महाशिवरात्रि के रहस्य को जानें ? - jagoindia Sarkari Yojana : नई सरकारी योजना 2025

Breaking

more info click below

Thursday, February 27, 2020

महाशिवरात्रि के रहस्य को जानें ?


महाशिवरात्रि  के रहस्य को जानें  ?
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
1) -क्या कारण हे कि ब्राह्मणी ग्रन्थों में और चित्रकारों की चित्रकारी में भगवान् शिव का रंग काला, उसके रहने का ठिकाना श्मशान घाट और गहनों के रूप में गले में सांप लटकते दिखाए जाते रहे हे, जबकि ब्रह्मा व् विष्णु के रंग गोरे निवास के लिए भव्य भवन और हीरे मोती से जडित स्वर्ण आभूषण, ऐसा क्यों ?

2) -क्या कारण है की शिव की पूजा लिंग के रूप में की जाती है ?

3) -क्या कारण है की 'शिव' को "वैश्यानाथ","केदारनाथ(कीचड़ के देवता)","भूतनाथ",भोलेनाथ" आदि-आदि अपमानित नामों की संज्ञा दी गयी है ?

4) -क्या कारण है की पुराण-कथाओं में असुरों और राक्षसों द्वारा केवल शिव की पूजा का ही वर्णन मिलता हैं,अन्य देवी-देवताओं का नहीं ?

5) -क्या कारण है की शिव से चले 'शैव' और वैष्णव से चले 'वैष्णव-सम्प्रदाय' में बहुत अंतर है ?

6) -क्या कारण है की 'शैवपंथ' का अनुसरण करने वाले जोगी/योगी (योगीराज), जो योगाभ्यास में विश्वास रखते हैं, जबकि वैष्णव-पंथी कर्म-कांडों और मूर्ति-पूजा में ?

7) -हम पढ़ते आये है की "सत्यम-शिवम्-सुन्दरम्" अर्थात सत्य ही शिव है और शिव ही सत्य है |
साथ ही 'शिव' को संहारक देव क्यों माना गया है ?

8) -पुराण-कथाओं में प्रायः देवताओं के किसी संकट के निवारण हेतु अन्य देवगण (विष्णुओं) स्वयं शिव के पास जाते हैं; जबकि शिव कभी 'विष्णु' और 'ब्रह्मा' के पास नहीं जाते है, क्यों ?

9) - आदिवासी और हिन्दू धर्म में पिछड़ेवर्ग के लोग अधिकांशतः 'शिवोपासना' ही क्यों करते है ?
इन प्रश्नों से ऐसा लगता है की :-

10) कही 'शिव' 'अनार्य' वर्ग के महापुरुष/शासक तो नही ?

11) काफी समय पहिले हमारे (मूलनिवासियों) के गौरवशाली इतिहास पर 'एक शोध ग्रन्थ 'भाई सतनामजी' द्वारा लिखित में यह दर्शाया गया हे कि शिव का नंदी और कोई नही, बल्कि यह वही चमर पशु (याक) हे जो हिमालय के उपरी हिस्से में पाया जाता हे जो खेती के लिए, बोझा ढोने, पहाड़ों पर यात्रा और इनके बालों के लिए उपयोग में लिया जाता हे, इतना ही नही इसके पूंछ के बाल ही चंवर ढूलाने के काम में लिया जाता हे | इसी को ब्राह्मणी साहित्य कारों ने कारिस्तानी पूर्वक नंदी के रूप में प्रचारित कर दिया वरना चमर पशु का सीधा संबध चमारद्वीप की संस्कृति से हे और हिमालय के उपरी हिस्से पर आज भी पाया जानेवाला यह पशु वाहन के दलितों, आदिवासिओं और पिछड़े-समुदायों की आजीविका का मूलसाधन हे |
                     इस प्रकार निश्चयात्मक ढंग से इस बात को बल मिलता है की 'शिव' अनार्यों के आदि-शासक हैं | निसंदेह यह भी तय हे कि 'अनार्य' संस्कृति की नीव पर ही 'ब्राह्मणी' संस्कृति का महल खड़ा हे |

12) 'अन्य सण पर्व व देवी-देवताओं के मिथकों की तरह राजा 'शंकर' के बारे में भी गहरा व ऐतिहासिक रहस्य छुपा हुआ है |
कुटिल आर्यों (ब्राम्हणों) के गलत प्रचार के कारण भारतीय मूलनिवासी अपने पुरखों का संघर्ष,रक्षक, महापुरुष एवं संस्कृति भुलाकर आर्यों के जाल और षड्यंत्र में फंस गया |
'महा'....'शिव'..... 'रात्री'|

13) -"महा" यानि 'बड़ा, विशाल.' |

         "शिव" यानि (अच्छा,सुन्दर राज्य करने वाला शंकर ही शिव)
'शंकर'....रात्री यानि दिन के बाद अंधकार समय काली रात |
'शंकर' राजा कृषिप्रधान भारतीय संस्कृति का प्रजाहितकारी राजा (शंकर) था. उसे तीसरी आँख,चार हाथ नहीं थे.वे प्रायः ध्यानस्थ एक जगह बैठते थे, जैसा की बौद्ध-धम्म के 'गौतम-बुद्ध' की ध्यानावस्थित मुद्रा है |
                   घुसपेठी आर्य (ब्राहमण) जम्बूद्वीप भारत में आकर अपना वैदिक षड्यंत्र फ़ैलाने का लगातार प्रयास करते थे | यह जानकारी प्रशासन के गुप्तचर विभाग द्वारा शंकर राजा को हर वक्त मिलती थी.इसी कारण आर्यों को धर पकड़ कर उनके गलत कार्य पर दंडित किया जाता था .एक बार शंकरौर विष्णु आर्य ब्राम्हण के बीच आमने-सामने लड़ाई हो गई थी, तब विष्णु खून से लतपथ होकर हारकर भाग गया था |
'शंकर' राजा की बलाढ्य शक्ति का उसे पता लग गया था |
'शंकर-राजा' का राजपाट चलाने में देखरेख में रानी 'गिरिजा' का बहुत बड़ा सक्रीय योगदान था |
                    जब गिरिजा नहीं रही तो अचानक युवा अवस्था में यह दुखित घटना होने के कारण शंकर राजा कुछ खास दिन एकांतवास में वैराग्यपूर्ण अवस्था में रहने लगे |
                     राजा के व्यक्तिगत जीवन पर नजर रखकर मौकापरस्ती आर्यों ने दक्ष नाम के 'आर्य-ब्राहमण' की लड़की 'पार्वती' को प्रशिक्षण देकर, 'शंकर' की हर बात की जानकारी देकर षड़यंत्र पूर्वक शंकर के करीब पहुंचा दिया गया |
इस प्रकार 'राजा शंकर' की दूसरी पत्नी बनने का अवसर आर्यपुत्री 'पार्वती' को मिला, जिस हेतु जो नियोजन आर्यों ने तैयार किया था, उनको अब शत-प्रतिशत कामयाबी मिलने वाली थी | आर्यों ने ही भारत में पावरफुल नशा का स्त्रोत 'सूरा' प्रथमतः लाया | पार्वती ने अपने साथ 'शंकर' राजा को भी नशीला बनाया; जिस रात 'चौरागढ़' पर पूर्व नियोजन के अनुसार शंकर राजा की हत्या की गयी |
                              इस दिन को यादगार के तौर पर राजाप्रिय प्रजा हजारो के तादाद में शंकर राजा का जीवन समंध बातो का उल्लेख करते हुये गीत गायन करते हुये, बिना चप्पल हाथ में एक शस्त्र (त्रिशूल) लेकर 'चौरागढ' पर इक्कठा होते थे; यही परंपरा आगे चलती रही |

14) एक गीत ऐसा भी ...

                   "एक नामक कवड़ा 'गिरिजा-शंकर' हर बोला हर हर महादेव |" त्रिशूल नहीं वो त्रिशुट है.....अर्थात क्रूर आर्य क्रूर हुन हुन क्रूर शक इनको निशाना बनाकर सदैव रहना |

15) शंकर-महादेव, बड़ादेव,भोला शंकर कैसा ???
-सारे भारत में आर्यों (ब्राम्हण) का वर्चस्व प्रस्थापित होने के बाद आर्य ब्राम्हणों ने अपना उक्त घटना और इनके नायक का ब्राहमणीकरण कर व्यक्ति मात्र में इन्हें देव-देवी संबोधित कर जनमानस में मान्यताकृत कर दिया | भारतीय लोग अब 'शंकर-राजा' का ऐतिहासिक गुणगान करने लगे थे |
मगर इस बात से आर्यों का भंडाफोड़ बार बार होता था |
इस डर के कारण मझबूरन अपने स्वार्थ के लिए शंकर राजा के आर्य ब्राहमण इंद्र, ब्रह्मा, और विष्णु के साथ 'महेश' (शंकर,बद्यादेव, महादेव) का भी संबोधन जोड़ देते हैं |
यह इतिहास ई.पूर्व से प्राचीन भाग है |

16) क्या शंकर राजा की अन्य विकृति थी ?
-शंकर राजा को तीसरी आँख नहीं थी, बल्कि वे तर्कशास्त्र व 'योग' के ज्ञाता थे |
                   इस कारण उसी के ज़माने से भारत में पहाड़ियों पर भी कृषि होती थी .पानी रोक कर सालभर इस्तेमाल होता था. यही भाग शंकर राजा के मुंडी में गंगा की धार बताई गयी | उनके कोई चार हाथ नहीं थे, वो कोई भी नशा नहीं करते थे बल्कि वे 'असुर' अर्थात- अ+सुर = सोमरस, दारू, सूरा न पीने वाले बल्कि दूध व शाकाहारी भोजन करने वाले थे |
'शंकर-राजा' शरीर से एकदम बलाढ्य, ऊँचा, भरा-पूरा, प्रभावी, व आकर्षक व्यक्ति मतवाला राजा था | (शंकर राजा के अन्य प्रचलित नाम :- कैलाशपति, नीलकंठ,शिव,भोला,जटाधारी आदि-आदि |

17) विष :-(विष-कन्या 'पार्वती' की काली करतुत) :-
आज वर्तमान में एक फोटो प्रचलित है, जिसमे शंकर राजा जमीन पर मरे पड़े हैं और उसके ऊपर एक चार हाथ वाली स्त्री खड़ीं हैं | इसी चित्र में गहरा रहस्य छुपा हुआ है | विदेशी आर्य ब्राहमण बनाम मूलनिवासी वीर रक्षक संघर्ष का लेखा-जोखा :- प्राचीन ग्रंथ शिव महापुराण,विष्णु महापुराण, मार्कंडेयपुराण, मत्स्य पुराण, आदि में 'काली' के संदर्भ मिलते हैं |
                       सत्यशोधक संशोधन रिसर्च करने पर सच्चाई इस प्रकार सामने आती हैं | आर्यों ब्राम्हणों के प्रमुख बदमाशों की बदमाशी रचित हत्याकांडो की असलियत छुपाने कई बार हर ग्रंथो में कपोकल्पित कहानियां नए-नए पात्र जोड़कर आर्यों ने खुद को देव-देवी का स्थान देकर इतिहास का विकृतीकरण, ब्राह्मणीकरण किया है |

18) दक्ष आर्य ब्राहमण की प्रशिक्षित बेटी पार्वती की काली करतूत :-
             शंकर राजा की हत्या छुपाने झूठी कहावत प्रचलन में लाई गई जो इस प्रकार है :-
'एक बार राक्षस के रूप में राजा शंकर आया और वो देव लोगों का नरसंहार करने लगा तब स्वर्ग लोक से काली देवी प्रगट हुई और उसने शंकर राक्षस (रक्षक) की और साथियों की हत्या कर दी ,उनके हाथ और मुंडी काटकर अपने बदन पर लटका दिये | इस प्रकार की कहानी प्रचारित कर आर्यों-ब्राहमणों ने एक ऐतिहासिक विकृति पैदा की है |
              जबकि इसमें सच्चाई यह है, की शंकर राजा की 'स्वजातीय' (नागगोड) पत्नी 'गिरिजा' के मरने के बाद आर्य ब्राहमणों ने दक्ष आर्य की बेटी राजा शंकर के पीछे लगा दी | जिस उद्देश के लिए 'पार्वती' शंकर के जीवन में आई वह उद्देश जिस काली रात को पूर्ण हुआ वह "महाशिवरात्री" के रूप में प्रचलित हुई |
                  आर्य 'ब्राहमण' पुत्री पार्वती ने न्यायप्रिय कृषिप्रधान गणराज्य का शंकर राजा के साथ काली करतूत की वो ही प्रसंग छुपाने मूलनिवासियों को हजारो साल सच्चाई से दूर रखने के लिए और एक देवी चार हाथ वाली काली देवी प्रचलन में लाई गयी |
                    विदेशी आर्य ब्राहमणों की टीम और आर्य-पुत्री 'पार्वती' का रचित षड्यंत्र, शंकर राजा का हत्याकांड पर पर्दा डालने के लिए यह सब किया गया | जिस काली रात को पार्वती ने शंकर राजा की हत्या करने के लिए काली करतूत की वो ही दिन 'महाशिवरात्री' के रूप में प्रचलित हुआ | इस घटना को लक्ष्य बनाकर आर्य ब्राहमणों ने 'काली' शब्द पकड़कर रखा | मगर यह एक गहरा रहस्य अब हमें गहराई से समझना होगा |

19) रानी गिरिजा का आर्य विरुद्ध संग्राम :-

          -'नाग-गोड़ी' संस्कृति का राजा 'शंकर' इनकी पत्नी रानी गिरिजा थी, जिन्हें 'काली' माता ऐसा भी नाम प्रचलित किया है | रानी गिरिजा भी महायुद्ध करने निकली और विदेशी आर्यों का नाश किया |
            रानी की यह वीरता 'मूलनिवासियों' द्वारा सावधानी और अभिमानपूर्वक अपनी संस्कृति द्वारा जपा हुआ है | काली गिरिजा के चित्र और मूर्ति आज भी देखने को मिलती है. रानी गिरिजा के गले में शेंडिधारी विदेशी आर्यों के सरो(धड़) की मालायें (हार) और कंबर में विदेशी आर्यों की उंगलियां और हाथ सजाये हुये दिखती हैं |

20) गिरिजा का खून :-

          -शंकर के विंनती से गिरिजा(काली) ने युद्ध बंद किया. विदेशी आर्यों ने युद्ध बंदी (करार) के बहाने दिखावा करके नियोजनबद्ध षड्यंत्र रचा | आर्यकन्या पार्वती का विवाह शंकर के साथ रचाया गया. आर्य कन्या पार्वती ने शंकर की मर्जी संपादन करके रानी गिरिजा को अकेले गिराया |
आर्यों ने शंकर-गिरिजा को पति-पत्नी का गैरसम्बन्ध करके विकृत बीज 'पार्वती' के माध्यम से बोने की शुरुआत की ताकि आर्यों के षड़यंत्र शंकर पहचान नहीं सके | इसीलिए ब्राहमण आर्यों ने मूलनिवासी 'शंकर' को "भोला-शंकर" नाम दिया |

21) शंकर का खून अर्थात "महाशिवरात्रि"

      पुराण में समुद्र मंथन की एक कहानी प्रसिद्ध है जिसके अंतर्गत देव-दानवों अर्थात मूलनिवासी v/s आर्यो (सूर-असुरों) ने मिलकर समुद्र मंथन किया, तब 'मन्दार' पर्वत को मथने का आधार बनाया और घुसने के लिए 'शेषनाग' (प्राचीन नागवंशी रूपी) की रस्सी का उपयोग किया |
            इस कारण पृथ्वी हिलने लगी. इससे पृथ्वी पर मानव भयभीत हुये और लोगों को लगने लगा की अब
पृथ्वी का प्रलय निश्चित होगा,तब पृथ्वी को बचाने के लिए विष्णु ने कुर्मावतार (कश्यप) यानि (कछुवा) धारण करके पृथ्वी अपने पीठ पर उठाई.समुद्र मंथन चालू रहने पर उस समुद्र मंथन से 14रत्न बाहर निकले. उन रत्नों में से एक रत्न जहर (विष) भी था | पुराणानुसार इस 'विष' के कारण पृथ्वी का नाश निश्चित था | पृथ्वी को बचाने के लिए वह विष (जहर) पीना आवश्यक था; अतः जहर पीने के लिए कोई 'आर्य-देव' सामने नहीं आया, तब 'शिव-शंकर' ने वह विष ग्रहण करके पृथ्वी को बचाया; ऐसी कहानी प्रचलित है |

22) मूलनिवासियों को यह सत्यता पता नहीं चले इसीलिए ब्राह्मणों ने ऐसी गैरसमझ पैदा करके वास्तविकता को बगल देने का प्रयत्न करते, लेकिन 'शंकर' की विष प्राशन की सत्यता को नकारते आये नहीं.विष्णु ब्राहमण आर्य ने 'शंकर' को गुप्तता से पार्वती के माध्यम से 'विष' दिया होगा या 'शंकर' को विष प्रशन करने की सक्ती की होगी. इन दोनों घटना में से कुछ भी हो, लेकिन इतना मात्र निश्चित है की 'शिवशंकर' का विष प्रयोग द्वारा आर्य ने खून किया और उसकी सिहासत अपने गले में घुसा के मूलनिवासी बहुजनों को गुलाम (दास) बनाया | शंकर का नीला शरीर भी जहर के कारण हुआ है, यह सत्य है | यह सत्यता मूलनिवासियों के ध्यान में आने न पाये इसीलिए शंकर को ही 'नीलकंठ' बोला गया और प्रजा में ऐसी पह्लियों को जोड़कर की साक्षात् तुम्हारा शिवशंकर नीला शरीर धारण करके देव (भगवान) बना |

23) राजा शंकर का मृतदेह देखने के लिए मूलनिवासियों ने 'पचमढ़ी' में गर्दी की. भूख-प्यास भूलकर शिवजी के शोक दुःख में डूब गए | शंकर के दुःख में मूलनिवासियों ने गीत-गान गाये जो आज भी गावं-देहातो में गाये जाते हैं |
उस समय के महाशिवरात्रि के दिन से शंकरजी के स्मृति में भीड़ इक्कठा होती है इस दिन अन्न सेवन न करके उपवास करते हैं |
शिवशंकर के गीत गाते-काव्यात्मक शैली के माध्यम से मूलनिवासी शंकर की याद में, शंकर की जीवनी गानों से जीवित रखी है.

24) हमारे महापुरुष शंकर का मृत्यु दिन और विदेशी आर्यों ब्राम्हणों का विजय दिन महाशिवरात्रि के रूप में आज भी मूलनिवासी त्यौहार मन रहे हैं.अपनी कपट निति ध्यान में न आने पाये इसीलिए शंकर को देव बना के प्रजा को पूजने लगाया. शंकरजी की महानता बढ़ाने के लिए ब्राहमण संपूर्ण विश्व की निर्मिती करता है | 'विष्णु' को विश्व का पालन पोषण करता और 'शंकर' यह सृष्टि का देखभाल करता यह
झूठी कहानी मनुवादियों (ब्राम्हणों) ने निर्माण करके और 'शंकरजी' को 'श्मशान-भूमि' में बसाया है, यह देखने को आज भी मिलता है |

25) मूलनिवासी महाशिवरात्रि :

- सत्ता और धर्म सत्ता की बात को छोड़ कर यदि भारत के लोग मानस की बात की जाये तो वह हमेशा लोकसत्ता का हामी रहा है.इस लोक सत्ता के जबरदस्त प्रमाण के रूपों में और अनेक नामों से लोग पूजते रहें हैं.ये दो महापुरुष है- शिव और कृष्ण. ये दोनों भी अनार्य(ब्राम्हण नहीं) है | ये कोई देवता एवं अवतार नहीं | इन्हें ब्राहमणी कलम ने देवता और अवतार बना कर लोगों के सामने रख दिया है और इन्हें पूजा का उपदान बना दिया गया है | अभी फरवरी २००७ में कोटा के 'थेगडा' स्थित 'शिवपुरी' धाम में 525 शिवलिंग स्थापित करके लोगों को पूजा-पाठ के ढकोसलों में और इजाफा कर दिया गया है.यह अंध प्रचार दिन रात जारी है |

26) यहाँ हम केवल शिव की चर्चा करेंगे.आज 'शिव' की पूजा के नाम पर जो वाणिज्य-व्यापार शुरू कर दिया गया है,उस घटनाओं में शिव का वास्तविक व्यक्तित्व दफ़न हो गया है | यह 'शिव' के शत्रु पक्ष अर्थात आर्य ब्राम्हण लोगों की साजिश है की वे पूजा के उपदान बना दिए गए और मूलनिवासियों के परिवर्तन,क्रांति की प्रेरणा नहीं बन पाये.भारत के मूलनिवासियों को शिव ऐतिहासिक व्यक्तित्व और चरित्र का गहराई से अध्ययन करना चाहिए और उनके ब्राम्हण विरोधी परिवर्तनवादी क्रिया कलापों को बहुजन समाज के सामने रखकर उन पर चलने को प्रेरित करना चाहिए |

27) "शिव" का शाब्दिक अर्थ होता है- 'कल्याणकारी'

'शिव' को उनके शत्रुओं अर्थात-आर्य ब्राम्हणों ने पहले रूद्र कहा, फिर 'महादेव' और शिव आदि के नाम रख दिए गयें | उन्हें ईश्वर बना दिया गया और 'पिपलेश्वर, गौतमेश्वर, महाकालेश्वर, जैसे हजारों नाम रख दिए | जहाँ शिवलिंग या शिव मंदिर की स्थापना की,वाहन के प्राकृतिक स्थानों,नदी-नालों, पेड़ों, पहाड़ियों आदि के नाम पर शिव का नामकरण करके वहाँ के मूलनिवासियों को पूजा-पाठ में लगा दिया.

28) 'शिव' यज्ञ विरोधी हैं,राज्य-साम्राज्य को नहीं मानते, बल्कि वे "गण" व्यवस्था को मानते हैं | वे व्यक्ति हैं,विचारवान व्यक्ति हैं, विवेकशील व्यक्ति हैं.नायक हैं,उनकी सत्ता लोकसत्ता है.उन्होंने अपनी सत्ता,अपने गणों के साथ दक्ष (ब्राम्हण/पार्वती का पिता) की यज्ञ संस्कृति को ध्वस्त किया. यज्ञ संस्कृति के लोग जीते जी उन्हें अपने पक्ष में नहीं कर सके ,किन्तु उनकी मृत्यु के बाद उन्हें देवता और भगवान बना कर उनका उपयोग करने में वे सफल हुये.यह प्रयास शास्त्रकारों का रहा.
इसके विपरीत शिव लोक में,जन में ,मनुष्य के रूप में विद्यमान है.हिमालय की ऊँचाईयों पर रहने वाले भाट लोग 'शेषनाग' और 'शिव' की पूजा करते हैं. वे ऐसा इसीलिए करते हैं क्यों की 'शिव' उनके पूर्वज हैं .कैलाश पर्वत शिव का घर है.शिव की पत्नी, गौरी, गिरिजा, पार्वती हैं. दक्षिणी राजस्थान की अरावली पर्वत श्रेणियों में रहने वाले आदिवासी गमेती,भील,मीणा,भादवा महीने में सवा महीने तक एक लोक
नाट्य का मंचन करते हैं .इसका नाम हैं "गवरी" गवरी में राई और बुडिया नामक पात्र पार्वती और शिव का स्वांग भरते हैं. हजारो सालों से ये परंपरा चली आ रही है.लोक नाट्य की इस मंचन परंपरा को "गवरी रमना" कहते हैं |

29) "रमना" का अर्थ है "रमण करना".

'शिव' कोई चमत्कारिक और दैवीय पुरुष नहीं वरन मूलनिवासियों की संस्कृति की रक्षा के प्रतीक हैं. वे 'यज्ञ-विध्वंसक' है | यज्ञ करना ब्राम्हणों की संस्कृति है, जिसमे गायों की,अश्वों की बलि दी जाती थी और उन्हें ब्राम्हण खाते थे | 'गौ-मेध' यज्ञ और 'अश्व-मेध' यज्ञ ही क्यों, ये आर्य ब्राम्हण तो 'नरमेध' यज्ञ भी करते थे जिसमे 'नर' की बलियां भी देते थे |
मूलनिवासी तो पशु-प्रेमी, पशुपालक, कृषि कार्य से अपना जीवन यापन करने वाले थे; इसीलिए वे यज्ञ के नाम पर 'पशुओं' को काट कर खाने वालो का विरोध करते थे | 'शिव' भी 'कृष्ण' की तरह विदेशी लुटेरें

30) आर्यों का नाश करने वाले थे | 'शिव' और 'कृष्ण' को सेतु बनाकर चालक आर्य ब्राम्हणों ने भारतीय जन मानस में घुसबैठ बनायीं. कृष्ण और शिव मुलिवासियों के नायक थे. इनको ब्राम्हणी वर्ण व्यवस्था शुद्र
और अतिशूद्र मानती है.ये बहुजन नायक हैं. इन्हें ब्राहमणी व्यवस्था में लेने के लिए ब्राहमणों ने इनकी पूजा शुरू की |
अतः समझदार मूलनिवासी बहुजन अपनी महाशिवरात्रि आने ही तरीके से मानते हैं.वे शिवलिंग और
शिवमूर्ति की पूजा उपासना नहीं करके उनके द्वारा किये गए विध्वंस जैसे क्रिया कलापों का गहन अध्ययन करके उसके प्रचार-प्रसार का कम करते हैं |
शिव का रंग रूप भी तो 'ब्रह्मा' और ब्राम्हणों से मेल नहीं खाता है. वह 'श्याम-वर्णी' है और उनकी वेशभूषा आदिवासियों जैसी हैं.उनका ब्रम्हा और 'विष्णु' के साथ जोड़ है,'लेकिन वे तीसरे दर्जे पर है |
उनकी भूमिका 'ब्रह्मा-विष्णु' की तरह स्पष्ट नहीं है.वह शक्तिमान भी है और त्रिशूल को अपने हथियार के रूप में धारण करते हैं, परन्तु वे 'ब्रह्मा-विष्णु' के सहायक की भूमिका निभाते हैं, यह केवल ब्राहमणों की चाल है |
शिव नृत्य के प्रेमी है |
पार्वती 'शिव' की पत्नी है .उन्हें 'गौरी' भी कहा जाता है | सरस्वती और लक्ष्मी की तरह उनकी कोई स्पष्ट भूमिका नहीं है. वह शिव की अनेक गतिविधियों में उनके साथ रहती है. लक्ष्मी और सरस्वती के विपरीत 'पार्वती' शिव के अनेक कार्यों पर सवाल खड़े करती हैं | वह कुछ ऐसी भूमिकाएं अदा करती हैं जो पूरी तरह से हिन्दुवाद के दायरे में नहीं आती हैं. शायद यह जोड़ी 'आदिवासी' मूल की जोड़ी है |

31) शिव-पार्वती की जोड़ी के निर्माण का उद्देश :-
'आदिवासियों' (आदिकाल से रहने वाले मूलनिवासी भारतवासी) को धीरे-धीरे पूरी तरह से ब्राम्हणवादी सभ्य समाज के दायरे में खिंचा जा रहा था.लेकिन उनकी आबादी समस्यात्मक और अनियंत्रणीय थी | वे ब्रह्मा और विष्णु के साथ खुद को जोड़ नहीं पा रहे थे, क्योंकी 'ब्रह्मा' और 'विष्णु' दिखने में उनसे भिन्न लगते थे. आदिवासियों में समर्थन का आधार बना पाने में ये देवता पर्याप्त नहीं थे, इसीलिए ब्राम्हणों ने शिव और पार्वती के रूपों की रचना की |
ये दोनों देखने में आदिवासी लगते थे लेकिन वे हर बात में ब्राम्हणवाद के प्रभुत्व को स्वीकार करते थे. इसीलिए यह तथ्य है की 'शिव' और 'पार्वती' के चरित्र आदिवासियों के बीच समर्थन हासिल करने का माध्यम बन गये की 'शिव' ब्राहमणवाद का प्रचार करते हैं, वह हिंसा के जरिये लोगों को ब्राम्हणों के प्राधिकार को मानने के लिए मजबूर करते हैं |
'आदिवासियों' को दबाने में इन दो चरित्रों का बखूबी इस्तेमाल किया गया है | यह ब्राहमणवादी सिद्धांत और सहयोजन के व्यवहार का एक हिस्सा है | 'शिव' के "आत्मसातीकरण" ने ब्राहमणों के सामने अपनी ही तरह की दिक्कतें पेश कीं. एक लम्बे समय की अवधि में 'आदिवासियों' को, खासतौर पर दक्षिण भारत के आदिवासियों को हिंदू ब्राहमणोंवादी व्यवस्था में आने के लिए बाध्य किया गया था, लेकिन आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों ने 'हिन्दुवाद' में एक रगड़ पैदा की |
'विष्णु' से 'शिव' का पंथ तुलनात्मक रूप से ज्यादा उदार था. इस आधार पर उन्होंने 'हिन्दुवाद' में अपने लिए स्वायत्तता पर जोर दिया.वैष्णव मत धीरे-धीरे कट्टरतावादी ब्राम्हणवाद बनता जा रहा था, जबकि 'शैवमत' हिन्दुवाद का उदार संप्रदाय था | वासव के वीर शिव आंदोलन के उभार के साथ ही 'शैवमत' ने हिंदू ब्राम्हण वाद को भी चुनौती देना शुरू कर दिया, लेकिन राष्ट्रवादी अवधि के दौरान हिंदुत्व संप्रदाय ने एक अखंड हिंदुत्व की अवधारणा प्रदर्शित करके व्यवस्थित ढंग से इन अंतरविरोधो को सुलझाने की कोशिश की |
आज यह देखने में आता है 'शैववादी' हिंदुत्व, वैष्णवी 'हिंदू-ब्राहमणवाद' के समान ही दलित बहुजन विरोधी है | 80 और 90 के दशक में लड़ाकू 'हिंदुत्व' का पुनरुत्थान हुआ.उसने इन पंथों-पांतो को हमेशा के लिए बंद कर दिया | उसने अपने आपको अखंड राजनितिक शक्ति (हालांकि 'शिवसेना' के हिंदुत्व और भाजपा के 'हिंदुत्व' के बीच जो दरारे हैं वो शैव मत और वैष्णव मत के बीच की दरारों की अभिव्यक्तियाँ हैं, फिर भी वे वोट पाने के लिए राम के चरित्र का इस्तेमाल करने में एक है) के रूप में पेश किया | भविष्य में अगर पढ़े-लिखे दलित बहुजन हिंदुत्व के खिलाफ कोई आधुनिक चुनौतियाँ पेश करते हैं, तो ऐसे में 'वैष्णव-मतवादी' हिंदुत्व शक्तियों और 'शैवमतवादी' हिंदुत्व की शक्तियों के बीच एक होना निश्चित है | ये बहुजनों में सहमती बनाने और उनके खिलाफ ताकत का इस्तेमाल करने के दोनों कामों में एकजुट हो जायेंगे |

32) अब तक ब्राहमणवाद 'बहुदेववादी' त्रिमुर्तियों की रचना कर चूका है .वह देवरूप में चरित्रों के सहयोजन करने की कला में और इन चरित्रों के खाकों से जनसमूह को बाहर रखने में महारथ हासिल कर चूका है .इस तरह से व्यापक जनसमुदाय के दमन और शोषण के असली उद्देश को काफी हद्द तक पूरा किया जा चूका है

No comments:

Post a Comment

you have any dauts, Please info me know