कूल अगस्त 1848 को 'राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने खोला जब
की ब्राह्मणी व्यवस्था के समर्थक सर्वपल्ली स्त्री एजुकेशन के विरोधी थे.
9)''राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने अपनी
पत्नी को सबसे पहले एजुकेशन दी ,जबकि सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी औरत को अनपढ़ ही बनाए रखा.
फूले जी ने नि:शुल्क शिक्षा देने दिलवाने
का कार्यक्रम चलाया. जबकि राधाकृष्णन ने पडाने के लिये वैतन लिया.
उपर्युक्त में आपको अपना विचार सादर
आमंत्रित है.
हम
लोग अनुसूचित जाति से सम्बंध
रखते हैं इसीलिये हिंदु
नहीं कहलाए जा सकते
अनुसूचित_जाति" का अर्थ ?
जाति का मतलब तो सबको पता है। परन्तु
अनुसूचित का मतलब
सभी को शायद पता नही है ?
इस के लिये आगे पढ़िए...
सन् 1931
में उस समय के जनगणना आयुक्त (मी. जे. एच. हटन) ने पहली संपूर्ण भारत
की अस्पृश्य_ जातियों की जन गणना करवाई
और बताया कि ‘भारत में 1108 अस्पृश्य जातियांँ है ।
और वें सभी जातियांँ
हिन्दू धर्म के
बाहर हैं।
इसलिए, इन
जातियों को
"बहिष्कृत जाति" कहा गया है।
उस समय के
"प्रधानमंत्री
"रैम्से मैक्डोनाल्ड"
ने देखा कि हिन्दू, मुसलमान, सिख,
एंग्लो इंडियन की तरह
'बहिष्कृत जातियांँ' भी
एक स्वतंत्र वर्ग है ।
और इन सभी जातियों का हिन्दू धर्म में समाविष्ट नही है।
इसलिए, उनकी "एक "सूची" तैयार की गयी।
उस "सूची" में समाविष्ट समस्त जातियों' को ही ‘अनुसूचित जाति’ कहा जाता है।
इसी के आधार पर भारत सरकार द्वारा ‘अनुसूचित जाति अध्यादेश 1935 ’ के अनुसार कुछ सुविधाएं दी गई हैं।
उसी आधार पर भारत सरकार ने ‘अनुसूचित जाति अध्यादेश 1936 ’ जारी कर आरक्षण सुविधा का प्रावधान किया ।
आगे
1936 के उसी अनुसूचित जाति अध्यादेश में थोड़ा बहुत
बदलाव कर
‘अनुसूचित जाति अध्यादेश 1950’
पारित कर "आरक्षण" का
प्रावधान किया गया।
"निष्कर्ष"
अनुसूचित जाति का इतिहास यही कहता है
कि यह भारत वर्ष में
1931
की जनगणना के पहले की अस्पृश्य, बहिष्कृत जातियां
हिन्दू धर्म से बाहर थी।
और इन्ही सभी बहिष्कृत जातियों की "सूची" तैयार की गई।
और उन्ही (अस्पृश्य, बहिष्कृत, हिन्दू से बाहर ) जातियों की "सूचि" के 'आधार' पर
डाॕ. बाबा
साहेब आंबेडकर जी ब्राह्मणों के खिलाफ
जाकर अंग्रेजो से लड़कर
हमें
"मानवीय अधिकार" दिलाने में "सफल" हुए।
तो हमें भी ये अच्छे से
जान और समझ लेना चाहिए की।
अनुसूचित का मतलब उस दौर में (अस्पृश्य, बहिष्कृत, हिन्दू से बाहर),
मतलब जो हिन्दू नहीं थी वे जातियां है।
हिन्दू धर्म के
स्वतंत्र वर्ण व्यवस्था से बाहर पाँचवा अघोषित वर्ण ' अतिशूद्र'।
"'अनुसूचित जाति'
हमारी संवैधानिक पहचान है।
और आज जो कुछ लाभ हम ले रहे हैं।
वह सिर्फ और सिर्फ मिलता है। अनुसूचित
वर्ग के नाम पर।
ना कि दलित, चमार, पासी, सोनकर या वाल्मीकि आदि
जाति के नाम पर।
"अनुसूचित" नाम का उद्भव के इतिहास की जानकारी होने के बावजूद भी हमारे लोग हिन्दू धर्म की पूँछ को पकडे़ हुए हैं।
अगर हम लोग अभी भी हिन्दू धर्म की पूँछ पकड़े हुए है तो नैतिक रूप से डाॕ. बाबा साहेब आँबेडकर जी के संविधान
का सरासर अपमान कर रहे है।
हमेशा याद रहे की अनुसूचित का
मतलब
सिर्फ और सिर्फ यही है।
कि "जो लोग हिन्दू धर्म में नहीं
है वें लोग अनुसूचित वर्ग से है।"
इस सन्देश के माध्यम से मैने
पूरी कौशीश की है समझाने की ,
उम्मीद
है आप यह मैसज आगे फारवर्ड करके समाज के
लोगों को समझाने की अवश्य कौशीश करेंगे
...
धन्यवाद
जयभीम !
जय संविधान !
जय विश्व गुरू
जय मूलनिवासी

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