ज्योतिबा फुले स्कॉटिश मिशन के अंग्रेजी
स्कूल में पढ़े लिखे व्यक्ति थे । उनकी जितनी पढ़ाई थी उससे उस दौर में अंग्रेजी सरकार
के अधीन नौकरी पाना आसान था । लेकिन उन्होंने कभी भी जीवन यापन के लिए सरकारी नौकरी
का चुनाव नहीं किया ।
ज्योतिबा के अच्छे स्कूल में पढ़ने
के कारण कई ब्राह्मण , क्षत्रिय , कायस्थ और मुसलमान उनके दोस्त थे । अपनी युवावस्था
में एक बार वह अपने एक ब्राह्मण मित्र की बारात में शरीक होने गए । वहां वह पहली बार
जातिगत भेदभाव के अपराध का शिकार हुए ।
शुद्र माली जाति का लड़का ब्राह्मणों
के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले , इसे ब्राह्मण भला कैसे बर्दास्त कर सकते थे । उस
दिन ज्योतिबा का गिरेबान पकड़कर एक ब्राह्मण ने टोका ...
" शर्म नहीं आती ? शुद्र कहीं
के..ब्राह्मणों के साथ चलते हो..जातिपाँति की कोई मर्यादा है या नहीं ? या सब कुछ ताक
पर रख दिया है ? हटो यहां से...सबसे पीछे चलना और आगे मत आना. बहुत बेशर्म हो गए हैं
ये लोग आजकल. '
ज्योतिबा पर मानों बिजलियाँ गिर पड़ी
। वह हक्केबक्के रह गए । कोई उन्हें इस तरह प्रताड़ित कर सकता था , उन्हें विश्वास नहीं
हो पा रहा था । इतना अपमान , ऐसी घृणा..बिना एक क्षण रुके वह फौरन घर लौट गए ।
गुस्से में उफनते हुए उन्होंने पूरा
वाकया अपने पिता को सुनाया । उन्हें लगा वो कुपित होंगे , लाठी लेकर अपमान का बदला
लेने चलेंगे , लेकिन ऐसा नहीं हुआ । उनके पिता गोविंदराव भी परंपरा के गुलाम थे । धर्मभीरु
और रूढ़िप्रिय थे । उन्होंने उल्टे ज्योतिबा को समझाना शुरू किया -
" गनीमत समझो कि उन्होंने तुम्हें
डांट-डपट कर छोड़ दिया. हम जाति से शुद्र हैं. हम उनकी बराबरी कैसे कर सकते हैं ? गैर
ब्राह्मणों का पेशवाओं के राज में भी अपमान होता था. उन्हें हाथी के पैरों तले कुचल
देते थे. तमाम तरह की यातनाएं देते थे. न्याय ब्राह्मणों का पक्षधर था..
आज तुमने जो कुछ किया वह पेशवाओं के
राज में करते तो तुम्हें कड़ी सज़ा होती "
ज्योतिबा लगातार उनकी बात सुनते रहे
और उनके सामने दागदार सच्चाइयों के पर्दे खुलते रहे । उनका अपने पिता की बात से होने वाला दोहरा दुख कम होने
लगा । उन्हें समझ आने लगा कि राजनीतिक गुलामी भीषण जरूर थी , लेकिन उसकी कोई सीधी आंच
सामान्य लोगों पर नहीं आती थी । परंतु सामाजिक विषमता की आग तो आदमी को जिंदा जलाने
वाली थी । मनुष्य की आत्मा को तिल तिल कर मारने वाली थी । अगर लड़ना ही है तो इस जानलेवा
बीमारी से लड़ना होगा ।
जोतिबा के सामने भविष्य का रास्ता
खुलता हुआ दिखाई देने लगा । उस दिन उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि अब आगे चलकर बस एक
ही काम करना है , जाति भेद के खंभों पर खड़े विषमता के महल को पूरी ताकत के साथ ढहा
देना है ।
2.
विषमता के खिलाफ लड़ाई में ज्योतिबा
का सबसे बड़ा हथियार शिक्षा थी । उन्हें पता था कि विषमता के साथ-साथ अन्य सभी लड़ाईयां
शिक्षा के दम पर ही जीती जा सकती हैं । जीवन के बाद के वर्षों में , जुलाई 1883 के
आसपास वह लिख कर गए हैं -
" विद्या बिना मति गयी । मति
बिना नीति गयी ।
नीति बिना गति गयी । गति बिना वित्त
गया ।
वित्त बिना शुद्र गए । इतने अनर्थ
, एक अविद्या ने किए । '
ज्योतिबा ने यह लड़ाई पूना से शुरू
की । पूना में उन्होंने 1848 के अगस्त महीने में अछूत बच्चों के लिए स्कूल शुरू किया
जो महाराष्ट्र ही नहीं , पूरे देश में अपने ढंग का पहला स्कूल था । यह ऐसा काम था जो
इस देश के 3000 सालों के इतिहास में नहीं हुआ
था । अछूत समाज के लिए पहला स्कूल ज्योतिबा के कारण खुल सका ।
यह तो स्पष्ट था कि ज्योतिबा के उस
स्कूल में शुद्र या अतिशूद्र जाति के लड़के या लड़कियां ही आती थीं , लेकिन असल प्रश्न
यह था कि उन्हें पढ़ायेगा कौन ? उस समय पाठशालाओं के शिक्षक बिना किसी संकोच के जाति
भेद का पालन करते थे । लड़कों के बैठने की व्यवस्था उनकी जाति श्रेष्ठता के अनुसार की
जाती थी । निम्न वर्ण के लड़के उच्च वर्ण के लड़कों के साथ बैठकर नहीं पढ़ सकते थे । लड़कियों
की स्थिति तो और भी बदतर थी । उनके लिए विद्यालय जाना तो दूर घर से बाहर निकलना भी
मुश्किल था । लिहाज़ा ज्योतिबा ने सभी विद्यार्थियों को अकेले पढ़ाने का निर्णय लिया
। यह उस दौर के भारत में उठाया गया बेहद क्रांतिकारी कदम था । लेकिन यह सभी को रास
नहीं आया ।
पूना के सनातनी ब्राह्मणों को ज्योतिबा
का इस तरह अछूतों के लिए स्कूल खोलने बिल्कुल पसंद नहीं आया । उनके मत में यह घोर अधर्म
था । उन्होंने ज्योतिबा की कड़ी टिका टिप्पणी की । उन्हें भला बुरा कहा । समाज से बहिष्कृत
करने की धमकी दी । लेकिन ज्योतिबा टस से मस न हुए ।
जब ज्योतिबा पर इन सब बातों का असर
नहीं हुआ तो ब्राह्मणों द्वारा उनके पिता को निशाना बनाया गया । उनको ताने दिए गए
, उनकी घोर निंदा की गई -
" तुम्हारा लड़का धर्म और समाज
के लिए कलंक है । उसकी पत्नी भी निपट निर्लज्ज और मर्यादाहीन है । दोनों समाजद्रोही
और धर्मद्रोही हैं । उनके व्यवहार के कारण तुम पर परमात्मा का कोप होगा । अच्छा होगा
कि दोनों को घर से बाहर निकाल दो "
गोविंदराव रोजाना यह सब ताने सुनकर
दब गए । उन्होंने ज्योतिबा के सामने प्रस्ताव रखा -
" या तो स्कूल छोड़ो या घर !
"
ज्योतिबा को अपने लक्ष्य से हटना कतई
मंजूर नहीं था । वह बिना देर किए फौरन घर छोड़ने की बात पर राजी हो गए । पिता इस दृढ़ता
को देखकर तिलमिला उठे ।
उन्होंने इस बार और गहरी चोट की - ' अगर ऐसा है तो अपनी पत्नी को भी ले जाओ , मैं
तुम्हारी पत्नी को अपने घर में नहीं रख सकता । '
ज्योतिबा के लिए वह दिन बहुत दुखदायी
था । उन्होंने दुखी मन से पिता का घर छोड़ दिया । अब तक पिता का साया होने की वजह से
उन्हें रहने और खाने की समस्या नहीं थी । लेकिन घर से बाहर कदम रखते ही ज्योतिबा को
खाने के लाले पड़ने लगे । उन्होंने कई दिन तक आधे पेट तो कई दिन बिना खाये बिताए । काम धंधे की खोज में व्यस्तता
के कारण ज्योतिबा को स्कूल का काम छोड़ना पड़ा । आठ नौ महीनों तक चलने के बाद स्कूल भी
बंद हो गया । यह ज्योतिबा के लिए बेहद मुश्किल समय था । संभवतः यह आगामी चुनौतियों
के लिए उनकी परीक्षा थी , जिसका वह डटकर सामना कर रहे थे ।
3.
घर से निकाले जाने के बाद ज्योतिबा
की आर्थिक हालत जब ठीक हुई तो उन्होंने पुनः स्कूल शुरू किया । यह स्कूल एक मुसलमान
के घर में शुरू किया गया । उस दौर के सभी धर्मभीरु
और स्वयं को हिन्दू कहने वाले लोग , जिनके लिए ज्योतिबा ज्ञान की अलख जगा रहे थे उन्होंने
उनकी घोर उपेक्षा की । वह उनके प्रयासों को
तुच्छ नज़रों से देखते रहे ।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ज्योतिबा
ने शिक्षा देने के लिए कभी भी उस दौर के ब्राह्मणों की तरह न भेदभाव किया न ही बदले
में कुछ लिया । उन्होंने अपने जीवनकाल में रोजी रोटी के लिए कभी सब्जियां बेचीं , कभी
दर्जी का काम किया , कभी खेती की तो कभी कठोर शारीरिक श्रम किया ।
ज्योतिबा के दुबारा स्कूल शुरू करने
के बाद स्कूल में आने वाले छात्रों की संख्या बढ़ने लगी । इससे प्रेरित होकर अगले चरण
के रूप में उन्होंने 3 जुलाई 1857 को लड़कियों के लिए भी एक स्कूल खोला । ज्योतिबा ऐसे
पहले भारतीय थे जिन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने की दूरदर्शिता दिखाई ।
लेकिन इस कार्य में भी ज्योतिबा के
सामने शिक्षक न मिलने की समस्या सामने आने लगी । जब ज्योतिबा को तमाम कोशिशों के बाद
पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक न मिला , तब उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री को इस काम के लिए
तैयार किया । लगभग 4 साल का कोर्स पूरा करने के बाद सावित्री प्रशिक्षित शिक्षिका बन
गयी । वह भारत की पहली शिक्षिका थीं ।
सावित्री के स्कूल में पढ़ाने से परम्परावादी
समाज की चूलें हिल गयीं । घर से बाहर कदम रखकर समाज में खुले तौर पर काम करने वाली
वह पहली भारतीय महिला थीं । इससे बौखलाए हुए परम्परावादी और धर्मभीरु लोगों ने सावित्री
की छीछालेदर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । जब वह घर से बाहर निकलती तो लोग उन पर थूकते
, उन्हें गालियां देते , उनको पत्थरों से मारते और उन पर गोबर और मल फेंक दिया करते
थे ।
लेकिन धन्य हैं वह महिला , नमन है
उनको , कि इस जानलेवा अपमान की आग पीकर भी वह शांति से अपना काम करती थीं । वह अक्सर
लोगों से हाथ जोड़कर कर विनम्रता से कहती थी -
" भाईयों , मैं तो आपको और आपकी
इन छोटी बहनों को पढ़ाने का पवित्र काम कर रही हूं । मुझे बढ़ावा देने के लिए शायद आप मुझपर गोबर- पत्थर फेंक रहे
हैं । मैं यह मानती हूं कि यह गोबर या पत्थर नहीं , फूल हैं । आपका यह काम मुझे प्रेरणा
देता है कि इसी तरह मुझे अपनी बहनों और भाईयों की सेवा करनी चाहिए । ईश्वर आपको सुखी
रखें । "
फुले दंपत्ति की इस जिजीविषा और दृढ़
निश्चय की बदौलत कई दिक्कतों , संकटों और विरोधों के बाद भी स्कूल चलता रहा । इन कार्यों
से ज्योतिबा और सावित्री ब्राह्मण और अन्य ऊंची जातियों के लिए नीच और पापी बन गए ।
वहीं दूसरी ओर पूरे महाराष्ट्र में वह अछूतों और महिलाओं के मसीहा बन गए । अब लोग उनके
प्रयासों को जानने और समझने लगे थे ।
4.
जब ज्योतिबा को जान से मारने की कोशिश
हुई ..
ज्योतिबा के विचार और आचार पचा पाना
सनातनियों के लिए संभव नहीं था । वह उनके कार्यों की प्रसद्धि से घबराने लगे थे । उनके
लिए अछूतों और महिलाओं का उत्थान समाज का सत्यानाश होना था । इस कुंठा की वज़ह से सनातनी
ब्राह्मणों ने ज्योतिबा की हत्या करने की योजना बनाई । उन्होंने शूद्रों के कंधे पर
बंदूक रखकर निशाना साधने का सोचा और ज्योतिबा की हत्या के लिए घोंडीराम नामदेव कुम्हार
और रौद्रे नामक शुद्र व्यक्तियों को पैसे देकर इस काम के लिए तैयार किया ।
उन्हें आज से लगभग 150 साल पहले ज्योतिबा
की हत्या के लिए एक - एक हज़ार रुपये दिए गए थे जिनका मूल्य आज एक करोड़ से कम नहीं होगा
।
निर्धारित किये गए दिन को आधी रात
में दोनों ज्योतिबा के घर पहुंचें । घर के भीतर आहट पाकर ज्योतिबा और सावित्री की नींद
खुल गयी । उन्होंने सामने देखा तो हाथों में चमचमाते छुरे लिए हुए दो हट्टे कट्टे आदमी
खड़े थे ।
" क्या चाहते हो ? " , ज्योतिबा
ने पूछा ।
" तुम्हारी जान । "
" क्यों ? क्या मैंने आपका कुछ
अहित किया है ? "
" वह बात नहीं है । हमें बस तुम्हे
जान से मारने का हुक्म है "
" मुझे मारकर तुम्हें क्या मिलेगा
? "
" एक-एक हज़ार रुपये । "
" अरे ! तब तो जरूर मेरा सिर
कलम कर दो । अगर इससे तुम्हारा कुछ भी भला होता है तो मैं क्यों रोड़ा अटकाउं ! जिस
गरीब जनता की सेवा में मैंने अपना पूरा जीवन लगा दिया , वही जनता अगर मेरा गला काटना
चाहती है तो काट ले । मेरी सारी हयात अछूतों का भला करने में गयी है । अब अगर मेरी
मौत से उनका भला होता है तो मैं क्यों रोकूँ , बढ़ो आगे । "
ज्योतिबा की धीर गंभीर और आत्मविश्वासपूर्ण
वाणी सुनकर दोनों ने हथियार डाल दिए । उन्होंने ज्योतिबा की अच्छाई के बारे में सुना
था । उसे साक्षात देखकर वो ज्योतिबा के चरणों
में गिर पड़े और माफी मांगने लगे । ज्योतिबा ने उदारतापूर्वक उनको क्षमा कर दिया ।
उनमें से एक कुछ दिन बाद ज्योतिबा
का शरीर संरक्षक बना और दूसरा घोंडी राम कुम्हार ज्योतिबा के सत्यशोधक समाज का प्रबल
समर्थक बना ।
ज्योतिबा मन , वचन , कर्म सभी से उदार
और न्यायप्रिय थे । इस घटना ने इस बात पर पूर्णतः मुहर लगा दी थी ।
4.
जुन्नर के किसान और ज्योतिबा ..
ज्योतिबा के समय , जुन्नर में खेती-किसानी
पूरी तरह से ब्राह्मण ज़मींदारों और साहूकारों के हाथ में थी । ये साहूकार और जमींदार
गरीब किसानों , मज़दूरों और जरूरतमंदों को अलग अलग तरीके से लूटा करते थे । इससे तंग
आकर जुन्नर क्षेत्र के किसानों ने सरकार के पास यह अर्जी दायर की कि उन्हें जमींदारों
और साहूकारों से बचाया जाए । उनके हितों की रक्षा किया जाय ।
सरकार ने उनकी प्रार्थना पर बिल्कुल
भी ध्यान नहीं दिया । तब ज्योतिबा ने गरीब , मज़दूर और किसानों को इकठ्ठा किया । उन्हें
हिम्मत दी और एकता का महत्व समझाया । परिणामस्वरूप , किसानों ने भारतीय इतिहास में
एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम उठाते हुए सालभर ज़मीन परती रखी । उन्होंने पूरे क्षेत्र
में हल चलाना बंद कर दिया । जमीन जोतना बंद कर दिया ।
घबराये जमींदार और साहूकारों द्वारा
ज्योतिबा पर तमाम दबाव बनाए गए , लेकिन वो झुके नहीं । ज्योतिबा किसानों के सच्चे नेता
थे । उन्हें झुकने की बजाय संघर्ष करना आता था ।
कुछ समय बाद सरकार , जमींदार और साहूकार
, तीनों को झुकना पड़ा । इनकी ज्योतिबा के साथ सुलह हुई और सरकार को किसानों के हित
के लिए बाकायदा 'एग्रीकल्चर ऐक्ट ' पास करना पड़ा ।
आश्चर्य की बात है कि बालगंगाधर तिलक
और रानाडे जैसे नेता उस समय साहूकारों के पक्ष में थे । उन्होंने ज्योतिबा की निंदा की और साहूकारों का खुलकर साथ दिया । उस समय
प्रकाशित होने वाले ' इंदुप्रकाश ' नामक अखबार ने भी ज़मींदारों का पक्ष लेते हुए ज्योतिबा
की आलोचना की ।
लेकिन इसके बावजूद भी ज्योतिबा के
नेतृत्व में गरीबों , किसानों और मज़दूरों की जीत हुई । यह उक्त अखबार और नेताओं की
पक्षधरता से ज्यादा महत्वपूर्ण और सुकूनदायक बात थी ।
6.
ओतुर गांव के ब्राह्मण और ज्योतिबा..
इस घटना के बारे में पढ़ने के बाद संभवतः
आपको एक बार उस समय के सनातनी ब्राह्मणों के बारे में सोचकर हंसी आये । लेकिन गंभीरता
से सोचने पर आपको अंदाजा लग जायेगा कि उस समय का समाज ब्राह्मणीय वर्चस्व और जातिवाद
से कितनी बुरी तरह ग्रस्त था ।
ओतुर गांव में श्री बालाजी कुसाजी
पाटिल नामक एक किसान थे । किसी कारणवश उन्होंने अपने पुत्र के विवाह में गांव के पुरोहितों
को निमंत्रण नहीं दिया । इससे गांव के पुरोहित नाराज़ हो गए । इस विवाह के खिलाफ उन्होंने
कोर्ट में वाद दायर किया । उन्होंने क्या दावा किया पढ़िए -
' हम यहां के पीढ़ियों के पुश्तैनी
पुरोहित हैं । विवाह कार्य करवा देना , तत्सम्बन्धी संस्कार वर-वधु को देना तथा सारे
धार्मिक कृत्य करना हमारा अधिकार है । हम इसके लिए तैयार भी थे लेकिन बालाजी पाटिल
ने अपनी जाति के पुरोहितों को बुलवा कर विवाह करवाया । यह हमारा अपमान है । वे हमें
हमारा अधिकार और दक्षिणा दोनों प्रदान करें '
धीरे धीरे यह खबर पूरे पूना में फैल
गयी । पूना के सभी ब्राह्मण , ओतुर के ब्राह्मणों के साथ और बालाजी के खिलाफ हो गए
। बालाजी का जीना मुहाल हो गया ।
अंततः उन्होंने ज्योतिबा की शरण ली
। ज्योतिबा ने बालाजी की पूरी मदत की । न्यायाधीश के समक्ष बेबाकी से बालाजी के पक्ष
में बात रखवाई । परिणामतः पूना के न्यायाधीश ने बालाजी के पक्ष में निर्णय दिया ।
इससे ब्राह्मण वर्ग और अधिक क्रुद्ध
हो गया । वह अगली अपील के लिए बम्बई के सर्वोच्च
न्यायालय पहुंच गया । सम्पूर्ण महाराष्ट्र में इस मुकदमें की खूब चर्चा हुई । पूना
में सारे ब्राह्मण एक तरफ और गैर ब्राह्मण दूसरी तरफ हो गए । उस समय ज्योतिबा ने गैर
ब्राह्मणों का नेतृत्व पूरी जिम्मेदारी और हिम्मत के साथ सम्हाला ।
बहुत बाद में जाकर ज्योतिबा के जीवन
के अंतिम वर्षो में जनवरी , 1890 के आसपास सर्वोच्च न्यायालय ने बालाजी पाटिल के पक्ष
में निर्णय दिया और इस विवाद का अंत हुआ ।
यह विवाद सत्यशोधक समाज और ज्योतिबा
समेत सभी गैर ब्राह्मणों की जीत थी । इसने महाराष्ट्र की सामाजिक आबोहवा बदल के रख
दी । आज यह एक सामान्य मामला लग सकता है लेकिन उस दौर में ब्राह्मणीय वर्चस्व के खिलाफ
खड़े होना बहुत बड़ा और साहसिक कदम था ।
7.
हमें आमिर खान का शुक्रगुज़ार होना
चाहिए कि उन्होंने पहली बार ज्योतिबा के जल संरक्षण संबंधी प्रयासों को फेसबुक लाइव
के माध्यम से लोगों के सामने लाने का काम किया ।
ज्योतिबा की यह पहल उस समय के अछूतों
की समस्या से जुड़ी हुई है । पूना में उस समय स्थान स्थान पर पीने के पानी के छोटे बड़े
हौज हुआ करते थे , जिन पर पेशवाओं का अधिकार होता था । इन हौज पर महार , चमार , भंगी
आदि शुद्र जाति के लोग पानी नहीं भर सकते थे । तपती दुपहरी में कई बार वे पानी के लिए
प्रार्थना करते हुए , हौज से थोड़ी दूर पर दम तोड़ देते थे लेकिन उन्हें पानी की एक बूंद
भी नहीं मिलती थी । अक्सर पड़ने वाले सूखे या गर्मियों में होने वाली पानी की कमी के
कारण हर साल किसी न किसी घर से कोई न कोई जरूर मरता था । उस समय की नगरपालिका भी कोई
स्थायी इंतज़ाम नहीं कर पा रही थी ।
पानी की कुछ बूंदों के लिए अछूतों
की जो हालत थी उसे देखना और सहना ज्योतिबा के लिए संभव नहीं था । 1868 में उन्होंने
अपने घर के पास हौज की स्थापना की और उसे अछूतों के लिए खुला कर दिया । वहां कोई भी
किसी भी समय आकर पानी पी सकता था ।
उन्होंने अछूतों को जल संरक्षण के
लिए भी प्रेरित किया । उन्हें छोटे -बड़े जलाशयों
, घर पर पानी इकठ्ठा करने की तकनीकों तथा पानी बचाने के तरीकों के बारे में सिखाया
। इसके अलावा ज्योतिबा ने 'जल-नीति' का विकास भी किया और ब्रिटिश सरकार से इसे लागू
करने का अनुरोध किया । स्थानीय स्तर पर उन्होंने
'जल-नीति' का अध्ययन किया और किसानों को मिट्टी और खनिजों के क्षरण के बारे में शिक्षित
किया । उनका महत्वपूर्ण सुझाव सिंचाई के लिए 'टैप सिस्टम' को लेकर था जिसे इज़राइल ने
1948 में अपने यहाँ लागू किया । सिंचाई के
'टैप सिस्टम' द्वारा न केवल मिट्टी और खनिजों का क्षरण रोका जा सकता है बल्कि जल का
भी अधिकतम उपयोग किया जा सकता है ।
जल संरक्षण संबंधी उनके इन प्रयासों का आज भी महाराष्ट्र
में उल्लेख किया जाता है । आमिर खान की पहल भी इसी से प्रेरित लगती है जिसका उल्लेख
उन्होंने अपने फेसबुक लाइव में किया था ।
हर बार की तरह इस बार भी ज्योतिबा
के इन कार्य की सनातनियों द्वारा तीखी आलोचना
हुई थी । लेकिन ज्योतिबा कब मानने वाले थे । उन्हें तो ऐसा हर काम डंके की चोट पर करना
था , जो पारंपरिक अन्यायपूर्ण रूढ़ियों को तोड़ सके ।
8.
' जब ज्योतिबा ने दूसरी शादी से किया
इनकार...
आखिरी पोस्ट '
ज्योतिबा को लंबे समय तक कोई संतान
नहीं हुई थी । उनके पिता गोविंदराव की उम्र ढल रही थी । वे चाहते थे कि अगर संतान न
हो तो ज्योतिबा दूसरी शादी कर लें । उस समय ऐसा करना बेहद आम बात थी । उन्होंने ज्योतिबा
के ससुराल वालों को भी इसके लिए मना लिया था । लेकिन ज्योतिबा ने इसके लिए स्पष्ट मना
कर दिया । उस समय उन्होंने जो कहा वो आज भी प्रासंगिक है -
' संतान नहीं होती इसलिए किसी भी स्त्री
को बांझ कहना बहुत बड़ी निर्दयता है । संभव है , उसके पति में दोष हो । ऐसी स्थिति में
अगर वह स्त्री कहे कि मुझे दूसरा पुरुष करना है तो उस पुरुष पर क्या बीतेगी ? '
सिर्फ संतानोत्पत्ति के लिए दूसरा
विवाह करने की प्रथा ज्योतिबा को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी । उन्होंने आखिर तक अपने
पिता और सगे संबंधियों की बात नहीं मानी और दूसरा विवाह नहीं किया ।
फिर , सवाल उठता है कि यशवंत कौन था
?
उनके गोद लिए हुए पुत्र ' यशवंत '
की कहानी दिलचस्प है । लेकिन उनसे पहले ज्योतिबा द्वारा स्थापित ' बालहत्या प्रतिबंध
गृह ' के बारे में जान लेते हैं ।
उन दिनों विधवाओं की स्थिति बहुत दयनीय
थी , खासकर ब्राह्मण विधवाओं की । 25 जुलाई , 1859 को सरकार ने विधवा विवाह कानून पारित
किया था लेकिन उससे विधवाओं की सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ । दूसरी ओर बालहत्या
की बढ़ती दर भी चिंताजनक थी ।
ज्योतिबा ने 1863 में एक बालहत्या
प्रतिबंधक गृह शुरू किया । वहां कोई भी विधवा आकर बच्चा पैदा कर सकती थी । इससे पूर्व
ऐसे बच्चों की लोकलाज के डर से हत्या कर दी जाती थी या ऐसी विधवाएं आत्महत्या कर लेती
थीं । ज्योतिबा ने इस गृह के बड़े बड़े पोस्टर हर जगह लगवाए । उन पर लिखा था -
" विधवाओं , यहां अनाम रहकर निर्विघ्न
जचगी कीजिये । अपना बच्चा साथ ले जाएं या यही पर रख दें यह आपकी मर्जी पर निर्भर रहेगा
। यहां रखे बच्चों की देखभाल अनाथाश्रम करेगा । "
यह घटना सनातनियों के घर में बम फूटने
जैसी थी । वे आपे से बाहर हो गए ।
" क्या समझता है ये आदमी अपने
आप को ? होता कौन है ऐसा अनाथाश्रम बनाने वाला ? वे जानते थे ज्योतिबा के अलावा ऐसा
करने वाला कोई और नहीं हो सकता लेकिन वे उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते थे ।
यह बालहत्या प्रतिबंधक गृह एक गैर
ब्राह्मण और शूद्र माने जाने वाले ज्योतिबा द्वारा मुख्यतः ब्राह्मणों की विधवाओं के
लिए शुरू किया गया था । लेकिन विडंबना देखिए कि इसका सबसे ज्यादा विरोध ब्राह्मणों
ने ही किया ।
इस घटना से इतर एक और घटना घटी । पूना के गंजपेठ में केशोपन्त सिन्दी के घर में रहने
वाली एक ब्राह्मण विधवा युवती काशीबाई , जो वेश्यावृत्ति की राह पर भटका दी गयी थी
, ज्योतिबा और सावित्री से मिली । काशीबाई
गर्भवती थी और आत्महत्या करने जा रही थी । लेकिन ज्योतिबा और सावित्री ने उसे बचा लिया
। इसी काशी से यशवंत का जन्म हुआ जिसे फुले दंपत्ति ने गोद लिया । उन्होंने उसे पुत्र
मानकर उसका पालन पोषण किया । 10 जुलाई , 1887 को ज्योतिबा ने अपनी वसीयत बनाई और उसमें
यशवंत को विधिवत पुत्र के सारे अधिकार दिए ।
यशवंत ज्योतिबा के मानस पुत्र थे ।
उनमें भी ज्योतिबा की तरह प्रगतिशीलता , सेवाभाव
और त्याग की भावना थी । उनकी मृत्यु अपनी माता सावित्री के साथ तब हुई जब प्लेग पीड़ितों
का इलाज करने के दौरान अपनी मां के साथ वह भी प्लेग का शिकार हो गए ।
ज्योतिबा ने अपनी पत्नी के साथ - साथ
बेटे और बहू को भी पढ़ाया । जीवन के अंत समय में 1890 के आसपास उन्हें लकवा मार गया
था । इस अवस्था में भी उनके अंदर इतना जुनून था कि उन्होंने बाएं हाथ से " सार्वजनिक
सत्यधर्म " नामक पुस्तक लिखी जो उनकी मृत्यु के एक वर्ष बाद प्रकाशित हुई ।
28 नवम्बर , 1890 को युगपुरुष महात्मा
ज्योतिबा फुले की मृत्यु हुई । उनके गुजरने के वर्षो बाद भी आज उनकी शिक्षा , उनके
विचार , उनका जीवन , सब कुछ हमारे लिए अनुकरणीय और मार्गदर्शक है । हम और हमारी आने
वाली पीढियां उनके जीवन और विचारों को हमेशा अपने हृदय में संजो कर रखेंगी ।
आज की सीरीज का उद्देश्य सिर्फ इतना
था कि महात्मा ज्योतिबा के जीवन और कार्यों की छोटी सी झलक आप लोगों तक पहुंच सके ।
नमन ..उस महान नायक को.
5-देवताओं ने सिर्फ राक्षसों
को ही हराया।
मुगलों और अंग्रेजों को क्यों नहीं
हराया...?
👉महिषासुर को मार कर
"दुर्गा", देवी कहलाई,
और बलात्कारियों को मार कर "फूलन
देवी", डाकू क्यों कहलाई???
👉पहले तो धड़ाधड़ अवतार जन्म
लेते थे !
शिक्षा का युग आते ही अवतारों की नसबंदी
क्यूं हो गई ???
👉आस्था ही अंधविश्वास की जननी
है।
आस्था मूत्र पिला रही है
और नारियल का शुद्ध पानी फिकवा रही
है।
👉भारत दुनिया का इकलौता देश
है जहाँ मिट्टी की मूर्ति को देवी कह कर कपड़ा पहनाया जाता है और जिन्दा औरत को नंगा
करके घुमाया जाता है!
👉अफसोस इस बात का नहीं कि
“धर्म” का धंधा हो रहा है,
बल्कि अफसोस तो इस बात का है कि पढ़ा
लिखा भी अंधा हो रहा है....!!!
👉पिता जी का पता नहीं?
और माता जी की जय-जय, वाह रे अन्धभक्तों।😛😛
👉नौ दिन #मिटटी की मुर्ति
के लिए भूखे-नंगे रह लेंगें,
लेकिन जिस माँ ने #नौ माह पेट में
पाला उसके लिए भी कभी नौ दिन भूखे रह के दिखाओ????
#मानसिक गुलाम
👉एडिसन ने बल्ब बनाया यह सारी
दुनिया जानती है।
लेकिन ब्रह्मा ने दुनिया बनाई यह केवल
भारत जानता है।
ई रांग नम्बर है।
👉महसूस किया है उस जलते हुए
रावण का दुख,
जो सामने खड़ी भीड़ से बार- बार पूछ
रहा है, आप में सेे राम कौन है????
👉अर्थ हमारे व्यर्थ हो रहे
हैं, पापी पुतले अकड़ खड़े हैं।
काग़ज़ के रावण मत फूँकों, ज़िंदा
रावण बहुत पड़े हैं।।
👉पूरी दुनिया में भारत एक
ऐसा देश है जहाँ लहसुन, प्याज खाने से पाप लगता है।
दलाली, रिस्वत, हराम की कमाई खाने
से पाप नहीं लगता।।
👉अगर यूपी वालों ने मंदिर
की जगह फैक्टरियां लगाने के लिये वोट किया होता, तो आज मार खाने गुजरात नहीं जाना पड़ता।
#दिमाग की बत्ती जलाओ...
#अंधविश्वास भगाओ???

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