#मजदूरों_ही_नहीं
#किसानों_के_लिए_भी_जानलेवा_बना_लॉकडाउन, #मराठवाड़ा_में_109_किसानों_ने_की_आत्महत्या…
By News Desk -May 24, 2020,
Farmers Suicide,फोटो साभार- The Hindu Businessline
लॉकडाउन के दौरान मजदूरों की बदहाली की तस्वीरें देशभर से अा रही हैं, कहीं मजदूर भूखे प्यासे पैदल चल रहे हैं तो कहीं बसों से कुचले जा रहे हैं और कहीं ट्रेन की पटरी पर कटकर जान जान गवां रहे हैं। मजदूरों के हालात की तरह ही किसानों के हालात भी हैं। वो भी बर्बादी की कगार पर पहुंच गए हैं।
#किसानों_के_लिए_भी_जानलेवा_बना_लॉकडाउन, #मराठवाड़ा_में_109_किसानों_ने_की_आत्महत्या…
By News Desk -May 24, 2020,
Farmers Suicide,फोटो साभार- The Hindu Businessline
लॉकडाउन के दौरान मजदूरों की बदहाली की तस्वीरें देशभर से अा रही हैं, कहीं मजदूर भूखे प्यासे पैदल चल रहे हैं तो कहीं बसों से कुचले जा रहे हैं और कहीं ट्रेन की पटरी पर कटकर जान जान गवां रहे हैं। मजदूरों के हालात की तरह ही किसानों के हालात भी हैं। वो भी बर्बादी की कगार पर पहुंच गए हैं।
लॉक डाउन की शुरुआती दिनों में खेतों में नहीं जाने दिया गया तैयार हुई फसल को काटने नहीं दिया गया और बाद में जब परमिशन मिली तो तमाम फसलों और उपज के लिए बाजार में कोई जगह नहीं थी। उपज औने पौने दामों में बेचने को मजबूर तमाम किसान इतने परेशान हैं कि आत्महत्या जैसे घातक कदम उठा रहे हैं।
द हिंदू बिजनेस लाइन की खबर के मुताबिक, मार्च-अप्रैल में सिर्फ मराठवाड़ा इलाके में 109 किसानों ने आत्महत्या कर ली। यानी लगभग 2 किसानों ने रोजाना आत्महत्या का रास्ता चुना। मराठवाड़ा क्षेत्र के सभी 8 जिलों में आत्महत्या की इसी तरह से खबरें आ रही हैं।
किसानों के लिए बनी शेतकरी संगठन के प्रेसिडेंट अनिल कहते हैं ‘आत्महत्या के ये आंकड़े और बढ़ सकते हैं । कोरोना लॉकडाउन की वजह से अगले एक-दो साल तक खेती किसानी का संकट बढ़ता चला जाएगा और किसान ज्यादा अवसाद में जाते रहेंगे। उगाए गए उत्पादों के लिए मार्केट नहीं है जो कुछ उगाया जा रहा है उसका 10 परसेंट भी नहीं बिक रहा है । यहां तक कि किसान अब बुवाई करने के लिए भी पैसे की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं।’
दूसरी तरफ सरकार ने 20 लाख करोड़ के भारी-भरकम राहत पैकेज की घोषणा कर दी है तमाम मीडिया रिपोर्ट बता रही हैं कि अंबानी अडानी जैसे उद्योगपतियों को हजारों करोड़ का इसमें फायदा भी मिलने वाला है। लेकिन इस भारी-भरकम घोषणा के अंदर किसानों को क्या रियायत दी जाएगी, उसका कोई खास जिक्र नहीं है।
6--कोरोना_पर_PM_मोदी
#प्रेस_कांफ्रेंस_क्यों_नहीं_कर_रहे_हैं?
#जवाब_में_प्रेस_कांफ्रेंस_ही_बंद_कर_दी_रवीश_कुमार
By News Desk -May 21, 2020,Ravish Kumar
#प्रेस_कांफ्रेंस_क्यों_नहीं_कर_रहे_हैं?
#जवाब_में_प्रेस_कांफ्रेंस_ही_बंद_कर_दी_रवीश_कुमार
By News Desk -May 21, 2020,Ravish Kumar
19 मई
को
भी
स्वास्थ्य
मंत्रालय
की
कोविड-19
पर
प्रेस
कांफ्रेंस
नहीं
हुई।
11 मई
को
आखिरी
बार
हुई
थी।
उसके
बाद
से
नियमित
प्रेस
कांफ्रेंस
बंद
है।
शाम
को
प्रेस
रिलीज
आ
जाती
है
जिसे
छाप
दिया
जाता
है।
एक
ऐसे
दिन
जब
कोविड-19
की
संख्या
एक
लाख
के
पार
चली
गई
स्वास्थ्य
मंत्रालय
के
अधिकारी
प्रेस
के
सामने
ही
नहीं
आए।
क्या
सरकार
ने
इस
महामारी
से
संबंधित
सूचनाओं
को
व्यर्थ
मान
लिया
है?
सरकार
मान
सकती
है
लेकिन
क्या
लोगों
ने
भी
मान
लिया
है?
क्या
सरकार
यह
संकेत
दे
रही
है
कि
जो
कहना
है
कह
लीजिए,
हम
प्रेस
कांफ्रेंस
नहीं
करेंगे।
प्रश्नों
के
उत्तर
नहीं
देंगे।
प्रेस कांफ्रेंस का स्वरूप भी बदल गया है। शुरू में स्वास्थ्य मंत्रालय में प्रेस कांफ्रेंस होती थी। तब दूरदर्शन, ऑल इंडिया रेडियो और ANI को
ही
इजाज़त
थी।
ANI से
लाइव
किया
जाता
था।
उसके
बाद
प्रेस
कांफ्रेंस
नेशनल
मीडिया
सेन्टर
में होने
लगी।
यहां
पत्रकार
होते
थे
मगर
सवाल
दो
चार
ही
हो
पाते
थे।
इस प्रेस कांफ्रेंस में गृहमंत्रालय, ICMR, विदेश
मंत्रालय
के
भी
प्रतिनिधि
होते
थे।
उसके
बाद
दो
लोग
आने
लगे।
ICMR के
प्रतिनिधि
का
आना
बंद
हो
गया।
अब
सिर्फ
स्वास्थ्य
मंत्रालय
के
संयुक्त
सचिव
और
गृहमंत्रालय की संयुक्त सचिव आते हैं। वे भी 11 मई
के
बाद
से
नहीं
आए
हैं।
शुरू शुरू में ICMR के
वैज्ञानिक
गंगाखेडकर
होते
थे।
स्वास्थ्य
मंत्रालय
के
अधिकारी
लव
अग्रवाल
अक्सर
कहते
सुने
गए
हैं
कि
टेक्निकल
बातों
का
जवाब
गंगाखेडकर
जी
देंगे।
करीब
20 दिनों
से
गंगाखेडकर
जी
प्रेस
कांफ्रेंस
में
नहीं
आए
हैं।
क्या
टेक्निकल
सवाल
खत्म
हो
चुके
हैं?
वैज्ञानिक
जगत
भी
चुप
है।
उसमें
भी
आवाज़
उठाने
की
साहस
नहीं
है।
कोई
नहीं
पूछ
रहा
कि
गंगाखेडकर
कहां
हैं।
यही नहीं इस महामारी से लड़ने के लिए 29 मार्च
को
11 एम्पावर्ड
ग्रुप
का
गठन
किया गया
था।
अभी
तक
सिर्फ
7 मौकों
पर
ही
एम्पावर्ड
ग्रुप
के
चेयरमैन
ने
प्रेस
को
संबोधित
किया
है।
4 एम्पावर्ड
ग्रुप
ने
प्रेस
कांफ्रेंस
ही
नहीं
की
है।
यही
नहीं
पहले
7 दिन
प्रेस
कांफ्रेंस
होती
थी।
अब
इसे
घटाकर
4 दिन
कर
दिया
गया
है।
बुधवार,
शनिवार
और
रविवार
को
प्रेस
कांफ्रेंस
नहीं
होती
है।
अब
तो
11 मई
से
प्रेस
कांफ्रेंस
भी
नहीं
हो
रही
है।
बंद
है।
मार्च में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि मीडिया को निर्दश दें कि कोविड-19 के
मामले
में
सिर्फ
सरकारी
सूचना
प्रकाशित
करे।
मीडिया
को
लेकर
सरकार
ने
अपनी
सोच
जाहिर
कर
दी।
सुप्रीम
कोर्ट
ने
मना
कर
दिया।
अब
सरकार
ने
ही
प्रेस
कांफ्रेंस
बंद
कर
दी।8
दिन
हो
गए
हैं
प्रेस
के
सामने
आए।
10 मई
से
स्वास्थ्य
मंत्रालय
की
वेबसाइट
से
राज्यों
में
महामारी
का
ग्राफ
ही
लोगों
की
नज़र
से
हटा
लिया
गया।
दुनिया भर में कोविड-19 से
लड़ाई
में
प्रेस
कांफ्रेंस
का
अहम
रोल
है।
सूचनाओं
की
पारदर्शिता
ने
कमाल
का
असर
किया
है।
इसलिए
कोविड-19
को
लेकर
होने
वाली
प्रेस
कांफ्रेंस
में
प्रधानमंत्री, स्वास्थ्यमंत्री के अलावा देश के चोटी के वैज्ञानिक या स्वास्थ्य अधिकारी होते थे। उनकी बातों को गंभीरता से छापा जाता है। वे अक्सर अपने प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से अलग राय व्यक्त करते हैं। अमरीका में ट्रंप एंटनी फाउची की जिती आलोचना कर लें लेकिन फाउची भी ट्रंप की बातों को काट देते हैं। स्वीडन, न्यूजीलैंड, ताईवान जैसे कई देशों में प्रेस कांफ्रेंस में महामारी और संक्रमण के चोटी के विशेषज्ञ होते हैं।
भारत में हमेशा की तरह प्रश्न उठे कि प्रधानमंत्री मोदी क्यों नहीं प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं, लेकिन जवाब में लगता है कि नियमित प्रेस कांफ्रेंस ही बंद कर दी गई है। हमारी आपकी ज़िंदगी दांव पर है। किसी की नौकरी जा रही है तो किसी की जान। अगर सूचनाओं को लेकर यह रवैया है, इस तरह की लापरवाही और रहस्य को मंजूरी मिल रही है तो फिर जनता ने कुछ और तय कर लिया है।
आए दिन टेस्ट से लेकर सैंपल जांच के नियम बदलते रहते हैं. कहीं कोई चर्चा या बहस नहीं होती। आप प्रेस रिलीज़ को लेकर तो बहस नहीं कर सकते। यह बता रहा है कि सूचनाओं को लेकर दर्शकों और पाठकों की औकात कितनी रह गई है। सत्ता की नज़र में उनकी क्या साख रह गई है कि सरकार प्रेस रिलीज़ का टुकड़ा मुंह पर फेंक कर चल देती है।
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