इंसान को रोबोट बनाने की तकनीक
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भारत में जो लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं, उनमें से कोई 40 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनके पास 'स्मार्ट फोन' हैं। बाजार का सर्वेक्षण करने वाली एक एजेंसी के मुताबिक भारत में स्मार्ट फोन की खपत विश्व-बाजार की कुल संख्या का कोई साढ़े बारह फीसदी है। मोटे तौर पर जब दुनिया के 10 आदमी मोबाइल पर अपना माथा फोड़ते होते हैं तो उसमें से 1 भारतीय होता है। उसके पास हर वक्त एक अदद 'स्मार्ट फोन' नामक अलादीन का चिराग होता है, जिसे वह दिन भर अपनी उंगलियों से घिसता रहता है। जिन्न बाहर आता भी है। ये बात जुदा है कि वह मालिक का गुलाम नहीं है। मालिक अब उसका गुलाम हो चुका है। टीवी के बक्से को हम 'इडियट बॉक्स' कहते थे, उसने हमें जी भर कर इडियट बनाया। यह स्मार्ट है तो इसने गुलाम ही कर दिया।
आज मप्र इप्टा के 9 वें छतरपुर सम्मेलन में 'जन संवाद की शैली' पर मीडिया से जुड़े रंगकर्मी सचिन श्रीवास्तव ने इस प्रक्रिया को मनुष्य का रोबोटिक परिवर्तन बताया। तकनीक का इस्तेमाल करते-करते इंसान तकनीक द्वारा इस्तेमाल होने लगता है। इसके बगैर उसे चैन नहीं पड़ता। जी अटका रहता है। हाजमा बिगड़ जाता है। छटपटाहट होती है। रेलगड़ियों में कभी-कभी चार्जिंग पॉइंट को लेकर युद्ध जैसी स्थिति निर्मित हो जाती है। अभी पिछली बार पटना गया था तो दानापुर स्टेशन में एक लंबी लाइन दिखी। मुझे लगा पानी की होगी। चार्जिंग पॉइंट की थी। यह तकनीक की गुलामी है। अभी प्रारम्भिक अवस्था है तो इंसान का अर्द्ध-रोबोटिकरण हुआ है। आगे चलकर पूरा हो जाएगा। ये ब्रांडेड रोबोट होंगे। खरा माल।
तो अर्द्ध-रोबोट जो सम्वाद कर रहे हैं, उसमें उनकी सोच बहुत थोड़ी है। ज्यादातर मालिक की भाषा बोलते हैं। मालिक के हित में उन्हें अपना हित दिखता है, जबकि उनकी उपयोगिता उनके हाथ में रखे मोबाइल जितनी ही है। नया वर्जन बाजार में आते ही उसे भी उस पुराने यन्त्र की तरह उठाकर कूड़ेदान में फेंक दिया जाएगा।
जन-सम्वाद के और भी तरीके हैं। अब ज्यादातर सम्वाद मोबाइल पर हो रहा है। सूचनाएँ इतनी हैं कि सूचनाओं का पहाड़ है। इसके बोझ तले संवेदनाएं मर गयी हैं। संवेदनहीनता एक मनुष्य के लिए रोग की तरह है। रोग भयानक हो तो विक्षिप्तता की नौबत आती है। इसमें रोगी गाली-गलौज करने लगता है। इस अवस्था में उसके रोबोटिकरण की प्रक्रिया लगभग पूर्ण हो जाती है। आप अगर अपने मोबाइल पर दो घण्टे से ज्यादा समय बिताते हैं तो यह रोग की शुरआत है। अपने सेहत का ध्यान रखें। फेसबुक की ज्यादा खुराक से बदहजमी हो सकती है। व्हाट्स एप का उपयोग सिर्फ निजी संदेशों के लिए करें। कम बोलना भी शरीर के लिए फायदेमंद होता है। कंजूस आदमी के टेलीग्राम की तरह जितना जरूरी हो और जिससे सन्देश पहुँच जाए, उतनी ही मैसेजिंग करें।
बाकी जो बातें हैं उनसे की जानी है, जो मोबाइल की चपेट में नहीं आए हैं। कोई 80 करोड़ लोग हैं। असल संवाद इन्हीं के साथ किया जाना है।
इसलिए अब मैं हवा (सोसल मीडिया) में बने संबंधों और संगठनों के ऊपर ज्यादा भरोसा नहीं करता हूं.........
जय जोहार,
जय मूलनिवासी,
जय जय गोंडवाना.......

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