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Monday, March 16, 2020

होरी का इतिहास


होरी का इतिहास
प्रचीन काल में जनजातियो ( मूलवासियो) का राज्य था| पंच खंड धरती के राजा को संभू शेक व राजा को रावल कहा जाता था| आज भी रावल राजा का प्रर्याय कहा जाता है व राव का अर्थ प्रजा होता है| उस समय गुरु को लिंगो कहा जाता था जो समाज को शुचारू रूप से चलने के लिए लिए शोध किया करते थे और नियम प्रतिपादित किया करते थे जो कलान्तर में रुढी कही गई और बाद में धर्म के रूप में प्रशिद्ध हुआ |
उस समय समस्त मूलवासी पूर्णिमा व अमौस्या को विशेष मानकर उत्सव मनाया करते थे| इसी कड़ी में फागुन मास पूर्णिमा को नया फसल तैयार होने व मौसम परिवर्तन के कारण खुशिया मानते थे|  भुनी हुयी नई फसल (अधपका) को गोंडी भाषा में होरहा कहते है| इसी होरहा भूनने व समूहिक उत्सव के दिन को ही होरी कहा जाता था जैसा कि कुछ क्षेत्रों  में आज भी होरी कहा  जाता है|  कालान्तर में इसे होली कहा जाने लगा | होली शब्द निरर्थक है जबकि होरी या होरहा भुने हुए कच्चे अनाज को कहते है|

इस उत्सव को संपन्न करने हेतु गाँव में 15 दिनो पूर्व तैयारी शुरू हो जाती थी गाँव के समस्त बच्चें पचगोइठी मागते थे जो भूमका द्वारा निश्चित किये गए स्थान पर एकत्र करते थे| गाँव के समस्त लोगो का योगदान अनिवार्य होता था |लोग धूम धाम से रात्रि में भुमका द्वारा पूजा पाठ कर एकत्र किये गए लकडिया,कन्डो को जला कर होरहा भुनाते थे और अगले दिन इस होरहा को प्रसाद के रूप में सभी को बांटने के बाद बचे इस होरहा को छत/ छप्पर पर रख देते थे जो चिड़ी-चिरंगो के लिए होता था और अपने जानवरों को नहला-धुला कर स्वच्छ करने के पश्चात एक दुसरे से मिलकर टीका लगते थे और मौसम के अनुरूप पकवान तैयार कर आनंद लेते थे| जैसे सोठ का गोझिया जो मौसम परिवर्तन के कारण होने वाले छोटी-मोटी बीमारियों में लाभ कारी होता था, और रात्रि में विशेष भोज का आयोजन होता था| इस तरह सभ्यता के विकास से एसा उत्सव मानाने की प्रथा चलता चला आया है | कालांतर में शिव-गवारा मध्य के शम्भूशेक की जोड़ी के समय आर्यों के राजा दक्ष ने पारवती माता को इसी आग के हवाले कर दिया था, तब से हमारे गोंड समाज के लोग होरी को शिमंगा भी कहने लगे, शिमंगा अर्थात शिव ओम गौरा ( शिव गवारा को ले जाओ )...............विस्तृत पारी कुपार लिंगो गोंडी पुनेम दर्शन पृष्ठ संख्या 233 पर ....
इसी कड़ी में प्राचीन काल में हरद्रोही के राजा हिरनकश्यप के बहन का सामुहित शोषण कर दुष्टों द्वारा होरी के अग्नि कुण्ड में डाल दिया गया| गोंडी रीती-रिवाज के अनुसार पूर्णिमा तिथि को विवाह के लिए उत्तम माना जाता है, इसीलिए राजा हिरनकश्यप ने अपने बहन का विवाह भी फागुन पूर्णिमा के दिन ही रखा था | हिरनकश्यप की बहन अपने भतीजे को बहुत प्यार करती थी, लेकिन उसका भतीजा गलत संगत में पड़ गया था, जिसके कारण उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया था | हिरनकश्यप की बहन ने सोच की मेरा भतीजा मेरी आग्रह पर मेरे विवाह में अवश्य उपस्थित रहेगा, इस हेतु वह अपने भतीजे को मनाने गाँव के बहर नशेड़ियो के बीच अपने भाई की बीना बताये ही चली गई, वहा प्रह्लाद नशे में धुत्त पड़ा था| प्रह्लाद के दुष्ट साथियो ने उसके बुआ के साथ सामूहिक बलात्कार किया और और अपने पाप को छिपाने के लिए होरी के अग्नि कुंद में डाल दिया और कालांतर में मनगढंत कहानी गढ़ कर प्रस्तुत कर दिया, जिसके कारण हमारा पवित्र होरी त्यौहार में अनेक बुराईया आ गई और लोग अपने प्राकृतिक फसलो के त्यौहार को भूल मनगढंत कहानियो में उलझ कर अप्राकृतिक रूप से यह त्यौहार मानाने लगे| आज भी होरी में समस्त सगा होरी से 15 दिन पूर्व भूमका द्वारा जगह निश्चित कर अग्नि कुंड का वयस्था करते है और पचगोइठी मागते है | होरी के दिन होरहा भुनाते है और देवता को चढाने के बाद स्वाम प्रसाद ग्रहण करते है अगले दिन होरी के सुबह अग्नि कुंड से राख ले कर मस्तक पर लगते है और दुश्मनों का नाश करने का प्रतिज्ञा करते हुए बीर-रस से ओत-प्रोत कोयाबीरा(कबीरा) गाते है जो माता गवरा व हिरनकश्यप के बहन के शहादत का प्रतीक है|  दिन में रंग-गुलाल लगते है और मौसम के अनुरूप विभिन्न पकवान बनाते है और एक दुसरे में बाटते है जो हमारे प्राचीन होरी-होरहा त्यौहार को याद दिलाता है और कुछ लोग अबीर लगा कर शांति का सन्देश देते है|

गोंडी वयस्था के अनुरूप होरी (शिमंगा) मानाने की विधि -           
होरी से 15 दिन पूर्व फागुन अमावश्या को भूमका को बुलाकर जगह निश्चित  कर एक फिट गहरा गड्ढा खोद कर उसमे कुछ पैसे, लोहे का चूर्ण, हल्दी,फूल, छिटका डाल कर ऊँचा खम्भा खड़ा किया जाना चाहिए  और गाँव के समस्त लोगो का अंश पचगोइठी रात मे बच्चो द्वारा भूमक के देख-रेख में एकत्र करना चाहिए और होरी ले लिए निश्चित जगह पर पहुच कर भूमका द्वारा अपने इतिहास, संस्कृति, भाषा, धर्म  पर व्याख्यान देना चाहिए| “शिव गवारा जोहार जोका उच्चारण करना चाहिए साथ ही साथ समस्त पुरखा को सेवासेवा बोलते हुए दाये से बाये परिक्रमा लगाते हुए अपने घर को वापस आ जाना चाहिए और अंतिम दिन अर्थात् फागुन पूर्णिमा को भूमक के देख-रेख में गाँव समस्त लोगो की उपस्थिति में अग्नि प्रज्वलन कर समस्त सगा जानो को होरहा भुन कर व घर से लाये गए बुकवा(मैल) को उसमे डाल कर फड़ापेन  से प्रार्थना करें कि प्रत्येक वर्ष हमारे फसलो में वृद्धि करें और समस्त रोग-दोख को नष्ट कर हमारे समाज को सुखमय जीवन दें, और घर को लौटने के पूर्व पांच परिक्रमा दाये से बाये लगाना चाहिए और सुबह जाकर कंडे का राख ले कर एसा प्रतिज्ञा करें कि भविष्य में माता गवरा व राजा हिरन कश्यप की बहन की घटना दोबारा न दोहराने पाए और दिन में पलाश फूलो से तैयार प्राकृतिक रंगों से ही होरी खेले और विभिविन्न पकवानों को बनाकर देवों को चढ़ाये व स्वम परिवार सहित ग्रहण करें सायं काल में मित्र-मंडली को भोज दें और आपसी द्वेष भूलकर सौहार्दपूर्ण जीवन जीने के राह पर अग्रसर हो |
होरी की गाढ़ा-गाढ़ा बधाई wish you very very happy HORI.
जय सेवा
अजर अमर गोंडी संस्कृति
शोध एवं संकलन
जयगाँधी धुर्वा उर्फ़ अम्बेडकर धुर्वा

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